“शून्य” से नयी क्रांति... पुनः सृजनात्मक “शून्य”

Published: Tuesday, Aug 21,2012, 13:38 IST
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अनादि काल से अब तक विश्व में समग्र मानव कल्याण के लिए बहुत से धर्मों, दर्शनों, राजनैतिक व्यवस्थाओं का प्रादुर्भाव हुआ है। कालांतर में एक एक करके अधिकांश विचार जो स्वयं मानव ने प्रतिपादित किये उन्हें स्वयं ही नकार दिया और एक ऐसे परिष्कृत विचार की निरंतर खोज में लगा रहा जो सम्पूर्ण हो। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति "मानव" ने एकाकी जीवन से अपना विकास क्रम शुरू करते हुए सामाजिक होने के महत्त्व को जाना, फिर नियमबद्ध होकर कबीले और राजशाही का गठन किया, आवश्यकता उसके आविष्कार की जननी बनी, और कहते हैं पहिये के विकास ने उसके विकास के क्रम को अभूतपूर्व गति प्रदान की! "पहिया" जो आकृति में वर्त्तमान "शून्य" का प्रतिनिधित्व करता था, ये वही "शून्य" है जिसे भारत ने खोजा और वह आज भी मानव के विकास के लिए अपरिहार्य बना हुआ है।

मानव एक एक कर अपने सभी विचारों को नकारता रहा. मानव विकास क्रम में एकाकी जीवन से समूहों में रहने लगा, समूह कबीलों में, फिर कबीले राजतन्त्र में, राजतन्त्र लोकतंत्र में और लोकतंत्र भी पूंजीवादी और समाजवादी अवधारणाओं के साथ बदलते रहे, अवधारणाओं में निरंतर परिवर्तन का उद्देश्य स्पष्ट था, वो ये कि किसी प्रकार उस सर्वोत्कृष्ट व्यवस्था को स्थापित किया जा सके जो समग्र रूप से मानव के कल्याण का उद्देश्य पूरा करती हो। इसी महान उद्देश्य की पूर्ति में अलग अलग धर्मो और संस्कृतियों की अपनी विशिष्ट भूमिका रही। पुरानी और निरुद्देश्य हो चुकी किसी भी व्यवस्था/ पद्धति को बदलने के लिए विश्व भर में अनेक बार क्रान्तिया हुई और मानव अपनी की स्थापित व्यवस्था को "शून्य" करके नए सिरे से पुनर्सृजन करने लगा।

आज चहूँ ओर निराशा का माहौल है, रूसी समाजवादी क्रांति समग्र मानव कल्याण में निरर्थक साबित हुई दूसरी और पूंजीवाद की अवधारणा से मानव विकास का सपना बुनने वाले पश्चिमी राष्ट्र भी एक एक कर दिवालिया होने लगे, गरीब पहले से और गरीब हुआ और लोकतंत्र होने के बावजूद विश्व भर में सत्ता, और धन केवल कुछ लोगों के अधिकार की वस्तु बन गया ऐसे में धर्म और संस्कृतियों को भी पर्याप्त हानि हुई और व्यवस्था बदलाव के सपने बुनने वाले राह भटक कर केवल क्षणिक सुख के प्राप्ति को महत्त्व देने लगे जो भीतरी सुख और आनंद की स्थिति ना होकर एक बाहरी खिलखिलाहट से अधिक कुछ नहीं है! ऐसे में अधिकतम पा लेने के लोभ और किसी से छीन कर भी हासिल करने की प्रवृति ने विश्व व्यवस्था को खंड-खंड कर दिया है।

अब पुनः समय आ गया है जब विश्व्यापी असंतोष एक नए बदलाव की क्रांति की राह देख रहा है। भारत और सनातन सदा से पथ प्रणेताभारत भूमि से उपजा सनातन धर्म कोई आचार सहिंता भर नहीं है, प्रत्येक इंसान जो इस धरती पर जन्म लेता है वो जन्म से ही सनातन है, ईसाई बनने के लिए उसे बप्तिस्मा पढना है और मुस्लमान बनने के लिए उसे खतना करवाना पड़ता है किन्तु सनातनी तो हम सब जन्म से है ये आदि है, अनंत है, इसके चारों वेदों, पुराणों, उपनिषदों और इसी सनातन से उपजे विभिन्न दर्शनों में एक सम्पूर्णता है, यहाँ तक कि देव भाषा "संस्कृत" जिसमे मूल रूप से वेद प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा रचे गए हैं वो अपने अपने आप में इतनी पूर्णता लिए हुए है कि अब ये अंतर्राष्ट्रीय शोध से भी सिद्ध हो चूका है कि इससे समृद्ध भाषा पूरे विश्व में कोई दूसरी नहीं।

अभी हाल ही के वर्षों में मानव द्वारा अब तक अर्जित ज्ञान को एक जगह आने वाली संततियों के सुरक्षित करने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम" की शुरुआत की तो उन्हें बहुत शोध के बाद इसके लिए संस्कृत से अधिक पूर्ण और उपयुक्त भाषा नहीं मिल सकी और तब से नासा के वैज्ञानिकों को संस्कृत सीखने के लिए विशेष व्यवस्था की गयी, जर्मनी और अन्य बहुत से देश इस भाषा की दिव्यता और ज्ञान प्राप्ति के लिए पूर्णता को सदियों पहले स्वीकार कर चुके हैं। ऐसे में ये भी अब सिद्ध हो चूका है कि पश्चिम में ईसा-मसीह और मध्य में इस्लाम के प्रादुर्भाव से पूर्व सनातन ही समूचे विश्व में मानव को दिशा दे रहा था, भारत से सुदुर जापान और इंडोनेशिया तक आर्य और सनातन संस्कृति के ही केंद्र थे, रूस, यूरोप के अधिकांश देश जिनमे जर्मनी प्रमुख है अपनी नस्लीय श्रेष्ठता को मानते हुए स्वयं को आर्य और सनातन का अंश या प्रणेता ही मानते आये हैं। अमेरिका में भी "रेड इंडियन" शब्द का होना कुछ इशारा करता है। विश्व भर में मूल रूप से जब समूचा मानव समाज सनातनी रहा है और कालांतर में स्वयं की श्रेष्ठता को विस्मृत करके अलग–अलग धर्मों और राहों में चल निकला है। आज समूचा विश्व विभिन्न समस्याओं से त्रस्त है, किंकर्तव्यविमूढ़ है, इस्लाम के प्रादुर्भाव ने शेष समूची मानवता को चुनौती दे डाली है, सनातन के सौहार्द्रपूर्ण सह-अस्तित्व के विपरीत इसमें इस्लाम के अतिरिक्त शेष दुनिया को मिटा देने की शिक्षा दी गयी है।

व्यवस्था पुनः करवट लेना चाहती है, एक और बदलाव की क्रांति चाहती है जिसमे आदि सनातन से ही समाधान मिलने की आशा है, इसके लिए समूचा विश्व ओर मानवता भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहे है। आने वाले समय में देशों की सीमाए समाप्त होंगी, मानव सम्पूर्ण पृथ्वी का नागरिक होगा, उच्च मानवीय सनातन मूल्यों की पुनर्स्थापना होगी, हम अपनी सभी अपनी जड़ों की और लौटेंगे, समस्त विश्व एक कुरुक्षेत्र होगा, ये सब "समग्र क्रांति" का पथ है अर्थात "शून्य" का जो भारत की अवधारणा है, इससे समाधान मिलने का विश्वास है।

"शून्य" की भारतीय अवधारणा क्या है... प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से भविष्य में देखा और होने वाली घटनाओ को आंकलित किया, उनके समाधान भी आने वाली पीढ़ियों के लिए लिपिबद्ध किये तभी तो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग की अवधारणायें अस्तित्व में आई और तभी तो गीता में भगवन श्री कृष्ण ने कहा "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम्।"

जरा अन्तरिक्ष में हमारे सौरमंडल पे नज़र डालिए, पृथ्वी सहित विभिन्न ग्रह और उपग्रह "गोल" अथवा "शून्याकार" क्यों है ? क्यों ऊर्जा का स्त्रोत सूर्या बहुत से छोटे छोटे तारों को रोज अपने भीतर निगल लेता है? क्यों पृथ्वी एक और झुक कर (जैसे सूर्या के प्रति विनम्र और कृतज्ञ हो) सूर्य के चरों और गोल "शून्याकार" घूमती है ? ये उपग्रह चाँद भी तो गोल है। मानव के विकास में अहम् "पहिया" भी "शून्याकार" है ये सब प्राकृतिक संकेत है, जिन्हें समझ कर लगता है कि सूर्य अन्तरिक्ष में अपने गुरुत्वाकर्षण के "शून्य" से लगातार बदलाव लाता है, पृथ्वी पर क्रांति का सूत्रपात करने वाले क्षत्रिय अपने आपको सूर्यवंशी कहते हैं।जंगल में आग लगती है, सब कुछ जल कर राख हो जाता है किन्तु वो जीवन का अंत नहीं होता वरन उसकी राख में से एक उत्तम खाद के रूप में नए जीवन की नयी कोपलें फूट पड़ती है, विश्व में अनेक स्थानों पर भयंकर ज्वालामुखी और भूकंप आते हैं, किन्तु तब भी प्रकृति अपने आप मानव शरीर में ऐसे सुखद बदलाव लाती है कि अगले ही वर्ष प्रचुर नया जीवन जन्म लेता है, सनातन मान्यता अनुसार "शिव" को जहाँ एक ओर विध्वंस का देवता तो माना गया है वहीँ "शिवलिंग" का पूजन ओर शिव प्रसाद को नया जीवनदाता माना गया है। इसी क्रम में ये उल्लेखित करना भी समीचीन होगा कि शिव का निवास हिमालय को माना गया है, एक निर्जन प्रदेश "शून्य क्षेत्र" जहाँ शून्य तापमान है।  ऋषि मुनियों ने भी जब सांसारिक जीवन त्याग कर ज्ञान-प्राप्ति के लिए प्रयास किया तो सांसारिक विचारों को त्याग कर "शून्य" होकर नए विचारों को ग्रहण करने के लिए हिमालय की क्षरण में गए। उन्हें उसी शून्य से समूची सृष्टि ओर मानव कल्याण ओर मोक्ष का मार्ग मिला।

भारतीय "शून्य" विध्वंसात्मक ना होकर सृजनात्मक है, नकारात्मक ना होकर सकारात्मक है। सनातन में आत्मा को "जीवन पुंज" माना गया है, इसके अजर अमर होने की अवधारणा है, ये केवल शरीर रुपी वस्त्र बदलती है, जब वस्त्र बदलती है तो एक बार शून्य में विलीन होकर जब नए वस्त्र (शरीर) को धारण करती है तो पुराने शरीर की कोई स्मृति उसके साथ नए शरीर में नहीं होती, वो नए शरीर में नए सिरे से ज्ञान अर्जित करती है, यही शून्य से नयी क्रांति का उपयुक्त भारतीय विचार होना चाहिए। सनातन तो अनादी है, सनातन के पश्चात् जिन मान्यताओं का प्रादुर्भाव हुआ है आज "विश्व अव्यवस्था" उनकी देन है, अतः समाधान सनातन में निहित है और भारत भूमि ही ऐसी भूमि है जहाँ 800 वर्षों के मुस्लमान शासन और 200 वर्षों के ईसाई शासन और धर्मान्तरण के प्रयासों के बावजूद, सनातन का परचम आज भी अक्षुण्ण है। हमें अपने वेद- विज्ञान को पुनः समझना होगा, हमें निश्चित और स्थाई समाधान वहीँ से हासिल होगा। समूचा विश्व आज संस्कृत, वेद और योग जैसे भारतीय विचार, ज्ञान और भाषा से अभिभूत है, आशा भरी दृष्टि से वो हमारी ओर देख रहा है, जैसे एक आहत पुत्र अपनी माता का स्मरण करता हो और हमें तो इस धरती को माता कहना विरासत में मिला है।

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चहुँ ओर आज धर्म और मानवता की हानि है, अधर्म अपने चरम पर है, भारतीय विचार भगवान् कृष्ण के पुनर्रागमन की राह देखता है जो मूल रूप से पुनः सृजनात्मक "शून्य" होगा, विश्वभर के विचारशील लोग भारत में जुटें, पुनः उस पूर्व सृजित ज्ञान को खंगालें और "शून्य" से नयी शुरुआत करें, उखाड़ फेंके उन सभी अव्यवस्थाओं को जिनसे हम त्रस्त हैं और आज समाधान के लिए यहाँ वहां भटक रहे हैं! हे भारत भूमि ये वेदविज्ञान आपको कोटि-कोटि नमन!

लेखक : nagendra pareek | प्रथम प्रकाशित

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