पर्दा पर्दा बेपर्दा : फतवा, मुस्लिम वर्ग और लोकतंत्र

Published: Sunday, May 13,2012, 10:52 IST
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प्रायः मुस्लिमों के द्वारा यह पंक्तियाँ अक्सर सुनने में आती हैं कि जर, जोरु और जमीन हमेशा पर्दे में रहनी चाहिये। जर अर्थात धन दौलत, जोरु अर्थात पत्नी अथवा स्त्री, जमीन अर्थात सम्पत्ति। लेकिन मैं जब भी कभी मुस्लिमों समाज में जाकर देखता हूँ तो अपने धन दौलत जबर्दस्त प्रदर्शन कुर्बानी के लिये किसने क्या लिया यह बहुत बडा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है बकरे में एक विदेशी नस्ल होती है दुम्बा वह साधारण बकरे से बहुत महँगा होता है आजकल उसका चलन शान की बात हो गयी है और कोई भी नयी मोटरसाईकिल यदि आये तो अधिकाँश उसे आप अपने शहर में किसी मुस्लिम युवक के पास देख सकते हैं।

ऐसा ही जमीन के मुद्दे पर भी होता है यदि कोई आम का बाग या कोई बडी जमीन ले ले तो यह समाचार पूरे शहर को बताया जाता है लेकिन जब बारी आती है जोरू को पर्दे में रखने की तो अजीब तर्क दिए जाते हैं और अजीब परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं मुझे अभी भी याद है जब भारत के प्रमुख चुनाव आयुक्त श्री टी.एन.शेषन थे उन्होंने ही मतदाता पहचान पत्र प्रारंभ किये थे उस समय जब बात मुस्लिम स्त्रियों के मतदाता पहचान पत्र की आयी तो फतवे जारी होने लगे हो-हल्ला मचने लगा कि हमारी स्त्रियाँ गैर मर्द के सामने कैसे बेपर्दा होंगी उच्चतम न्यायलय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि "यदि ऐसा है तो आप अपने धर्म का पालन करें लेकिन हम आपको मतदान के अधिकार से वंचित कर देंगे" फिर अचानक से नये नये तर्क गढे जाने लगे कुरान के अनुसार विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रिया बेपर्दा भी करी जा सकती हैं फिर एसा एक बार और हुआ जब उच्चतम न्यायलय ने अपने एक निर्णय में मुस्लिम महिलाओं व युवतियों को बुर्का उतारकर वोट डालने का आदेश दिया क्युँकि कोई भी अपना चेहरा दिखाए बिना किसी दूसरे का वोट डाल सकता/सकती है फिर वही फतवे कि हमारी स्त्रियाँ कैसे बेपर्दा होँ उच्चतम न्यायलय ने फिर से उन्हें मतदान से वंचित रखने की बात करते ही फिर से वही विशिष्ट परिस्थितियों वाला तर्क देकर मामले को शाँत कर दिया गया और आज के समय में जिन क्षेत्रों में नगर निगम के चुनाव में महिला सीट आरक्षित हैं वहाँ आप स्वयं देख सकते हैं कि किस प्रकार मर्दों ने अपनी बीबियों को समाज के सामने बेपर्दा कर दिया है अब कहाँ है दारूम उलम देवबंद और कहाँ हैं उनके फतवे?

अब तो मुझे अक्सर यह देखने को मिलता है कि दारुम उलम के द्वारा बिना सिरपैर के फतवे जारी होने लगे है उदाहरण के लिये अभी कुछ समय पहले सलमान खान ने अपने घर में गणपति पूजा रखी तो फतवे जारी कर दिये गये कि अब सलमान को वापिस मुसलमान बनना होगा गणेश पूजा के बाद वह मुसलमान नहीं रहा अब ऐसा ही एक मिलता जुलता उदाहरण और भी है हमारे यहाँ शादियों में जो बैंड बजता है उसमें यदि आप ध्यान दें तो आपको अधिकाँश मुस्लिम ही मिलेंगे और हिन्दू विवाह हो अथवा किसी पर्व के समय निकलने वाली झाँकियाँ उनका प्रारंभ गणेश पूजन व (ॐ जय जगदीश हरे) आरती के गायन के साथ होता है हर साल इतने सारे ईमानवाले हिंदु हो जाते हैं उन्हें भी तो पुनः इस्लाम में वापिस लाना परमावश्यक है

मेरा दारूम उलम से अनुरोध है कृप्या इस पर भी फतवा जारी करें और कभी इस बारे में किसी मुस्लिम से बात करें तो एक बडा ही हस्यास्पद तर्क और दिया जाने लगा है कि फतवे का अर्थ फरमान नहीं है सुझाव है यदि फतवे का अर्थ सुझाव है फिर उन कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के द्वारा दिये जाने वाले फतवों को क्या कहेंगे जिनमें यह कहा जाता है भारतीय सैनिकों की किसी भी तरह का संबंध रखने वालों को मार दिया जायेगा और मार दिया भी जाता है ! यह कैसा सुझाव है जिसे ना मानने वाले को मार दिया जाये?

- अनुराग राम (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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