तस्करों के निशाने पर वन्य संपदा

Published: Thursday, Oct 13,2011, 13:08 IST
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भारत में तस्करों की पसंद वह नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका है। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातियों के पौधे हैं जो दवाइयों के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुर्लभ कछुओं, कैकड़ों और तितलियों की तस्करी के मामले सामने आए हैं और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भेजते हुए भी कई बार इन्हें पकड़ा जा चुका है। विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य का एक चक्र है और किसी एक प्रजाति अथवा पौधे के खत्म होने का असर सब पर पड़ता है। खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी। सांप पर काबू पाने के लिए मोर व नेवले भी हैं, लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबूझ पहेली के गर्भ तक जाने को व्याकुल वैज्ञानिकों प्रयोगों के लिए भारत के जैव संसार पर तस्करों की निगाहें लगी हुई हैं।

पिछले कुछ वर्षो के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पक्षियों तक को हम दुर्लभ बना चुके हैं और इसका खामियाजा भी हम भुगत रहे हैं । वैसे तो भारत सरकार ने 41 जड़ी बूटियों के दोहन पर रोक लगा रखी है। फिर भी अतीश, दंदासा, तालीस, कुटकी, डोलू, गंद्रायण, सालम मिस्त्री, जटामसी, महामेदा, सोम आदि स्थानीय बाजार में सस्ते दामों में बिकते मिल जाते हैं। यहां हालात इतने गंभीर हैं कि गढ़वाल की भिलंगना घाटी में गत एक दशक के दौरान 22 पादप प्रजातियां विलुप्त हो गई, 60 प्रजातियों का जीवन-चक्र सिर्फ 3-4 साल का रह गया है । अनुमान है कि कुमाऊं और पिथौरागढ़ की शारदा नदी के किनारे के वनों से कोई 40 प्रजाति के पौधे आगामी पांच सालों में विलुप्त हो जाएंगे। नेपाल की सीमा पर धनगढ़ी, रक्सौल, वीरगंज, हेटोडा, नेपालगंज के महंगे होटलों में लैपटाप, फैक्स, मोबाइल से लैस तस्कर सालों इनकी खरीद-बिक्री में जुटे रहते हैं। ये लोग इन जड़ी-बूटियों के विक्रताओं और उनके खरीदारों के संपर्क में रहते हैं।

इनकी मांग अमेकिा व यूरोप में काफी है, लेकिन भारत में इन पर पाबंदी है । भारत के हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों व दवाइयों की विदेशों में जबरदस्त मांग है। अरब के अय्याश शेखों को यौन-शक्ति बढ़ाने वाली दवाओं के नाम पर केवल भारतीय जड़ी-बूटियां ही भाती हैं व इसके लिए वे कुछ भी भुगतान करने को तैयार रहते हैं। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट और अमेरिका (एनसीआइ) के एक शोध के मुताबिक भारत के पहाड़ों पर मिलने वाली आयुर्वेदिक वनौषधि टेक्सोल में गर्भाशय का कैंसर रोकने की जबरदस्त क्षमता है। इसकी मांग को देखते हुए नेपाल की सीमा से सटे हिमालयी इलाके के तालीस पत्र नामक पेड़ पर जैसे कहर आ गया। यही तालीस पत्र टेक्सोल है और कभी चप्पे-चप्पे पर मिलने वाला यह पौधा अब दुलर्भ हो गया है। डाबर कंपनी और नेपाल देश ने तो बाकायदा इसकी खेती करके उसे अमेरिका व इटली को बेचने के अनुबंध कर रखे हैं। अरुणाचल प्रदेश की दिबांग और लोहित घाटियों में मिशामी टोटा पाया जाता है।

डिब्रूगढ़ के बाजार में अचानक इसकी मांग बढ़ी और देखते ही देखते इसकी प्रजाति ही उजाड़ दी गई। स्थानीय लोग इस जड़ी का इस्तेमाल पेट दुखने व बुखार के इलाज के लिए सदियों से करते आ रहे थे। डिब्रूगढ़ में इसके दाम दो हजार रुपये प्रति किलो हुए तो कोलकाता के बिचैलियों ने इसे पांच हजार में खरीदा। वहां से इसे तस्करी के पंख लगे और जापान व स्विट्जरलैंड में इसके जानकारों ने पचास हजार रुपये किलो की दर से भुगतान किया। ठीक यही हाल अगर नाम सुगंधित औषधि का हुआ। इसके तेल की मांग अरब देशो में बहुत है। यहां तक कि सौ ग्राम तेल के एक लाख रुपये तक मिलते हैं। अरब के कामुक शेख इसके लिए बेकरार रहते हैं। इन सभी जड़ी-बूटियों को जंगल से बाहर निकालने व उन्हें भूटान या नेपाल के रास्ते तस्करी करने के काम में यहां के उग्रवादियों का एकछत्र राज्य है।

एड्स और कैंसर जैसे खतरनाक रोगों का इलाज खोज रहे विदेशी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर है। अमेरिका व यूरोप के कुछ वनस्पति वैज्ञानिक और दवा बनाने वाली कंपनियों के लेाग गत कुछ वर्षो से पर्यटक बनकर भारत आते हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां प्राप्त करते हैं। सन 1998 में मध्य प्रदेश के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया जब वे स्थानीय आदिवासियों की मदद से कुछ पौधों की पहचान कर रहे थे। राजस्थान के रणथंभौर अभयारण्य इलाके में विदेशी लोगों द्वारा कतिपय पौधों के बारे में जानकारी मांगने की बात राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोध में भी उल्लिखित की गई है।

देश के रेगिस्तानी इलाकों में मिलने वाली गूगल (कांपीफोरा वाइट्री) की एक विशेष प्रजाति में हृदय रोग के कारक कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता है। इसी तरह अश्वगंधा को याददाश्त, मानसिक रोगों, शारीरिक दुर्बलता के लिए रामबाण माना जाता है। इसमें कैंसररोधी गुण भी पाए जाते हैं जिस कारण इसकी तस्करी हो रही है। सांस संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए पुश्तैनी रूप से इस्तेमाल होने वाले एक पौधे की भी खासी मांग है, इसे इफेड्रा फोलियाटा कहा जाता है। अमेरिका में इस पौधे से दिल की धमनियों को खेालने की दवा बनाने का प्रयोग चल रहा है। यदि यह सफल हुआ तो विदेशी कंपनियां इन जड़ी-बूटियों को अपने तरीके से पेटेंट करवाकर सारी दुनिया में व्यापार करेंगी । राजधानी दिल्ली का खारी बावली बाजार कई दुलर्भ व प्रतिबंधित औषधियों की खरीद-फरोख्त का अड्डा है। कैंसर के इलाज के लिए प्रयुक्त दवा आइसो हैक्सनीलंपथाइजरिंस भले ही विदेशी औषधि है, लेकिन यह मध्य भारत में मिलने वाले पौधे अर्नेबिया हिस्पीडिसीमा से बनी है। अरावली पर्वतमाला में मिलने वाले पौधे बैलानाइट्स एजीप्टीनिया से ऐसा गर्भनिरोधक तैयार किया गया है जिसका कोई साइड-इफेक्ट नहीं हैं। हिमालय क्षेत्र में मिलने वाले गुलाबी फूलों बरबेरिस एरिस्टाका से आंख की बेहतरीन दवा तैयार की गई है।

यहीं मिलने वाले टेक्सस बकाठा से कैंसर निदान में महत्वपूर्ण दवा मिली है। हेपीटाइटस जैसे घातक रोग का इलाज भी भारत में मिलने वाली बूटी फाइलांथर निसरी में खोजा गया है। नीम भारतीय पेड़ है, लेकिन बावजूद इसके 1995 में यूरोपीय पेटेंट प्राधिकरण ने अमेरिका की कंपनी डब्लूजी ग्रेस एंड कंपनी के नाम नीम के तेल से कीटनाशक बनाने का पेटेंट जारी कर दिया। समय रहते इस निर्णय को चुनौती दी गई जिससे कंपनी का दावा खारिज हुआ। इस घटना से पता चलता है कि किस तरह अमेरिकी कंपनियां ऐसे कामों में सक्रिय हैं। ठीक ऐसा ही हल्दी के साथ भी हो चुका है। दक्षिण एशिया के किसानों के बासमती के पेटेंट पर भी अमेरिकी दावे हो चुके हैं। हमारे पारंपरिक ज्ञान व जैव विविधता का सौदा करने वाले लोग देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं जिसके लिए गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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