उर्दू अख़बारों ने छापा, केजरीवाल का टोपी पहन जाना व्यर्थ

Published: Friday, Dec 30,2011, 01:08 IST
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भारत में छपने वाले कई उर्दू समाचार पत्रों ने अन्ना हज़ारे के अनशन वापस लेने को उनकी घटती लोकप्रियता से जोड़ा है.

इन अख़बारों का कहना है कि अन्ना को अनशन इसलिए वापस लेना पड़ा क्योंकि दिल्ली और मुंबई के मैदानों में कम भीड़ जुट रही थी.

दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ की सुर्खी है, ‘अन्ना की मुहिम टाँय-टाँय फिस्स’, जबकि ‘हमारा समाज’ के संपादकीय का शीर्षक है, ‘अन्ना टीम की कलई खुल गई’.

‘हमारा समाज’ लिखता है कि भारत की भोली-भाली जनता के दिल-दिमाग़ में शायद ये बात नहीं रही होगी कि भ्रष्टाचार की आड़ में अन्ना इस देश को जिस उथल-पुथल की ओर ले जा रहे हैं, वो देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है.

अख़बार लिखता है कि सेक्युलर मीडिया ने शुरू से ही टीम अन्ना के बारे में जो शंकाएँ व्यक्त की थीं, अब उसे बल मिल रहा है.

अख़बार कहता है कि वास्तव में सांप्रदायिक तत्व जिस तरह का लोकपाल बिल केंद्र से पास करवाना चाह रहे थे, उससे सभी पद संघी ताक़तों के हाथों में चले जाते, मगर केंद्र सरकार ने गंभीरता से उनके नापाक़ इरादों को भांपते हुए ऐसी चाल चल दी है जिसके बाद टीम अन्ना और सांप्रदायिक पार्टियों के लिए ना कोई दलील बची है, ना ज़बान.

‘राष्ट्रीय सहारा’ ने लिखा है कि भीड़ जमा नहीं होने और ख़राब स्वास्थ्य के कारण अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन दूसरे ही दिन तोड़ दिया.

इसके साथ ही जेल-भरो आंदोलन समेत सभी कार्यक्रम भी वापस ले लिए गए.

अख़बार ने लिखा कि दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में हुए अनशन के दौरान अन्ना के लोकपाल आंदोलन को जितना जन-समर्थन प्राप्त हुआ था, वो इस बार नहीं तो मुंबई में दिखाई दिया और ना तो दिल्ली में.

‘दैनिक हिंदुस्तान एक्सप्रेस’ की सुर्खी है – ‘अन्ना का ड्रामा ख़त्म’.

अख़बार ने अन्ना को कथित सुधारवादी बताते हुए लिखा है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ परचम उठाने वाले अन्ना हज़ारे ने मज़बूत लोकपाल की मांग के उद्देश्य से अपनी तीन-दिवसीय भूख-हड़ताल दूसरे दिन ही तोड़ दी.

‘हमारा समाज’ का कहना है कि ख़ाली रामलीला मैदान अन्ना की कम होती लोकप्रियता का सबूत है. साथ ही अख़बार ने अन्ना की एक तस्वीर प्रकाशित है और तस्वीर की बाँयीं ओर लिखा है, चलो अब भाग चलें.

‘दैनिक सहाफ़त’ की सुर्खी है, ‘मुंबई में भी अन्ना फ़िल्म फ़्लॉप, स्पांसरों को धचका’.

‘राष्ट्रीय सहारा’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि केवल राजनीतिक पार्टियाँ ही नहीं, बल्कि टीम अन्ना का रवैया भी राजनीतिक है.

अख़बार ने लिखा है कि अन्ना हज़ारे के लिए सरकार या संसद पर दबाव डालने से बेहतर था कि वो लोकसभा चुनाव तक इंतज़ार करते और जनता के बीच जनलोकपाल का मसौदा ले जाकर उनसे अपील करते कि वो इस मसौदे को सौ प्रतिशत पार्टी को ही वोट दें. लेकिन इसके विपरीत वो संसद पर दबाव डालकर लोगों के फ़ैसले का अपमान कर रहे हैं.

साभार बी.बी.सी. हिंदी | चित्र स्त्रोत : फ्रीप्रेसजरनल.कॉम

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