अमे नरेन्द्र भाई ने दिल्ली नई मोकलिये

Published: Wednesday, Jun 06,2012, 09:13 IST
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पिछले दिनों हरिद्वार जाने का अवसर लगा। महानगर की आपाधापी के बीच माँ गंगा का किनारा सदा से ही संतोष और आत्मिक शांति देता आया है। मन में आया, जा कर वहीँ बैठा जाए। पहुँच गए गंगा किनारे, नित अनुशासन में बहने वाली गंगा आज अतिशय वेगवान थी। स्तर मध्यम था, पर शीघ्रता से बढ़ रहा था। गंगा भगवत-चरणों से निकलती है, देश के बड़े हिस्से के लिए प्राणदायिनी का काम करती है, खेतो को सींचती है, कंठ को तारती है, धार्मिक आयोजनों को पूर्णता देती है और मरण पर शरीर को सद्गति। इस के बाद भी इतराती नहीं, अपने हर पुत्र को बराबर का लाड करती है। सारी माएं एक सी ही तो होती हैं..चाहे गंगा माँ हो, या भारत माँ।

आजकल भारत माँ पर अपार संकट हैं। देश की परिस्थिति भयावह है। चारो ओर हाहाकार है। रूपया नीचे जा रहा है, आर्थिक विकास की दरें घट रही हैं, नौकरियां समाप्त हो रही है। काला धन बढ़ रहा है, भ्रष्टाचार का दानव मुंह फैलाए सब कुछ निगले चला जा रहा है। कुल मिलकर परिस्थिति चिंतनीय है। राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भान होने के कारण मन में भी विचारों की उथल-पुथल सी थी। भाजपा के विषय में मीडिया में किस प्रकार की नकारात्मक खबरें आती है, ये सबको पता है। झगडा, टकराव, छीना-झपटी, स्वार्थ -- मीडिया के कुचक्र को न समझ पाने वाला व्यक्ति तो शायद हतोत्साहित होकर संन्यास ही ले ले। पर फिर भी मन में आस जगी रहती है, क्योंकि पता है, माँ के भाल की रक्षा तो उसके राष्ट्रवादी पुत्र ही करेंगे...बस समय अनुकूल आ जाये।

यह परंपरा का प्रवाह है, कभी न खंडित होगा..
पुत्रों के बल पर ही माँ का, मस्तक मंडित होगा..

बैठा गंगा मैया के प्रवाह को देख ही रहा था कि तभी ध्यान चार माताओं की ओर गया। वेशभूषा और बातचीत से लगा कि वे गुजरात से हैं। गुजरात में नरेन्द्रभाई मोदी ने जो उल्लेखनीय काम किये हैं और जिस तरह पूरे संसार में गरवी गुजरात की छवि निखरी है, मन में थोडा आकर्षण बढ़ा और सहसा उनसे बात करने की इच्छा हुई। पर शुरू कैसे करें? इतने में देखा तो उन में से एक माताजी एक बालक को पुकारने लगी जो गंगा का प्रवाह पार कर के बीच में बन गए पत्थरो के ढेर पर जा बैठा था। कहने को तो उस घाट पर ठीक-ठाक भीड़ थी पर शायद ही किसी को उस बालक की परवाह हुई कि यदि प्रवाह अचानक बढ़ गया तो वो बेचारा वापिस कैसे आएगा !! परन्तु उन माताजी ने मोर्चा संभाला और जब तक वो लौट नहीं आया, लगातार कह-कह के, आखिर उसे इस ओर बुला ही लिया और फिर लग गयी आपस की बातो में। और इतने में ही अचानक गंगाजी के प्रवाह में भयंकर तेज़ी आई और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों के भीतर वो पूरा टापू, जहाँ वो बालक अभी कुछ क्षण पहले ही बैठा था, प्रवाह में अदृश्य हो गया। अब मेरी उनसे बात करने की इच्छा और बलवती हुई और मैंने ही साहस कर के कहा कि माताजी, यदि आप न पुकारती तो शायद आज यह बालक बह जाता। सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान तैर गयी, शायद उन्हें हिंदी ठीक से आती नहीं थी, पहले उन्होंने गुजराती में ही बोलने का प्रयास किया, फिर जब उन्हें मेरा शून्य चेहरा देखकर यह आभास हो गया कि मुझे समझ नहीं आ रहा, तो उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी में ही बोलना शुरू किया, "भैया, तेजी बढ़ जाती है, बच्चे उत्साह में रहते हैं, हमारा कर्त्तव्य है कि उनके उत्साह की दिशा ठीक रखें!! यह सुनकर मेरा उनके प्रति आदर और बढ़ गया।

उनका नाम था कमलाबेन पटेल। शायद ऐसी ही किसी बात पर हमारे पूर्वजो ने 'गागर में सागर'  का मुहावरा लिखा था। वो पूछने लगी, भैया कहाँ से हो ? मैं और मेरे अग्रज अभिनव जी, दोनों ही दिल्ली वाले थे, बताते ही बोली, "वहां तो बम फटते रहते हैं, डर नहीं लगता..? हम अमदावाद रहते हैं, वहां बड़ी शांति है। दस साल हो गए, आतंकवादी घुसने की हिम्मत नहीं करते। शर्म तो आई थोड़ी सी, पर दुःख नहीं हुआ। लगा, शायद यही है वो गरवी गुजरात का भाव, जिसके बल पर नरेन्द्रभाई आज पूरे देश में सीना ताने घूमते हैं।

अगला प्रश्न भी उन्होंने ही पूछा, नौकरी है, खा-कमा लेते हो? यह आश्चर्यजनक बात थी..भला देश की राजधानी में रहने वाले से यह सवाल? पर फिर लगा कि शायद औसत गुजराती के रहन-सहन का मापदंड पिछले १० वर्षो में इतना बढ़ गया है कि उन्हें अपने सामने राजधानी भी कुछ नहीं लगती ! आगे भी स्वयं ही बोली, "भैया , गुजरात में आनंद है। सब बढ़िया खा-कमा रहे हैं। नरेन्द्रभाई ने खूब विकास किया है। बिजली जाती नहीं, खूब पानी मिलता है, अपराध नहीं है, न आतंकवादी। इसलिए निश्चिंत होकर घूमने आये हैं। आपकी दिल्ली के बारे में सुनकर तो डर सा लगता है। कितनी चोरी होती है, बम फटते हैं। हम अमदावाद से दिल्ली आये थे, हरिद्वार जाने के लिए, पर दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर नहीं निकले"। अब ये था तो अपमानजनक, पर अब उन्हें कौन समझाए कि माताजी, ठीक है गुजरात स्वर्ग हो गया है, पर बाहर बिलकुल ही नरक नहीं है !! मामला ठीक-ठाक तो है ही !

मैं पूछने की तो ये सोच रहा था कि दिसंबर के चुनावो में कौन जीतेगा, पर उनकी पहले कही गयी बातो ने इस प्रश्न की सम्भावना को ही समाप्त कर दिया था। माताजी बोली, भैया दिल्ली में किसकी सरकार है ? मैंने बताया माताजी, कांग्रेस है। बोली, कांग्रेस को इस बार लाकर गंगा जी में बहा देना यहीं पर। हम तो फिर से नरेन्द्रभाई को जिताएंगे। मैंने कहा "माताजी, हम पर भी कृपा करो, अब नरेन्द्रभाई को दिल्ली भेज दो"। बोली, "नहीं भैया, हम नहीं भेजेंगे, नरेन्द्रभाई तो गुजरात में ही रहेंगे।" मैंने मन में सोचा कि माताजी, आपका यह स्वार्थ देश को बड़ा महंगा पड़ेगा !!

इतना कह के वो माताजी अब चल दी, "भैया हमें कथा सुनने जाना है आश्रम में, कभी अमदावाद आना, तो मिलना जरूर"।.एक कागज़ पर घर का पता लिख के दिया। मैंने उनके चरणों को हाथ लगाया, तो उन्होंने ढेरो आशीर्वाद दे कर हमसे विदा ली।

कहते हैं माँ गंगा पापनाशिनी और मोक्षदायिनी है। जो गंगा में स्नान कर ले, वो सब पापो से मुक्त हो कर नारायण के श्रीचरणों में वास करता है। शायद यही कारण है, गंगा को माँ कहा है। क्योंकि माँ तो वही होती है, जो भले ही उसी क्षण स्नान कर के आई हो और कितने ही स्वच्छ वस्त्र पहन कर बैठी हो, परन्तु सामने से आ रहे अपने बालक को, भले ही वो कितना भी धूल से सना हुआ हो, भाग कर गोद में उठा लेती है। माँ को क्या चाहिए.... संतान का हित .और कुछ भी नहीं। पद्मपुराण में लिखा है:

पाप्बुद्धिम परित्यज्य, गंगायाम लोकमातरि।
स्नानं कुरुत हे लोका, यदि सद्गातिमिच्छितु।|

अर्थात जो दुष्कर्मो को त्यागकर तथा उनको दोबारा न करने का संकल्प ले कर गंगाजी में स्नान करता हैं वह निश्चित ही तर जाता है। गंगा प्रवाहमान है, विचारों की तरह.....निरंतर चलायमान रहती है। अपनी पवित्रता और गतिशीलता से गंगा जी जी अपने रास्ते में आने वाली सारी गन्दगी को धो देती है। आये तो हम भी अपने पापो का खाता निपटाने ही थे, ताकि जाकर नए कर सके, पर उन माताजी ने ह्रदय में इतनी पवित्रता घोल दी, कि डुबकी लगते ही मुख से निकला, "हे गंगा मैया, भारत को परम वैभव पर वापिस पहुँचाने के लिए नरेन्द्रभाई को शक्ति दो और हम में भी साहस भरो कि हम सब इस कार्य को इसकी इति तक लेकर जाए।
हर हर गंगे !

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