२.२ अरब डॉलर से ११ अरब डॉलर, केजीबी दस्तावेज एवं भारतीय मीडिया : सोनिया गांधी का सच

Published: Friday, Feb 03,2012, 22:37 IST
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सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा घूस में लिए गए पैसे को... से आगे | 2.2 अरब डॉलर से 11 अरब डॉलर! : स्विस बैंक में सोनिया गांधी के अरबों डालर जमा होने की बात खुद स्विट्जरलैंड में ही उजागर हुई। यही वह देश है जहां दुनिया भर के भ्रष्टाचारी लूट का धन रखते हैं। स्विट्जरलैंड की सबसे लोकप्रिय पत्रिका श्वेजर इलस्ट्रेटे ने अपने 19 नवंबर, 1991 के एक अंक में एक खास रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें विकासशील देशों के ऐसे 13 नेताओं का नाम था जिन्होंने भ्रष्ट तरीके से अर्जित किए पैसे को स्विस बैंक में जमा कर रखा था। इसमें राजीव गांधी का नाम भी था। श्वेजर इलस्ट्रेटे कोई छोटी पत्रिका नहीं है बल्कि इसकी 2.15 लाख प्रतियां बिकती हैं और इसके पाठकों की संख्या 9.17 लाख है। यह संख्या स्विट्जरलैंड की कुल वयस्क आबादी का छठा हिस्सा है। केजीबी के रिकार्ड्स का हवाला देते हुए पत्रिका ने लिखा, ”पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने नाबालिग बेटे के नाम पर एक गुप्त खाते का संचालन कर रही हैं जिसमें ढाई अरब स्विस प्रफैंक यानि 2.2 अरब डालर हैं।” राहुल गांधी 1988 के जून में बालिग हुए थे। इसलिए यह खाता निश्चित तौर पर इसके पहले ही खुला होगा। अगर इस रकम को आज के रुपए में बदला जाए तो यह 10,000 करोड़ रुपये के बराबर बैठती है। स्विस बैंक अपने ग्राहकों के पैसे को दबा कर नहीं रखता है, बल्कि इसका निवेश करता है। सुरक्षित दीर्घ अवधि वाली योजनाओं में निवेश करने पर यह रकम 2009 तक बढ़कर 9.41 अरब डालर यानी 42,345 करोड़ रुपये हो जाती है। अगर इसे अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह 58,365 करोड़ रुपए हो गई होगी। यदि घूस की इस रकम को आधा दीर्घावधि निवेश योजनाओं में और आधा शेयर बाजार में लगाया गया होगा, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह रकम 50,355 करोड़ रुपए हो जाती है। अगर इस पैसे को शेयर बाजार में लगाया गया होता तो 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से पहले यह रकम 83,900 करोड़ रुपए होती। किसी भी तरह से हिसाब लगाने पर 2.2 अरब डालर की वह रकम आज 43,000 करोड़ रुपए से 84,000 करोड़ रुपए के बीच ठहरती है।

केजीबी दस्तावेज : सोनिया गांधी के खिलाफ कहीं ज्यादा गंभीर तरीके से मामले को उजागर किया रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने। एजेंसी के दस्तावेजों में यह दर्ज है कि गांधी परिवार ने केजीबी से घूस के तौर पर पैसे लिए। प्रख्यात खोजी पत्रकार येवगेनिया अलबतस ने अपनी किताब ‘दि स्टेट विदिन ए स्टेट: दि केजीबी एंड इट्स होल्ड ऑन रसिया-पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ में लिखा है, ”एंद्रोपोव की जगह लेने वाले नए केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव के दस्तखत वाले 1982 के एक पत्र में लिखा है- ‘यूएसएसआर केजीबी ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे से संबंध बना रखे हैं। आर गांधी ने इस बात पर आभार जताया है कि सोवियत कारोबारी संगठनों के सहयोग से वह जो कंपनी चला रहे हैं, उसके कारोबारी सौदों का लाभ प्रधानमंत्री के परिवार को मिल रहा है। आर. गांधी ने बताया है कि इस चैनल के जरिए प्राप्त होने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा आर गांधी की पार्टी की मदद के लिए खर्च किया जा रहा है।” (पृष्ठ 223)। अलबतस ने यह भी उजागर किया है कि दिसंबर, 2005 में केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति से राजीव गांधी के परिवार को अमेरिकी डालर में भुगतान करने की अनुमति मांगी थी। राजीव गांधी के परिवार के तौर पर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मां पाओला मैनो का नाम दिया था। अलबतस की किताब आने से पहले ही रूस की मीडिया ने पैसे के लेनदेन के मामले को उजागर कर दिया था। इसके आधार पर 4 जुलाई 1992 को दि हिंदू में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया, ”रूस की विदेशी खुफिया सेवा इस संभावना को स्वीकार करती है कि राजीव गांधी के नियंत्रण वाली कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए केजीबी ने उन्हें सोवियत संघ से लाभ वाले ठेके दिलवाए हों।’

भारतीय मीडिया : राजीव गांधी की हत्या की वजह से उस वक्त भारतीय मीडिया में स्विट्जरलैंड और रूस के खुलासों की चर्चा नहीं हो पाई। पर जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो भारतीय मीडिया की दिलचस्पी इस मामले में बढ़ गई। जाने-माने स्तंभकार एजी नूरानी ने इन दोनों खुलासों के आधार पर 31 दिसंबर 1998 को स्टेट्समैन में लिखा था। सुब्रमण्यम स्वामी ने श्वेजर इलस्ट्रेटे और अलबतस की किताब के पन्नों को स्कैन कर अपनी जनता पार्टी की वेबसाइट पर डाला है। इसमें पत्रिका का वह ई-मेल भी शामिल है जिसमें इस बात की पुष्टि है कि पत्रिका ने 1991 के नवंबर अंक में राजीव गांधी के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जब सोनिया गांधी ने 27 अप्रैल, 2009 को मैंगलोर में यह कहा कि स्विस बैंक में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के लिए कांग्रेस कदम उठा रही है तब मैंने 29 अप्रैल, 2009 को इन तथ्यों को शामिल करते हुए एक लेख न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा। काला धन वापस लाने के सोनिया गांधी के दावे के संदर्भ में इस लेख में उनके परिवार के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाया गया। जाने-माने पत्रकार राजिंदर पुरी ने 15 अगस्त 2006 को केजीबी के खुलासों पर एक लेख लिखा था। इंडिया टुडे के 27 दिसंबर, 2010 के अंक में राम जेठमलानी ने स्विट्जरलैंड में हुए खुलासे की बात कहते हुए यह सवाल उठाया कि वह पैसा अब कहां है? साफ है कि भारतीय मीडिया ने इन दोनों खुलासों पर बीच-बीच में लेख प्रकाशित किया। माकपा सांसद अमल दत्ता ने 7 दिसंबर, 1991 को 2.2 अरब डालर के मसले को संसद में उठाया था, लेकिन उस वक्त लोकसभा के अध्यक्ष रहे शिवराज पाटिल ने राजीव गांधी का नाम कार्यवाही से निकलवा दिया था। आगे पढ़ें : संदेह का घेरा, २०.८० लाख करोड़ रुपए की लूट और लूटने वाले सुरक्षित

- एस. गुरुमूर्ति ( यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं )

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