क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है...

Published: Sunday, Oct 28,2012, 13:45 IST
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चारों तरह अव्यवस्था, राजनैतिक उठापटक, आरोप-प्रत्यारोपों के बीच प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान व्यक्ति द्वारा अजब मुहावरेदार भाषा का प्रयोग देख-सुनकर सभी हैरान-परेशान है। विपक्ष में अनेक स्वर गूंज रहे हैं तो जनलोकपाल बनाने की मुहिम छिछलेदार तक जा पहुंची है। चाटुकार युवराज को लाने की गुहार लगा रहे हैं जो मुम्बई में नित नए फिल्मी दृश्य उपस्थित है। एक के बाद दूसरे चाचा-भतीजे आमने सामने होने की तैयारी कर रहे हैं। करूणानिधि सरकारी खेमे में हैं या विपक्ष में, वे स्वयं भी नहीं जानते क्योंकि वे बंद का समर्थन करते हैं लेकिन सरकार को समर्थन भी जारी है। नितिश स्वयं को उसके साथ बता रहे हैं जो उनके राज्य को विशेष दर्जा देगा। मुलायम कभी कठोर तो कभी पिलपिले नजर आ रहे हैं। भाजपा के ही एक पूर्व मंत्री एफडीआई पर सरकारी राग अलाप रहे हैं। ऐसे में प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के देशगान को याद करना सामयिक होगा ...

# क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।
बिन अदालत और मुवक्किल के मुकदमा पेश है।
 
# आंख में दरिया है सबके दिल में है सबके पहाड़ आदमी भूगोल है, जी चाहा नक्शा पेश है।
क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।
 
# हैं सभी माहिर उगाने में हथेली पर फसल औ हथेली डोलती दरदर बनी दरवेश है।
क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।
 
# पेड़ हो या आदमी कोई फर्क पड़ता नहीं लाख काटे जाइए जंगल हमेशा शेष है।
क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।
 
# प्रश्न जितने बढ़ रहे घट रहे उतने जवाब होश मं भी एक पूरा देश यह बेहोश है।
क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।
 
# खूंटियों पर ही टंगा रह जायेगा क्या आदमी? सोचता, उसका नहीं यह खूंटियों का दोष है।
क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।

क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है। बिन अदालत और मुवक्किल के मुकदमा पेश है। आंख में दरिया है सबके दिल में है सबके पहाड़ आदमी भूगोल है, जी चाहा नक्शा पेश है। क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है। हैं सभी माहिर उगाने में हथेली पर फसल औ हथेली डोलती दरदर बनी दरवेश है। क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है। पेड़ हो या आदमी कोई फर्क पड़ता नहीं लाख काटे जाइए जंगल हमेशा शेष है। क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है। प्रश्न जितने बढ़ रहे घट रहे उतने जवाब होश मं भी एक पूरा देश यह बेहोश है। क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है। खूंटियों पर ही टंगा रह जायेगा क्या आदमी? सोचता, उसका नहीं यह खूंटियों का दोष है। क्या गजब का देश है यह, क्या गजब का देश है।


सच ही तो है गजब का देश है जहाँ देश की समस्याओं पर विचार करने के लिए बनी संसद मौन है लेकिन सड़कों पर शोर है। शोर है महंगाई का, बेरोजगारी का, विदेशी पूंजी निवेश के खतरों को, अव्यवस्था का, विदेशों में जमा काले धन की वापसी की मांग का, जनलोकपाल का और उन सब पर भारी है देश के योग्य, ईमानदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा डीजल के दामों में वृद्धि, रसोई गैस के सिलिंडरों की संख्या सीमित करने तथा एफ.डी.आई, जैसे ज्वलंत मुद्दों पर राष्ट्र के नाम संदेश में यह कहने का कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। इससे पहले भी आदरणीय प्रधानमंत्री जी ‘सौ जवाबों से बेहतर है मेरी खामोशी’ जैसी टिप्पणी कर काफी अपयश बटोर चुके हैं। आश्चर्य है कि परेशान जनता को सीधे-सीधे संवाद करने की बजाय वे नित नए जुमले उछाल रहे है।

‘पैसे पेड़ों पर नहीं लगते’ बहुप्रचलित जुमला है जिसे कड़ी मेहनत करने के बाबजूद अपने परिजनों की आवश्यकताओं पूरी करने में असमर्थ इस देश का आम आदमी बोलता है। इस जुमले में उसकी बेबसी छिपी रहती है। आखिर पैसे कमाने के लिए खून-पसीना एक करजा हो और उसके बाद भी उसे अपनों से उलाहना मिले तो वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिवाय इस तरह के जुमले उछालने के। लेकिन इस देश का प्रधानमंत्री ऐसा कहे तो आश्चर्य से अधिक क्षोभ होना स्वाभाविक है।

एक ओर देश में रिकार्ड भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं। इस सरकार का वर्तमान कार्यकाल एक से बढ़कर एक घोटालों से सड़ांध मार रहा हो और माननीय प्रधानमंत्री जी लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार पर नकेल काने में असक्षम साबित हो रहे हो, उन्हें क्या अधिकार है कि रोजी-रोटी के लिए परेशान देश के आम आदमी का मुंह इस तरह से जुमलों से बंद करवाने की कोशिश करें। आज यह जगजाहिर है कि देश की स्थिति अच्छी नहीं है। आमदनी घट रही है, खर्च बढ़ रहे हैं, यानि साधन सूख रहे है ऐसे में एक महान अर्थशास्त्री लोगों को आखिर किस भाषा में समझाने का प्रयास करता है? लोग उनसे पूछना चाहते है कि यह सत्य है कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाला कुछ लोगों के लिए पैसे का पेड़ क्यों है? सरकार द्वारा डीजल के दाम बढ़ा दिए, सस्ते गैस सिलेंडरों की सीमा तय कर दी। इस पर विपक्ष ने भारत बंद का आह्वान किया तो सरकार की सहयोगी ममता बनर्जी ने समर्थन वापस ले लिया। आश्चर्य तो यह है कि समर्थन वापस लेते हुए वे बंद और हड़ताल की राजनीति को गलत बताती हैं जबकि उनका सारा राजनैतिक जीवन धरना, प्रदर्शन और हड़तालों से रंगा हुआ है। एक ओर आम आदमी की सबसीड़ी छीनी जा रही है तो दूसरी ओर कॉरपोरेट सेक्टर को भी वर्ष लगभग चार से पांच लाख करोड़ रुपयों की रियायतें (करों में छूट आदि के रूप में) दी जा रही है।

आश्चर्य कि कॉरपोरेट सैक्टर को मिल रही इस दोगुनी छूट पर सभी दल खामोश हैं। यदि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते तो प्रधानमंत्री जी को यह बताना चाहिए कि आखिर उनके आठ वर्षों के शासन में पैसे कहां गायब हो गए। 2004 में देश पर करीब ढाई लाख करोड़ रुपयों का कर्ज था, जो अब बढ़कर साढ़े पांच लाख करोड़ को पार कर गया है। 2004 में उनकी सरकार रोज 200 करोड़ रुपए कर्ज ले रही थी आज यह बढ़कर 1560 करोड़ रुपए रोज का हो गया है। पिछले आठ सालों में सरकार की आय तीन गुना बढ़ी है लेकिन कर्ज साठ गुना बढ़ चुका है। सरकार मस्त तो विपक्ष भी कम व्यस्त नहीं दिखाई देता। स्वयं प्रमुख विपक्षी दल के एक नेता अरुण शौरी एफडीआई पर सरकारी नीति के समर्थक हैं। वे डीजल महंगे करने के भी समर्थक हैं लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उनका दल उनसे असहमति व्यक्त करने के बावजूद उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं करता।

यह दोहरापन विपक्ष की उसकी हैसियत पर प्रश्न चिन्ह लगाता है तो कभी भ्रष्टाचार -विरोधी आंदोलन शुरू करने वाली अन्ना टीम का दीया टिमटिमा रहा है। दरअसल उन्हें यह गलतफहमी हो गई कि जनता उनके साथ है। जबकि सच्चाई यह थी कि लोग राजनैतिक व्यवस्था से असंतुष्ट थे परंतु उस निरंकुश अरविंद के साथ भी वे कैसे जा सकते हैं जो अपने साथियों के प्रति असहिष्णु हो। जिसे अन्ना अपनी तस्वीर और नाम तक इस्तेमाल करने से रोक दे। रामदेव की छवि यह बन रही है कि वे कालाधन वापस लाने से अधिक अपने साम्राज्य को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और उस पर समस्या यह है कि वे स्वयं को उस आंदोलन के स्वम्भु प्रवक्ता, नेता, नियामक और भाग्य विधाता समझने की भूल कर रहे हैं।

यह निर्विवाद है कि भ्रष्टाचार कोई छोटी समस्या नहीं है। इसे केवल राजनैतिक व्यवस्था पर आरोपित करने मात्र से काम चलने वाला नहीं है क्योंकि यह एक सामाजिक से भी बढ़कर नैतिक समस्या है और इसके लिए इस समाज का अंग होने के नाते हम सभी दोषी हैं। इसका निदान ढूंढने की बजाय हम एक दूसरे को दोषी ठहराने में लगे हैं। सरकारे भी राजकोषिय घाटे को पूरा करने के लिए निरिह जनता को निचोड़ने में लगी है क्योंकि यही समाधान उसे आसान नजर आता है। चुनाव के मौके पर चंदा देने वाले बड़ों को छेड़ना उसे घाटे का सौदा नजर आता है। दिल्ली में बिजली के दाम अजीब ढ़ंग से बढ़ाने वालों को जनता से ज्यादा प्राइवेट कम्पनियों के हितों की चिंता है वरना क्या कारण है उनके कार्यालय लगातार आधुनिक होते जा रहे हैं। हर दफ्तर में एसी लेकिन जनता को पंखा तक नहीं। घर खर्च से ज्यादा बिजली का बिल अजब नहीं तो और क्या है? हर दल दलदल बना केवल अपने बारे में सोच रहा है। उसके दलाल नेता भी स्वयं अथवा अपने परिवार को स्थापित करने की चिंता में डूबे हैं। अगर उनका काम ‘यहाँ’ नहीं हुआ तो उन्हें ‘वहाँ’ जाने से भी कोई परहेज नहीं। राजनैतिक विचारधाराएं भ्रष्टाचार और आत्मकेन्द्रित तूफान में विलिन हो चुकी है। युवा पीढ़ी को अपनी अजब-गजब जिंदगी से ही फुर्सत नहीं। ऐसे में किसी वैचारिक क्रांति की बात करने वाले दिवा-स्वप्न ही तो देख रहे हैं। आखिर उन्हें भी तो इस अजब-गजब देश में ऐसा करने का अधिकार है!

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