दीप से दीप चलो जलाते, नहीं होगा अंधकार कभी...

Published: Monday, Nov 12,2012, 16:50 IST
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दीवाली को दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ’योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति यानी प्रकाश की ओर जाइए’ कथन को सार्थक करता है। दीवाली अंधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की रात दीयों की रोशनी से जगमगा उठती है। अमावस्या के गहन अंधकार के विरुद्ध नन्हें दीपकों के प्रकाश का संघर्ष रूपी संदेश देना ही इस त्योहार का मूल उद्देश्य है। यहां अंधकार का अर्थ मन के भीतर के नकारात्मक भावों से हैं वहीं दीपक उसी मन में छिपे बैठे सकारात्मक भावों का प्रतीक है।

दीवाली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। दीवाली क्यों मनाई जाती है, इसके पीछे कई प्राचीन कथाएं और मान्यताएं छिपी हैं। पर सब कहानियों से मिली सीख यही समझाती है कि सत्य की हमेशा असत्य पर जीत होती है। माना जाता है कि दीवाली के दिन चौदह वर्ष के वनवास और लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करने के पश्चात श्री रामचंद्र अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे थे। अपने परम प्रिय राजा श्रीराम के आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे।

तब से आज तक यह दिन भारतीयों के लिए आस्था और रोशनी का त्योहार बना हुआ है। भगवान राम के लौटने की खुशी में आज भी लोग दीवाली का त्योहार मनाते हैं और दीए जलाते हैं। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था और उसके बन्दीगृह से अनेकों राजाओं और 16000 राज कन्याओं का उद्धार किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने भगवान कृष्ण का अभिनन्दन करने के लिए अगले दिन अमावस्या को घी के दीए जलाए थे।

एक पौराणिक कथा के अनुसार विष्णु जी ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था। इसी दिन समुद्रमंथन के बाद लक्ष्मी व धनवंतरि प्रकट हुए थे। आज ही के दिन समुदमंथन से भगवती लक्ष्मी के जन्म होने की प्रसन्नता के उपलक्ष्य में उत्सव मनाने का उल्लेख है और देवी लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था।

इसके अलावा 1619 में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ग्वालियर की जेल से रिहा हुए थे। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है। पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दोनों दीवाली के दिन ही हुआ। उन्होंने दीवाली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली। भारतीय संस्कृति के महान जननायक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने दीवाली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया।

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