श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्

Published: Tuesday, Oct 30,2012, 01:55 IST
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          अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते ॥
          गिरिवरविंध्यषिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
          भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
          जयजय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १॥

          सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि धुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
          त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
          दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणिदुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २॥

          अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवन प्रियवासिनि हासरते
          शिखरिशिरोमणि तुंगहिमालय शृंग निजालय मध्यगते
          मधुमधुरे मधुकैतभभंजिनि  कैटभभञ्जिनि रासरते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥

          अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते
          रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते।
          निजभुजदण्ड निपातितखण्ड  विपतितमुण्ड भटाधिपते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥

          अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
          चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
          दुरितदुरीह दु्राशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५॥

          अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे
          त्रिभुवन मस्तक शूलविरोधि शिरोधिकृतामल शूलकरे।
          दुमिदुमितामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत तिग्मकरे
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥

          अयि निजहुङ्कृतिमात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रचते
          समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते।
          शिवशिव शुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पित भूत पिशाचरते
          जय  जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७॥


          धनुरनुसङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदंगनटत्कटके
          कनक पिशंग पृषत्कनिषंगरसद्भट शृङ्ग हतावटुके।
          कृतचतुरंग बलक्षितरंग घटद्बहुरंग रटद्बटुके
          जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥

          जय जय जप्यजये जय शब्दपरस्तुति तत्पर विश्वनुते
          भण भण भिन्जिमि भिंक्रतनूपुर सिंजितमोहित भूतपते ।
          नटितनटार्ध नटीनटनायक नाटितनाट्य  सुगानरते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥

          अयि सुमन: सुमन: सुमन: सुमन: सुमनोहर कान्तियुते
          श्रितरजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्र वृते ।
          सुनयनविभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमरधिपते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥

          सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
          विरजितवल्लिक पल्लिकमल्लिकभिल्लिकभिल्लक वर्गवृते।
          सितकृतफ़ुल्ल समुल्लसितारुणतल्लज्पल्लव सल्लल्लिते
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११॥

          अविरलगण्डगलन्मदमेदुर  मत्तमतङ्गज राजपते
          त्रिभुवन भूषण भूतकलानिधि रुपपयोनिधि राजसुते।
          अयि सुदतीजन लालसमानस मोहनमन्मथ राजसुते
          जय जय हे महिसासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२॥

          कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
          सकलविलास कलानिलयक्रम केलिवलत्कल हंसकुले ।
          अलिकुल संकुल कुवलय मण्डल मौलिमिलद्र्कुलालिकुले
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३॥

          करमुरलीरववीजित कूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
          मिलितपुलिन्द मनोहर गुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
          निजगुणभूत महाशबरीगण सद् गुणसंभृत केलितले
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥


          कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत  चन्द्ररुचे
          प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।
          जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भरकुंजरकुम्भकुचे
          जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५॥

         विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
         कृतसुरतारक संगरतारक संगरतारक सूनुसुते।
         सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते
         जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥

         पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनंसशिवे
         अयि कमले कमलानिलये कमलानिलय: स कथं न भवेत् ।
         तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
         जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥

         कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु सिंचिनुतेगुण रंगभुवं
         भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम् ।
         तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
         जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८॥

         तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
         किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
         मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुतक्रियते
         जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥

         अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
         अयि जगतोजननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासिरते ।
         यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुतामपाकुरुते
         जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २०॥

                   ॥ श्रि दुर्गा गायत्रि ॥
        ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि ॥
        तन्नो दुर्गि: प्रचोदयात ॥

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