शक्ति का स्रोत पदार्थ से परे है : क्या संसार केवल भौतिक पदार्थों का या प्रकृति की ही रचना है?

Published: Friday, Apr 27,2012, 01:10 IST
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अधिकांश वैज्ञानिकों का मत है कि संसार केवल भौतिक पदार्थों का या प्रकृति की ही रचना है! उसके मूल में कोई ऐसी चेतन या विचारशील सत्ता नहीं है जिसे हम ईश्वर कह सके या जीव या आत्मा कहे!
 
भारतीय तत्वदर्शन में इन शब्दों को वैज्ञानिक भी बनाकर कहा गया है, इसलिए चेतन की कल्पना असंदिग्ध नहीं है! कठोपनिषद के पदार्थ से भी सुक्ष्म सत्ता का ज्ञान कराते हुए उपनिषदकार लिखते है :-

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः!
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महँ परः!!
महतः परमव्यक्त्मव्यक्तात पुरुषः परः!
पुरुषात न परं किंचित सा काष्ठा सा परागति!! – १/३/१०, ११

अर्थात इन्द्रियों से सूक्ष्म उनके विषय और इन्द्रियों के अर्थ से भी मन सूक्ष्म है! मन से बुद्धि और बुद्धि से भी आत्मा सूक्ष्म है, अव्यक्त अचिन्त्य आत्मा से भी परे अर्थात सूक्ष्म, पुरुष है! पुरुष से परे कुछ भी नहीं है! वही अंतिम स्थान और परे की गति है!

ब्राह्मण ग्रंथों में, शंकर ब्रह्मसूत्र, मानव धर्मशास्त्र तथा गीता में उसे अज और क्षेत्रज्ञ दो नामों से पुकारा है! वास्तव में ईश्वर की व्याख्या के लिए यही दो शब्द सर्वाधिक वैज्ञानिक है! प्रकृति का कार्य ब्रह्माण्ड की रचना, यदि आत्म- चेतना को प्रकृति का ही गुण मान लिया जाये तो फिर वैज्ञानिक प्रत्येक तारो में जीवन क्यों नहीं मानते है? फिर तो किसी भी रूप में प्रत्येक पिंड में जीवन होना चाहिए, पर ऐसा नहीं है एवं अभी तक वैज्ञानिको की उपकरणों की ज्ञान में नहीं आया है! यद्यपि वह प्रकृति के कण-कण में समाविष्ट है पर वह दृश्य नहीं वह क्षेत्रज्ञ है, अर्थात प्रत्येक क्षेत्र को अच्छी तरह जानने वाला है!

आनंदिवातम स्वधया तदेकम!! – ऋग्वेद १०.१२९.२
वह बिना प्राण-वायु के जीवित, प्रकृति से संयुक्त किन्तु अद्वितीय है!

उपनिषदकार की यह मान्यताएं कपोल कल्पित कर दी गई होती, वेद के ज्ञान को ठुकरा दिया गया होता यदि विज्ञान उस सूक्ष्मता के अध्ययन की ओर अग्रसर नहीं होता!
प्रतिपदार्थ कोई स्थूल द्रव्य न होकर वास्तव में वैसा दर्शन या अनुभूति है, जिसमे समय, गति और पदार्थ समासीन दिखाई देता है! वास्तव में यदि इस नए निष्कर्ष को क्षेत्रज्ञ के साथ तुलना करे तो स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी निराकार सत्ता की स्थिति अकाट्य है, जो स्वयं पदार्थ में होकर भी पदार्थ से परे है, अद्वितीय है! इसे जीव, आत्मा, विचार,ज्ञान,अनुभूति, मन, बुद्धि इस तरह की कोई संज्ञा कह सकते है!

इससे भी महत कल्पना तो प्रतिब्रह्मांड की है! अब वौज्ञानिक यह विश्वास करने लगे है कि ब्रह्माण्ड के निर्माण में, जिससे हम परिचित है, केवल वही द्रव्य या पदार्थ कार्य नहीं कर रहा वरन एक उसी के गुणों वाला किन्तु उसके विपरीत एक और तत्व होना चाहिए, उसका नामकरण अभी से कर दिया गया है पर उसकी जानकारी अधूरी है! इसका मूल कारण परमाणुओं में प्रतिपरमाणुओं की उपस्थिति है! ऋण और धन आवेश पास-पास आते ही एक दूसरेको रद्द कर देते है! उसी प्रकार यह दोनों दो प्रकार के तत्व एक दूसरेके विपरीत पड़ने के कारण परस्पर इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाते है कि उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है!

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी यही लिखा है -

गिरा अरथ जल-बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न!
बन्दौं सीताराम पद जिन्हहिं परं प्रिय खिन्न!!

जो केवल दुखियों के दुःख दूर करने में निरंतर रत है, उन प्रकृति और परमेश्वर को एक दूसरेसे अलग नहीं किया जा सकता है! वे वाणी में भाव और जल में तरंग की भांति इस तरह गुंथे है कि उन्हें अलग अलग कदापि नहीं किया जा सकता!

जो वस्तु है, पर दिखाई नहीं देती है, उसके अस्तित्व को कैसे स्वीकार किया जाये, किस प्रकार उसे देखा जाये और अनुभूति कैसे की जाये – यह एक जटिल समस्या है! भारतीय तत्वदर्शन के आधार पर ऐसी योग पद्धतियाँ विकसित की गयी है जिसके अभ्यास से इन सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति की जा सकती है! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि आदि साधन ऐसे ही हैं, जिनसे आत्मचेतना के विभिन्न स्तरों का क्रमिक विकास होता है और अन्न या पदार्थों की क्रमशः सूक्ष्म होती अवस्था – रस, रक्त, मांस, अस्थि, वीर्य, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि का तात्विक ज्ञान होता है, पर यह ऐसी कष्टसाध्य, समयसाध्य तथा श्रद्धा और विश्वासभूत प्रक्रियाएं है, जिन पर आज का पढ़ा लिखा बुद्धिमान व्यक्ति सहज ही आस्था नहीं प्रकट कर सकता! तर्क की कसौटी पर मान्यताएं सही नहीं उतरती! आज की प्रत्येक बात विज्ञानं के तरीके से स्वीकार की जाती है! यद्यपि उपरोक्त तरीके आत्मविकास के वैज्ञानिक प्रयोग ही हैं, पर उनका वैज्ञानिक विश्लेषण न हो पाने से ही तथाकथित तार्किक व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो पाते है! उन्हें ईश्वरीय उपस्थिति और आत्मकल्याण के सूत्र वैज्ञानिक ढंग से ही समझाए जा सकते है! अब विज्ञानं इस स्थिति में आ गया गया है जब भारतीय तत्वदर्शन को हल्का बनाकर उन्हें भी इन सत्यों से परिचित कराया जा सके!

न्यूटन के गूत्वाकर्षण नियम को सार्वभौमिक नियम बनाने में कठिनाई हो रही है! फ्रेंच वैज्ञानिक पॉल काऊडर्क ने अपनी पुस्तक The Expansion of The Universe – p.196 में लिखा है कि - तारामंडल का दूरगमन न्यूटन के सिद्धांत को तोड़ता है! गुरुत्वाकर्षण के अनुसार तो पदार्थो को सिमित होना चाहिए, वह फैलता क्यों है?

वस्तुतः न्यूटन को जो श्रेय मिला वह तो हमारे पितामह भीष्म को मिलना चाहिए हो Einstein से अधिक समीप हैं! भूत पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए उन्होंने युधिस्ठिर से कहा था -

भूमै: स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्र्सवात्मना, गन्धो भारश्च शक्तिश्च संघातः स्थापना धृति . महाभारत – शांति पर्व . २६१

हे युधिष्ठिर! स्थिरता, गुरुत्वाकर्षण, कठोरता, उत्पादकता, गंध, भार, शक्ति, संघात, स्थापना, आदि भूमि के गुण है. (भीष्म पितामह)

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण (बल) कोई शक्ति नहीं है बल्कि पार्थिव आकर्षण मात्र है. – Einstein

यह गुण भूमि में ही नहीं संसार के सभी पदार्थो में है की वे अपनी तरह के सभी पदार्थो को आकर्षित करते है एवं प्रभावित करते है. इसका सबसे अच्छा विश्लेषण कई हजार वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने "सादृश्य एवं आन्तर्य" के सिद्धांत से कर दिया था! गुरुत्वाकर्षण सादृश्य का ही उपखंड है! सामान गुण वाली वस्तुए परस्पर एक दूसरेको प्रभावित करती है! उससे आन्तर्य पैदा होता है!

"अचेतनेश्वपी, तद-यथा-लोष्ठ क्षिप्तो बाहुवेगम गत्वा नैव तिर्यग गच्छति नोर्ध्वमारोहती प्रिथिविविकारः प्रिथिविमेव गच्छति – आन्तर्यतः! तथा या एता आन्तरिक्ष्यः सूक्ष्मा आपस्तासां विकारो धूमः! स आकाश देवे निवाते नैव तिर्यग नवागवारोहती! अब्विकारोपि एव गच्छति आनार्यतः! तथा ज्योतिषो विकारो अर्चिराकाशदेशो निवाते सुप्रज्वलितो नैव तिर्यग गच्छति नावगवरोहति! ज्योतिषो विकारो ज्योतिरेव गच्छति आन्तर्यतः! (१/१/५०)

चेतन अचेतन सबमें आन्तर्य सिद्धांत कार्य करता है! मिट्टी का ढेला आकाश में जितनी बाहुबल से फेका जाता है, वह उतना ऊपर चला जाता है, फिर ना वह तिरछे जाता है और ना ही ऊपर जाता है, वह पृथ्वी का विकार होने के कारण पृथ्वी में ही आ गिरता है! इसी का नाम आन्तर्य है! इसी प्रकार अंतरिक्ष में सूक्ष्म आपः (hydrogen) की तरह का सुक्ष्म जल तत्व का ही उसका विकार धूम है ! यदि पृथ्वी में धूम होता तो वह पृथ्वी में क्यों नहीं आता ? वह आकाश में जहाँ हवा का प्रभाव नहीं, वहां चला जाता है- ना तिरछे जाता है ना निचे ही आता है! इसी प्रकार ज्योति का विकार 'अर्चि' है! वह भी ना निचे आता है ना तिरछे जाता है! फिर वह कहा जाता है ? ज्योति का विकार ज्योति को ही जाता है!"

इस आन्तर्य के सिद्धांत से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म सभी तत्वों का विश्लेषण कर सकते हैं ! इनमे सभी स्थूल द्रव्य आदि अपने-अपने क्षेत्र की ओर चले जाते है! पर प्रत्येक क्षेत्र का अनुभव करने वाला अर्चि कहाँ जाता है ? उसे भी आन्तर्य सिद्धांत से कहीं जाना चाहिए! उसका भी कोई ब्रह्माण्ड और ठिकाना होना चाहिए, जहाँ वह ठहर सके! जब इस प्रकार का ध्यान किया जाता है तब एक ऐसी उपस्थिति का बोध होता है जो समय, ब्रह्माण्ड, और गति से भी परे होता है! वह कारण चेतना ही ब्रह्म है!

योग का उद्देश्य शरीरस्थ क्षेत्रज्ञ को उस कारण सत्ता में मिला देना है! आन्तर्य सिद्धांत ध्यान की इसी स्थिति को सिद्ध करता है!इसीलिए इसे प्रतिगुरुत्वाकर्षण बल कहा जा सकता है, अर्थात मन को अन्य सभी विकारों का परित्याग कर केवल चेतना को चेतना से ही, प्रकाश को प्रकाश से ही मिलाने का अभ्यास करना चाहिए! इसी से पदार्थ से परे, राग-द्वेष से परे शुद्ध-बुद्ध, निरंजन आत्मा और परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है!

चन्दन प्रियदर्शी | लेखक से ट्विट्टर पर जुडें

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