नाम संकीर्तन योग कलियुग के लिए सर्वोत्तम साधना क्यों है ? - वंदे मातृ संस्कृति

Published: Monday, Dec 26,2011, 18:21 IST
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Vanse Matra Sanskriti, Chanta, Mantras, Tanuja Thakur, Hindutva, IBTL

कलिकाल में साधारण व्यक्ति की सात्त्विकता निम्न स्तर पर पहुँच गयी है ऐसे में वेद उपनिषद् के गूढ़ भावार्थ को समझना क्लिष्ट हो गया है। अतः ज्ञानयोग की साधना कठिन है। वर्तमान समय में लोगों के पास दस मिनट पूजा करने के लिए भी समय नहीं होता अतः अनेक वर्ष ध्यान लगाकर ध्यान योग की साधना भी संभव नहीं। उसी प्रकार कर्मकांड अंतर्गत यज्ञयाग करना भी वर्तमान समय में कठिन हो जाता है क्योंकि यज्ञयाग के लिए सात्त्विक सामग्री एवं सात्त्विक पुरोहित का होना अति आवश्यक है और यह भी आज के समय में मिलना कठिन हो गया है साथ ही यज्ञयाग के लिए कर्मकांड के कठोर नियमों का पालन करना, यह भी सरल नहीं। अतः कलियुग के लिए सबसे सरल मार्ग है भक्ति योग और उसके अंतर्गत नाम संकीर्तन योग, यह सबसे सहज और सरल साधना मार्ग है।

अब हम नाम संकीर्तन योग महत्व के विषय में देखेंगे। मनुस्मृति में कहा गया है।

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विता: ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्तिषोडशीम् ।। (मनुस्मृति २.८६)

अर्थात गृहस्थद्वारा जो चार महायज्ञ (वैश्वेदेव, बलिकर्म, नित्य श्राद्ध एवं अतिथि भोजन) प्रतिदिन किये जाते हैं, जपयज्ञ का फल इस सब कृतियों के फल के कई गुना अधिक होता है। नाम जप में जप शब्द की व्युत्पत्ति 'ज' जोड़ 'प' से हुई है जप शब्दका अर्थ है 'जकारो जन विच्छेदकः पकरो पाप नाशक:' अर्थात जो हमें जन्म और मृत्यु के चक्र से निकाल कर हमारे पापों का नाश करता हैं उसे उसे जप कहते हैं। साधना की अखंडता नामजप से ही संभव है।

यदि हमें उस अनंत परमेश्वर से एकरूप होना है तो हमें अखंड साधना करनी होगी और ज्ञानयोग के अनुसार ग्रथों का अखंड पठन करना या ध्यानयोग के अनुसार अखंड ध्यान लगाना या त्राटक या प्राणायाम करना या भक्तियोग अनुसार अखंड भजन करना, पूजा करना, तीर्थ करना या कीर्तन प्रवचन सुनना परन्तु यह भी २४ घंटे संभव नहीं। साथ ही गृहस्थ के लिए घर-द्वार, बाल-बच्चे, नौकरी-चाकरी, सब सँभालते हुए साधना में अखंडता बनाये रखने का सबसे अच्छा साधन है नामजप करना।

कुछ व्यक्ति को यह भ्रान्ति होती है कि आसन और प्राणायाम के माध्यम से हम आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं। यह अपने आप में एक गलतधारणा है। आसन और प्राणायाम हमारी आध्यात्मिक प्रगति करवाने की क्षमता नहीं रखते हैं। वे मात्र हमारी स्थूल देह एवं प्राण देह की कुछ सीमा तक शुद्धि कर सकते हैं। इन देहों की शुद्धि अन्य साधना मार्गसे भी संभव है। अतः आध्यात्मिक प्रगति में आसन एवं प्राणायाम को विशेष महत्व नहीं दिया जाता है।

इसका एक उदहारण देती हूँ। झारखण्ड के गोड्डा जिले में एक परिवार एक योगासन सिखाने वाले गुरु के मार्गदर्शन में अनेक वर्षों से आसन एवं प्राणायाम करते हैं और अन्यों को भी सिखाते हैं परन्तु उस परिवार के सभी सदस्य को अनेक शारीरिक एवं मानसिक कष्ट है क्योंकि उस परिवारके पितर अत्यंत अशांत है और घर में कुलदेवी का प्रकोप भी है और योगासन की क्रिया से शरीर की शुद्धि तो हो सकती है पितरों को गति नहीं मिल सकती और न ही कुलदेवता प्रसन्न हो सकते हैं इन सब कष्टों के निवारण हेतु योग्य साधना ही करनी पड़ती है और जब से उस परिवार ने योग्य प्रकार से साधना करने आरम्भ किये है तबसे उनके कष्ट का प्रमाण कम हो गया है। आसन और प्राणायाम उन व्यक्तियों के लिए योग्य है जो और कोई मार्ग से साधना नहीं कर पा रहे हों। आसन और प्राणायाम के माध्यम मात्र से शरीर की शुद्धि होती है और शारीरिक क्षमता बढ़ने के कारण प्रारब्ध के तीव्रता भोगने की शक्ति मिलती है।

मात्र शरीर की शुद्धि और प्रारब्ध के बीच कोई सम्बन्ध नहीं होता। किसी भी योगमार्ग से साधना करने पर स्थूल देह एवम प्राण देह का अधिकाधिक २०% और ३०% तक ही शुद्धि होती है और स्वर्ग एवं उसके आगे के लोक अर्थात महा, जन, तप या सत्य लोक तकके आध्यात्मिक प्रवास हेतु सभी देहों की पूर्ण शुद्धि परम आवश्यक है और नामजप से हमारे चारो देह अर्थात स्थूल देह, मनो देह अर्थात मन, कारण देह अर्थात बुद्धि तथा महाकारण देह अर्थात अहंकी पूर्ण शुद्धि संभव है। यही नाम संकिर्तन योग का महत्व है। भगवन श्री कृष्ण ने श्री मदभगवदगीता नाम जप के महत्व के बारे में कहा है।

अन्तकाले च मामेव स्मरण मुक्त्वा कलेवरम |
य: प्रयाति मदभावं यातिनाश्त्यत्र संशय: ||
 
अर्थात मृत्यु के समय जो मेरा स्मरण करता है वह मुझे प्राप्त होता है इसमें कोई संशय नहीं है। वेद और धर्मग्रंथ सनातन धर्म के आधार हैं। परमेश्वर ने श्रृष्टि का संगोपन करने हेतु उसकी उत्त्पत्ति के समय ही वेदों की निर्मिती की। मात्र ईश्वर का नाम वेदों से श्रेष्ठ है क्योंकि वेदों की निर्मिति भी ओमकार अर्थात ईश्वर के नाम से हुई है। अतः संत भक्तराज महाराज ने कहा है कि नामजप वेद उपनिषद् जैसे धर्मग्रंथों के परायण से अधिक श्रेष्ठ है। नामजप साधन और साध्य दोनों ही है। जब हम प्रयत्नपूर्वक नामजप करते हैं तो वह साधन होता है और जब नामजप स्वतः और अखंड होने लगे तो साध्य हो जाता है।

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अब प्रश्न यह की नामजप कब करना चाहिए ?
नाम जप के लिए सर्वोत्तम काल है ब्रह्म मुहूर्त। यदि हम ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नामजप करते हैं तो उस समय वातावरण में अत्यधिक चैतन्य विद्यमान होता है क्योंकि ऋषि, मुनि, तपस्वी उसी समय उठकर साधना करते है इस कारण ब्रह्मांड की सत्त्वित्कता अधिक होती है। परन्तु यदि हम ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नामजप न कर पायें तो हम क्या करें ?

एक बात का ध्यान रखें कि नामजप करना महत्वपूर्ण है यदि ब्रह्म मुहूर्त में अत्यधिक नींद आ रही हो तो उस समय नामजप करने की अपेक्षा अपनी प्रवृति अनुसार जिस समय नामजप अच्छी तरह से हो उस समय नामजप करना सर्वोत्तम होता है। उत्तम प्रकार से नामजप करनेपर ५% सात्त्विकता बढती है तो नींद के प्रभाव में येन-केन-प्रकारेण नामजप करने से १% सात्त्विकता बढती है। इस बात का ध्यान रखें कि दिन की शुरुआत नाम जपसे करें जैसे की हमने अपनी दिनचर्या में ही डाल दिया है कि सुबह उठने के पश्चात प्रथम दो घंटे नामजप करुँगी तत्पश्चात ही अन्य सेवा आरम्भ करेंगे। इससे मुझे दिनभर सेवा करने की शक्ति तो मिलती ही है, साथ ही वर्तमान समय में अनिष्ट शक्तियों का कष्ट बढ़ रहा है अतः सुबह के नामजप से मुझे दिनभर अनिष्ट शक्तियों के कष्ट से रक्षण होता है, मेरे ऊपर नामजपका कवच रहने के कारण मेरी कार्यक्षमता तो बढ़ ही जाती है, मन भी संपूर्ण दिवस आनंद में रहता है और नामजपका संस्कार दिनप्रतिदिन बढ़ता जाता है | अतः यह संस्कार यदि हम अपने दिनचर्या में डाल सकते है तो वह अति उत्तम होगा | जैसे कुछ लोग सुबह उठकर एक घंटे सर्वप्रथम समाचारपत्र पढ़ते हैं। आजकल समाचारपत्र में क्या रहता है, कहीं दंगे हो गए, कहीं बाढ़ आ गया, तो कहीं डकैती हो गयी अथवा नेताओं के भ्रष्टाचार से सम्बंधित समाचार तो होते हैं यह सब पढ़कर मन सुबह-सुबह खिन्न हो जाता है अतः दिन की शुरुआत इश्वर के नाम स्मरण से करने का प्रयास करना चाहिए। बड़े शहरों में सुबह से कार्यालय जाने की भागा-दौड़ी आरम्भ हो जाती है ऐसे में कार्यालयके लिए जाते समय जब आप वाहन द्वारा प्रवास कर रहे हों तो नामजप करने का प्रयास करें।

आजकल मेट्रो शहरों में एक विकृत पद्धति देखने को मिलती है, सुबह स्वयं के चार पहिये वाहन में लोग जहाँ बैठते हैं, सीधे एफ.एम. रेडियो चेनल आरम्भ कर देते हैं और दिन की शुरुआत राजसिक और तामसिक गानों से करते हैं। उसी समय का सदुपयोग आप नामजप करने के लिए कर सकते हैं। वाहन में नामजप की ध्वनि चक्रिका अर्थात सी.डी. लगा सकते हैं या किसी संतके गाये हुए भजन लगा सकते हैं या संस्कृत स्त्रोत्र लगा सकते हैं। ऐसा करनेसे नामजप करने के लिए पोषक वातावरण निर्माण हो जाता है और मन एकाग्रचित होकर नामजप करने लगता है। आधुनिक शोध के अनुसार हमारे जीवनके ८०% शारीरिक और मानसिक समस्याओं का मूल कारण साईकोमेटिक होते हैं अर्थात अशांत मन के कारण होते हैं अतः हमने मन को शांत रखने के उपाय अवश्य ही करने चाहिए और मनको शांत करने का नामजप से अच्छा साधन और सरल साधन कुछ हो ही नहीं सकता। नामजप करने से इश्वर की कृपा तो सम्पादित होती ही है साथ ही हमारे मन में आने वाले अनावश्यक विचार भी कम हो जाते हैं।

ध्यान में रखें हमारे विचारों की संख्या जितनी कम होगी हमारी व्यव्हार्रिक और अध्यात्मिक क्षमता उतनी ही बढ जाती है। चार पहिये वाहन में आप अपने गुरु की या इष्टदेवता के चित्र लगा सकते हैं उसमें वाहन शुद्धि संच लगा सकते हैं। इस सबसे धीरे-धीरे आपका वहां एक सत्त्त्विक स्थान बन जायेगा और आपके साधना का एक स्थल भी। यह मुद्दा मैं क्यों बता रही हूँ क्योंकि जब नामजप करने के लिए कहा जाता है तो सर्वप्रथम अधिकतर लोग यही कहते हैं कि नामजप करने के लिए समय नहीं मिलता। यह कलियुग है माया अपने चरमपर है अतः हमें बुद्धिमानी से अपने दिनचर्या में ही समय निकालकर साधना करने का प्रयास करना चाहिए। जो बस से कार्यालय जाते हैं वे भी नामजप करते हुए जा सकते हैं आजकल अनेक व्यक्ति को देखा है वे भ्रमण ध्वनि अर्थात मोबाइल में फ़िल्मी गाने लगाकर बस में प्रवास करते है, आप उसके स्थान नामजप हेतु पोषक अध्यात्मिक भजन, स्त्रोत्र या नाम जप लगा कर सुनने का प्रयास करें।

यदि आप सार्वजनिक वाहन से प्रवास करते हैं तो नामजप आरम्भ करने से पूर्व अपने गुरु या इष्ट देवता से इस प्रकार प्रार्थना कर सकते है "हे भगवान, मैं अभी नामजप करने जा रही हूँ मेरा नामजप एकाग्रता पूर्वक होने दें, मेरे शरीर, मन एवं बुद्धि के चरों अभेद्य सुरक्षा कवच निर्माण हो जिससे कि आसपास के वातावरण एवं व्यक्तियों के रज-तमका मुझपर प्रभाव न हो और मैं अखंड नामजप करने का प्रयास का प्रयास कर सकूँ ऐसी आप कृपा करें " इस प्रकार के प्रयास करने से कुछ ही दिनों आपकी कितनी ही भीड भाड वाले स्थान में हों आपका मन शांत हो नामजप करने लगेगा।

रामनाम टेढो भला !

वेद एवं मन्त्रों का उच्चारण सही होना आवश्यक है अन्यथा हमें उनके अशुद्ध उच्चारणसे हमें कष्ट होता है मात्र नामजप हम किसी भी प्रकार कर सकते हैं ऐसा क्यों ?
पाणिनिय व्याकरण में कहा गया है।

अनक्षरं हतायुष्यं विस्वरं व्यांधिपीडितम्‌ । अक्षता शस्त्रषरूपेण वज्रं पतति मस्तके ।।

अर्थात व्यंजन वर्ण के अशुद्ध उच्चारण से आयुका नाश होता है और स्वर वर्ण के अशुद्ध उच्चारण से रोग होते हैं, अशुद्ध उच्चारणसे युक्त मंत्रद्वारा अभिमंत्रित अक्षत सिरपर वज्रपात सामान गिरता है। परन्तु नामजप के सन्दर्भ में पञ्चरत्रगम नामक धर्म शास्त्रमें कुछ इस प्रकार कहा गया है,

मूर्खो वदति विष्णाय बुधो वदति विष्णवे। नं इत्येव अर्थम् च द्वयोरपि समं फलं ||

अर्थात मुर्ख व्यक्ति अयोग्य उच्चारण कर विष्णाय नमः कहता है और बुद्धिमान व्यक्ति विष्णवे नमः कहता हैं परन्तु दोनों का हेतु नमन करना है अतः दोनों को सामान फल मिलता है। देसी भाषामें इसलिए कहा गया है रामनाम टेढो भला। इस सन्दर्भ में एक अनुभूति बताती हूँ। अक्टूबर १९९९ में झारखण्ड के बोकारो जिले में एक मंदिर में साप्ताहिक सत्संग लिया करती थी। एक दिन मैं कहीं जा रही थी,एक अनपढ़ स्त्री राह में मेरी दो पहिये वाहन को रोक कर अत्यंत भावपूर्ण होकर बोलीं, "मैं आपको कुछ बताना चाहती हूँ" मैंने कहा, "क्या" ? उसने बताया कि तीन महीने पहले एक दिन मंदिर के बाहर वह किसी के घर का बर्तन नल पर धो रही थी और उसने नामजप के विषय में मुझे सत्संग लेते हुए ध्वनिप्रक्षेपक (लाउडस्पीकर) के माध्यम से सुना था। उसने अपने हाथ पैर की ओर दिखाते हुए कहा, "चर्मरोगसे मेरा शरीर लगभग सड गया था और आपके बताये जप करने पर मेरा चर्म रोग ठीक हो गया"। उसके शरीर पर चर्म रोग के हलके धब्बे, निशान के रूप में दिख रहे थे। मुझे यह सुनकर अत्यंत आनंद हुआ क्योंकि मैं उससे कभी मिली भी नहीं थी और तब भी वह नामजप कर रही थी। मैंने यूँ ही पुछा, "आप कौनसा जप कर रही हैं" ? उसने कहा, "श्री गुरुदेवे दत्ते नमः" ! मैं मुस्कराने लगी तो उसने कहा, "क्या मुझसे कोई चूक हो गयी" ? मैंने कहा, "हाँ, नामजप सही पद्धति से नहीं कर रही हैं" और मैंने उसे ‘श्री गुरुदेव दत्त' जप करने के लिए बताया और उसी समय उसे पांच बार दोहराने के लिए भी कहा। उसने आनंद पूर्वक अपनी जपमें सुधारकर मुझे कृतज्ञतापूर्ण नमस्कार कर चली गयी। मैं वहीँ खड़ी उपर्युक्त श्लोकका स्मरण कर मुस्कुराने लगी। वह स्त्री अनपढ़ थी अतः वह जप सही प्रकार से नहीं कर पाई परन्तु हेतु शुद्ध था अतः उसे अनुभूति हुई।

उस स्त्री को अतृप्त पितरों के कारण कष्ट था और उसी कारण उसे चर्मरोग हो गया था, 'श्री गुरुदेव दत्त' अर्थात दत्तात्रेय देवता का जप करनेसे उसके पितरों को गति मिल गयी और उसका कष्ट समाप्त हो गया। यद्यपि उसने जप को सही पद्धति से नहीं जपा तथापि उसके भावके कारण उसे योग्य लाभ प्राप्त हुआ अतः कहते है "न पुण्य तारक है और न पाप मारक मात्र भाव ही तारक है"

साभार सुश्री तनूजा ठाकुर

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