जब असम से खूंखार उग्रवादी आर्ट ऑफ़ लिविंग, बंगलुरु पहुंचे

Published: Monday, Aug 06,2012, 10:09 IST
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जब 24 वर्षीय डिमसा विद्रोही बिनोद (परिवर्तित नाम) अपनी 3 दिन लंबी ट्रेन तथा सड़क यात्रा के पश्चात असम से बंगलुरु पहुंचकर बस से उतरे तब उन्हे शायद ही यह पता था कि वे एक पूर्ण रूप से बदले हुए व्यक्ति बन जाएंगे, जिसका लक्ष्य भी पूर्ण रूप से भिन्न होगा। बिनोद और उनके मित्र 250 गुरिल्ला लड़ाकों वाले एक उग्रवादी संगठन DHD के सदस्य थे, जिनमे से 231 तो कुख्यात यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फ़ा) के सदस्य भी थे।

In Eng : Sowing the Seeds of Peace in Assam
बिनोद व उनके साथी आर्ट ऑफ लिविंग के 1 मासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने हेतु बंगलुरु आए थे। आर्ट ऑफ लिविंग के इस कार्यक्रम का उद्द्येश्य असम से आए इन पूर्व विद्रोहियों के जीवन को सार्थक बनाना था, जिसे असम के गृह विभाग की एक अत्यंत उच्च समिति द्वारा मंजूरी दी गयी थी।

2 जुलाई 2012 को 1 माह की कार्यशाला मे भाग लेने हेतु अपने वाहन से उतरकर आर्ट ऑफ लिविंग अंतर्राष्ट्रीय केंद्र की ओर बढ़ते इन विद्रोहियों के चेहरों पर संदेह तथा आशंका के भाव  स्पष्ट रूप से झलक रहे थे किन्तु केंद्र के स्वागत कक्ष मे उपस्थित सेवकों के मैत्रीपूर्ण व्यवहार की वजह से शीघ्र ही इस संदेह व आशंका का स्थान आश्चर्य तथा अपनेपन ने ले लिया।

अब आगे आर्ट ऑफ लिविंग के शिक्षक श्री संजय कुमार जी, (जिन्होने केंद्र के अन्य कार्यकर्ताओं व शिक्षकों की सहायता से इस 1 माह की कार्यशाला की रूपरेखा बनाई थी) के सम्मुख एक अत्यंत वृहद तथा चुनौतीपूर्ण कार्य था।

श्री संजय कुमार जी के शब्दों मे- "सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती थी इन विद्रोहियों का विश्वास जीतना तथा उनसे केंद्र के अनुशासन का पालन करवाना; क्योंकि उनमे से अधिकतर व्यक्तियों के साथ कोई न कोई शारीरिक अथवा व्यवहारगत समस्या थी। एक बार ये चुनौतियाँ सध जाने के पश्चात कार्य बहुत ही आसान हो गया चूंकि प्राणायाम क्रिया का असर स्वास्थ्यप्रद तथा सकारात्मक बदलाव लाने वाला होता है।

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प्रथम सुदर्शन क्रिया के परिणाम स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक शांति प्राप्त होने की वजह से बिनोद और उनके साथी शांत और सहज महसूस करने लगे। योग, प्राणायाम, अन्य क्रियाएँ तथा केंद्र के साथियों से बातचीत अत्यंत ऊर्जापूर्ण सिद्ध हुए। सायंकाल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था जहां वे प्रफुल्लित होकर गाते और नाचते थे। विश्वास करना कठिन था कि ये वही व्यक्ति हैं जो कुछ दिन पूर्व घने जंगलों मे रहते थे और इतनी अधिक हिंसा के लिए जिम्मेदार थे। उनमे से अधिकांश ने म्यांमार व भूटान के वनों मे हिंसक प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

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जैसे जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया, वे कार्यक्रम मे अधिक सक्रिय होने लगे तथा कई शारीरिक स्वाथ्य लाभों के अतिरिक्त उनकी सोच मे भी परिवर्तन आया। एक प्रतिभागी माइकल के अनुसार- "यह जंगलों मे हमारे जीवन से बिलकुल भिन्न जीवन है। इस कार्यक्रम ने हमारे नज़रिये को वृहद (बड़ा) बनाया है। अब हम अपने देश के विषय मे एक भिन्न दृष्टिकोण से सोचते हैं।"

इसी प्रकार अन्य प्रतिभागियों ने भी कहा कि यदि उन्हे यह ज्ञान पहले मिला होता तो उनके हाथों इतना खून-खराबा कदापि ना हुआ होता। एक अन्य विद्रोही रतुल ने भिन्न पक्ष रखा- "यद्यपि हमारे खानपान की आदतें यहाँ से काफी अलग हैं किन्तु हमे यहाँ अच्छा लग रहा है और यहाँ आकार मेंने स्वयं के, अपने समाज तथा अपने देश के विषय मे बहुत कुछ जाना है। "NIMHANS (National Institute of Mental Health & Neurosciences) के 2 वरिष्ठ प्रोफेसरों द्वारा इन विद्रोहियों पर कार्यक्रम के असर पर शोध किया जा रहा है।

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जीवन का सम्पूर्ण कायाकल्प करने वाले आर्ट ऑफ लिविंग कार्यक्रमों के अतिरिक्त प्रतिभागियों को विभिन्न प्रकार की उद्यमिता केन्द्रित विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाता था क्योंकि कार्यक्रम का उद्देश्य इन लोगों को  आत्मनिर्भर बनाकर उनके पुनर्वसन का उपाय करना था। प्रतिभागियों के एक समूह, जिसने कागज़ से कई तरह के समान बनाने का प्रशिक्षण लिया था, ने स्वहस्त निर्मित वस्तुओं की प्रदर्शनी भी लगाई।

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अंततः जब वे गुरुदेव परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी से मिले, उन्होने अपने विगत जीवन तथा उसकी कठिनाइयों को गुरुदेव के सम्मुख रखा एवं एक नए जीवन की शुरुआत करने की तीव्र आकांक्षा जताई। विद्रोहियों के जीवन को सार्थक बनाने की श्री गुरुदेव की इस पहल हेतु सभी ने श्री गुरुदेव का हृदय से आभार ज्ञपित किया। उनमे से कई व्यक्तियों ने तो श्री गुरुजी द्वारा असम दंगों के पीड़ितों की सहायता हेतु चलाये गए अभियान मे सक्रिय सहयोग करने की इच्छा जताई।

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देश की वर्तमान व्यवस्था के प्रति इन विद्रोहियों का क्षोभ हम सभी की आंखे खोलने हेतु पर्याप्त है। यहाँ तक कि सरकार को भी अब यह समझना होगा कि केवल बल प्रयोग ही इन असंतुष्ट युवाओं से निपटने का उपाय नहीं है। उनके जीवन को संबल देकर सार्थक बनाने वाले स्पर्श की आवश्यकता है जो केवल अध्यात्म ही प्रदान कर सकता है। आर्ट ऑफ लिविंग ने इस कार्यक्रम के माध्यम से इन लोगों जीवन को सँवारा है। इससे पूर्व भी आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा हिंसा मुक्त व तनाव मुक्त समाज के निर्माण हेतु अनेक कार्यक्रम चलाये जाते रहे हैं।

आज हम एक ऐसे दमघोंटू मीडिया माहौल मे सांस ले रहे हैं जो घोटालों, धोखे, भ्रष्टाचार, गंदगी व अपशब्दों से भरा हुआ है। शायद ही कभी कोई ऐसा सुखद समाचार प्राप्त होता है जो हमारे अधरों पर मुस्कान ले आए, जो हमारे हृदय को छू जाए, जो हमे जीवन के प्रति श्रद्धावान बनाए। हमे विश्वास है कि ऐसा हो सकता है। क्योंकि हम ऐसे बदलाव का हिस्सा रहे हैं। इन सच्ची कहानियों के पुनः बताकर हम लोगों को प्रेरित करना चाहते हैं या कम से कम..... पढ़ने हेतु कुछ अच्छा उपलब्ध कराना चाहते हैं। पढ़ने का आनंद लें!

स्रोत : आर्ट ऑफ़ लिविंग सीक्रेट्स

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