अन्ना, रामदेव, भूमि सुधार और व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन का एक सूत्र में बंधना संभव

Published: Wednesday, Nov 28,2012, 00:16 IST
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जिन अभियानों से बड़े बदलाव की देश उम्मीद कर रहा था, उनमें से एक भटकाव के भंवर में फंस गया है। वह अन्ना अभियान है। जब किसी अभियान की चर्चा होती है, तो अन्ना अभियान का ही लोगों को ख्याल आता है, क्योंकि इसने पूरे देश को कुछ दिनों के लिए झिंझोड़ दिया था। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि धीमी गति से ही सही, परंतु पिछले कुछ सालों से कई दूसरे अभियान भी अस्तित्व में हैं और वे समय-समय पर लोगों का ध्यान खींचते रहे हैं। उन अभियानों की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। इन अभियानों में बड़ी संभावनाएं छिपी हैं

अन्ना अभियान शुरू से ही लोकपाल के लिए कानून बनवाने के लिए था। दूसरा अभियान स्वामी रामदेव का है। जो विदेश में जमा अरबों रुपए के कालेधन की वापसी के लिए है। तीसरा अभियान है- भूमि सुधर के लिए। जिसे पी.वी. राजगोपाल के नेतृत्व में चलाया जा रहा है। यह एक मूलगामी समस्या को उठाने और जनमत जगाने का प्रयास है। चौथा अभियान के.एन. गोविन्दाचार्य के संरक्षण में चल रहा है। जो स्वाभिमान आंदोलन के नाम से पूरे देश में जाना जाता है। यह कई मायने में देशव्यापी आंदोलन है। इस अभियान की मांग है कि केंद्र की सरकार अपने बजट का सात फीसद हिस्सा गांवों के लिए आवंटित करे। इस तरह यह अभियान गांवों के पुनर्जीवन के लक्ष्य से प्रेरित है। यह सिर्फ एक कानून बनाने की मांग नहीं करता बल्कि राज्य व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का प्रस्ताव रख रहा है।

इन अभियानों में ऊपरी तौर पर कहीं से कोई समानता नहीं दिखती। ये समानांतर हैं। उसी तरह जैसे रेल की दो पटरी होती है। ये अभियान चार पटरियों के हैं और समानांतर हैं। एक जगह खड़े हो जाइए और इन्हें जहाँ तक नजर जाती हैं वहाँ तक देखिए तो यह भ्रम भी होता है कि ये कुछ दूर बाद आपस में मिल रहे हैं। यह नजर का फेर है और एक भ्रम है। क्या कोई ऐसा सूत्र है जो इन सबको मिला सके? एक पथ पर ला सके? इसके लिए इनमें छिपी एक सूत्रता की खोज करनी होगी। वह एक सूत्रता विचार, व्यवहार, व्यक्ति और उदेश्य की एकता में खोजी जा सकती है। इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। उसकी प्रतीक्षा की जा सकती है।

अन्ना के अभियान से लाखों लोग इसलिए नहीं जुड़े कि वे लोकपाल कानून को अपने सभी दुखों की रामबाण दवा समझते थे। वे इसलिए जुड़े थे कि इसमें उन्हें अनंत संभावना दिख रही थी। इस संभावना को अन्ना की टीम ने बंटे दिमाग के कारण भंवर में फंसा दिया है। जो कल तक अन्ना की टीम थी, वह अब अन्ना की प्रतिद्वंद्वी है। अन्ना अलग रास्ते पर हैं और उनकी पुरानी टीम ने उनसे मुख मोड़ लिया है। वह राजनीतिक महत्वाकांक्षा के सफर पर निकल पड़ी है। अभी दो दिन पहले की बात है। मुंबई से दिल्ली पहुंच कर एक अधेढ़ महिला ने अपने अनुभवों से अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा किया। सभा में ही सवाल पूछा कि आप हमें बताइए कि आप हैं क्या? क्या क्रांतिकारी हैं? क्या राजनेता हैं? क्या अभियानी है? क्या समाज सुधारक हैं? क्या सामाजिक कार्यकर्ता हैं? क्या एनजीओ के मालिक हैं? केजरीवाल ने जवाब देने की कोशिश करने के बजाए यह कहकर टाला कि ‘मैं तो आपको पहचानता ही नहीं?’

क्या इन सवालों का जवाब देने के लिए किसी को पहचानना जरूरी है? बिल्कुल नहीं है। अन्ना अभियान जिन दिनों जोरों पर था, उन दिनों उनके ही साथियों ने मुझसे कहा था कि अरविंद की महत्वाकांक्षा राजनीतिक है और वे राजनीतिक दल बनाने जा रहे हैं। तब विश्वास नही होता था। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए टीम अन्ना का टूटना और अन्ना को उनके हाल पर छोड़ देना क्या किसी समझदारी का सबूत है? एक अभियान के साथ यह गहरा विश्वासघात है। उसे ढकने के लिए अरविंद केजरीवाल अब फुटबॉल की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। कभी कोई उन्हें वाड्रा के खिलापफ फुटबॉल बना देता है, तो कोई उन्हें भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के पाले में गोल करने के लिए इस्तेमाल कर लेता है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता उनसे सवाल पूछ रहे हैं और वह भी 27 सवाल। जरा सोचिए कि सवाल किससे पूछा जाता है? उसी से जिसकी साख पर बट्टा लगने लगता है। इसका यही पहला संकेत होता है। केजरीवाल ने गडकरी पर हमला करके वह सब खो दिया, जिसे उन्होंने पिछले दिनों में एक अभियानी के रूप में अर्जित किया था। गडकरी खुलकर सामने आए और साफ-साफ कहा कि मैं जांच के लिए तैयार हूं। चिल्लर सवालों का जवाब नहीं दूंगा। उसी क्षण केजरीवाल हल्के दिखने लगे। पूर्व पुलिस अध्किारी वाई. पी. सिंह ने यह खुलासा भी कर दिया कि केजरीवाल सिंचाई घोटाले के मुख्य किरदार को बचाने के लिए ही गडकरी पर हमले कर रहे हैं।

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केजरीवाल दल बनाने से पहले ही दलदल में ध्ंसते दिखते हैं, इससे उन लोगों का खिन्न होना स्वाभाविक है, जो अन्ना अभियान से उम्मीद लगाए हुए थे। लेकिन उम्मीद टूटी नहीं है। अन्ना दिल्ली आए थे। यह थाह लेने के लिए कि अभियान की नई टीम बन सकती है या नहीं? वे लोगों से मिलने के बाद बहुत आश्वस्त होकर गए हैं। इसी का परिणाम है कि अन्ना के गांव रालेगण में नई टीम की संभावनाओं पर विचार होने जा रहा है। अन्ना ने घोषित कर दिया है कि वे जनवरी 2013 से देशव्यापी दौरें करेंगे। इस समय अन्ना से जुड़ने वालों में तीन प्रकार के लोग हैं। पहले प्रकार में वे लोग हैं, जो केजरीवाल से द्वेष रखते हैं, लेकिन उनके जैसा ही बनना चाहते हैं। दूसरे प्रकार में वे हैं, जो अन्ना के सहारे 2014 के चुनाव मैदान में उतरने का सपना देख रहे हैं। तीसरे प्रकार में वे हैं, जो लोकपाल के अभियान को व्यवस्था में बदलाव में रूपांतरित करना चाहते हैं और इसी उद्देश्य से वे प्रेरित हैं। अन्ना की टीम कैसी बनेगी यह देखना है। लेकिन जो नाम उभर रहे हैं वे अध्कि विश्वसनीय हैं।

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कालेधन की वापसी को लेकर दूसरा अभियान स्वामी रामदेव का है। स्वामी रामदेव ने जब यह अभियान छेड़ा तब यह माना जाता था कि वे एक बड़ा सवाल उठा रहे हैं। इससे हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था की बहुत सारी काली परतें उघरेंगी। यह मानने के दो आधार थे। एक, स्वामी रामदेव ने अपने योग के शिविरों से एक ख्याति बनाई है। दो, उनको मानने वाले देशभर में फैले लोगों की शक्ति इस अभियान में शामिल हो जाएंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्वामी रामदेव अपने अभियान से भटक गए और फिसल गए। अब यह अभियान प्रश्नों के घेरे में है। परंतु इसे स्वामी रामदेव अपना भटकाव दूर कर पुनर्जीवन दे सकते हैं।

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तीसरा अभियान है पी.वी. राजगोपाल का जो 2008 से एक समझौते पर ठिठका हुआ था। उससे मनमोहन की सरकार ने वादाखिलाफी की। तब के ग्रामीण विकास मंत्री  रघुवंश प्रसाद सिंह ने सरकार की ओर से जो वादे किए वे कोरे कागज साबित हुए। अब वह फिर भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के साथ समझौते से नए रूप में सामने आया है। इस बार अभियान की ताकत दुगनी थी। लेकिन सरकार ने उसे दिल्ली पहुँचने ही नहीं दिया। वह स्थगित हो गया है। राजगोपाल मानते हैं कि इस बार वादाखिलाफी हुई, तो वे अपना अभियान फिर छेड़ेंगे। साफ है कि उनके साथ 2008 से 2012 के बीच काफी वादाखिलापफी हुई फिर भी उन्होंने भारत सरकार के प्रतिनिध्यिों पर विश्वास किया है, यह आश्चर्य की बात है।

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चौथा अभियान गोविंदाचार्य का है, जो जंतर-मंतर पर धरने के जरिए बार-बार प्रगट होता है। इसकी मांग छोटी है और साधरण सी दिखती है। लेकिन इसके प्रभाव और परिणाम पर विचार जिस दिन शुरू होगा उस दिन देश नए आंदोलन की अंगड़ाई में दिखेगा। जो भी अभियान चल रहे हैं वे छोटे हैं या बड़े, इसका ज्यादा महत्व नहीं है। इन अभियानों की बड़ी उपलब्धि यह है की देश में जनजागरण और जनमत बनाने में ये एक हद तक सफल हो रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि वे सीमित हैं। लेकिन सक्रिय हैं। इनकी दिशा और दशा पर भी प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। ये इसी कारण जन आंदोलन का रूप नहीं ले पा रहे हैं। इस बार राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के जंतर-मंतर के धरने में गोविंदाचार्य ने जो भाषण दिया उसे सुनकर यह कहा जा सकता है कि वे आशावान हैं। इन अभियानों में वे अपनी एक सार्थक भूमिका देख रहे हैं। अगर ऐसा हो सका, तो ये अभियान एक अहिंसक 1857 जैसी क्रांति को देश में घटित करने में समर्थ हो सकते हैं। आज संसदीय राजनीति ही इसमें सबसे बड़ी बाधा  बन रही है। इस बाधा को बाईपास कर जैसे ही ये अभियान बढ़ चलेंगे, देश को स्वराज्य यानी अपनी व्यवस्था पाने में एक क्षण भी नहीं लगेगा।

लेखक राम बहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार हैं ...
हिंदी के मशहूर पत्रकार, राय दिल्ली से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक प्रथम प्रवक्ता के संपादक हैं. वे जनसत्ता समाचार पत्र के संपादक भी रह चुके हैं. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सहयोगी रह चुके श्री राय ने बिहार में 1974 के छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी. वे जेपी आंदोलन के ग्यारह सदस्यीय स्थायी समिति से सदस्य थे. राय पहले व्यक्ति थे, जिन्हें 1973 में इंदिरा गांधी सरकार ने आंतरिक सुरक्षा संपोषण अधिनियम- मीसा के तहत जेल जाना पड़ा. बाद में उन्हें दूसरी बार अठारह महीनों के लिए जेल जाना पड़ा. राय 1974 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद संगठन सचिव थे. श्री राय ने ही हवाला घोटाला को सुर्खियों में लाया था. "पुरस्कार- रामबहादुर राय को माधव राव सप्रे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। गत 17 जून,2010 को भोपाल में आयोजित समारोह में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी ने श्रीराय को ये सम्मान प्रदान किया। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें ये पुरस्कार दिया गया।

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