डूसू चुनावों में कांग्रेस ने की है लोकतंत्र की हत्या...

Published: Monday, Sep 17,2012, 15:37 IST
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भारतीय लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और छात्र राजनीति लोकतंत्र की सबसे प्रारंभिक सीढ़ी। मेरा मानना है की अगर भारतीय लोकतंत्र एक जीवमान व्यक्तित्व होता, तो मुझे लगता है की एनएसयूआई और कांग्रेस को कल उनके द्वारा की गई लोकतंत्र की हत्या पर फांसी की सज़ा होती। विगत कई वर्षों की भांति इस वर्ष भी डूसू चुनावों में एबीवीपी का परचम लहराने कई पूरी सम्भावना देखकर देश की सत्ताधारी पार्टी और उसका छात्र संगठन इन हरकतों पर उतर आएगा, इसकी शायद हमें कल्पना भी नहीं थी।

Read in English : Murder of Democracy by Congress in DUSU Elections
यह चुनाव बड़ी ही भयानक परिस्थितियों में हो रहे थे। एक ऐसा समय जब पूरे देश में कांग्रेस के द्वारा मचाई गई लूट के कारण एक निराशा और गुस्से का भाव था और इस देश का युवा भ्रष्टाचार-मुक्त भारत भारत के लिए संकल्पित दिख रहा था, कांग्रेस को शायद अपने पैरों तले से ज़मीन खिसकती साफ़ दिख रही थी। यही कारण, मैं मानता हूँ कांग्रेस को इतने नीचे ले गया कि उसने इन चुनावों को येन-केन प्रकारेण जीतने क़ी ठान ली। 10 दिन चले चुनाव प्रचार और बाद में कॉलेज पैनलों के नतीजों से यह शीशे की तरह साफ़ था की इस बार के डूसू चुनावों में एनएसयूआई का सूपड़ा साफ़ होने वाला है। जिस भी कॉलेज में विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता प्रचार हेतु गए, वहीँ पर छात्रों का अभूतपूर्व समर्थन साफ़ दिख रहा था जो स्वतः ही परिणामों की पूर्वसूचना दे रहा था।



आखिरकार, मतगणना का दिन आया। मैं भी पैनल के साथ मतगणना केंद्र के भीतर था। डूसू के इतिहास में पहली बार मतगणना केंद्र के स्थान में परिवर्तन देखकर हमारा चौंकना स्वाभाविक था परन्तु इसे सामान्य प्रक्रिया मानकर हम बैठे रहे। जब मतगणना शुरू होने को थी और हम अन्दर पहुंचे तो मशीनों की खुली हुई सील देख कर हमारे अध्यक्ष पद के प्रत्याशी अंकित धनञ्जय ने सवाल उठाया की क्यों उनके आने से पूर्व ही सील खोल दी गयी, जबकि यह प्रक्रिया के विपरीत बात थी। वहां बैठे अधिकारी समझाने लगे की हम पर विश्वास कीजिये, ये अभी-अभी खोली गयी हैं। आश्चर्यजनक रूप से प्रत्याशियों और मशीनों के बीच में काफी दूरी थी जिस कारण हम लोग गिनती देखने में असमर्थ थे, हमारे पूछने पर स्थानाभाव की बात कह कर इस को भी टाल दिया गया। इसके बाद अगले 3 घंटों में जब भी हमारे किसी प्रत्याशी ने गिनती जानने की कोशिश की तो यही कहा गया के आप लोग जीत रहे हैं और अंतिम बार लगभग 12 बजे अंकित धनञ्जय तथा विशु बसोया को क्रमशः 4000 और 2400 वोटों से आगे बताया गया।

मतगणना केंद्र के भीतर फोन प्रयोग की अनुमति नहीं थी पर हमारे बार-बार कहने के बावजूद मुख्य चुनाव अधिकारी एस सी दुबे लगातार फोन पर न जाने किन-किन से बात कर रहे थे। लगभग सवा 12 बजे हम लोगो को ज़बरदस्ती खाना खाने के लिए बाहर भेज दिया गया। हमारे प्रत्याशियों के बहुत कहने के बाद भी यह आश्वासन देकर की सारे प्रत्याशी जा रहे हैं, हमें मतगणना स्थल से बाहर भेज दिया गया और फिर आश्चर्यजनक रूप से केवल आधे घंटे के भीतर अध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के अरुण को 5600 वोटो से विजयी घोषित कर दिया गया तथा विशु की सीट पर परिणाम बराबरी का बताया गया। हमारे लिए यह आवाक करने वाली स्थिति थी ... जब हम बाहर निकले थे, तो केवल ४ मशीनों में से परिणाम आने बाकि थे और हमें कहा गया था की आप लोग निर्णायक बढ़त बना चुके हो, अब कोई उलटफेर संभव नहीं। और न जाने उन ४ मशीनों से ऐसा क्या निकला की 4000 का अंतर भी पट गया और हम पर 5600 की लीड भी हो गयी ??

बाहर हमारे कार्यकर्ताओं को, जो धूप में सुबह से खड़े थे, जब यह सब पता चला तो उन्होंने विरोध जाता शुरू किया और वहां नारेबाजी होने लगी। वहां खड़े कांग्रेस नेताओं के इशारे पर पुलिस ने निहत्थे परिषद् कार्यकर्ताओं के ऊपर लाठीचार्ज कर दिया जिसमें हमारे तीनों प्रत्याशियों और पूर्व के पैनल के तीनों पदाधिकारियों को गंभीर चोटें आई हैं| अध्यक्ष पद के प्रत्याशी अंकित की छाती में लाठियां मारी गयी, उनके पैर की हड्डी भी टूट गई। विशु जो श्वास के रोग से पीड़ित हैं, उन पर भी कई लाठियां चली जिस कारण वे अभी तक आईसीयू में भर्ती हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व डूसू उपाध्यक्ष विकास चौधरी और पूर्व संयुक्त सचिव दीपक के भी गंभीर चोटें आई हैं। स्वयं मुझे और हमारे कई अन्य साथियों को पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ा है।

यह बड़ा ही दुखद और आश्चर्यजनक है की इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर जीते हुओं की तो फोटो दिखाई जाती रहीं परन्तु हमारे कार्यकर्ताओं पर हुए अत्याचारों को कहीं नहीं बताया गया। हमारी यह मांग है की इन चुनावो को तुरंत रद्द किया जाए तथा पुनः चुनाव कराये जाए। साथ ही साथ इस पूरे घटना क्रम की जांच करवा कर दोषियों पर सख्त से सख्त कार्यवाही की जाये। हमारा संकल्प है कि जब तक हम दिल्ली विश्वविद्यालय चुनावों की शुचिता को पुनः बहाल नहीं करवा देते, हम चैन से नहीं बैठेंगे। वन्दे मातरम

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vikas yadav

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