एक भी सिख जिंदा न रहे! सज्जन कुमार ने कहा था 84 के दंगों में

Published: Tuesday, Apr 24,2012, 11:23 IST
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२८ साल से न्याय की बाट जोह रहे परिवारजनों के सूखे आंसू और निरपराधों के रक्त की बूंदों के निशानों पर आशा की कुछ बूँदें सी पड़ी हैं। इंदिरा गाँधी के हत्या के बाद कांग्रेस के नेताओं द्वारा कराये गए सिखों के नर-संहार के मामले में बहादुरी दिखाते हुए सीबीआई ने दिल्ली के न्यायालय को बताया है कि कांग्रेस नेता सज्जन कुमार ने पुलिस के साथ मिल कर वो क़त्ल-ए-आम रचा था।  सीबीआई के अधिवक्ता आरएस चीमा ने जिला न्यायाधीश जे आर आर्यन को बताया है कि "आतंकी अनुपात का षड़यंत्र रचा गया था कांग्रेसी संसद सज्जन कुमार और पुलिस द्वारा" और सारा नर-संहार सज्जन के कहने पर कराया गया था।

सज्जन कुमार के अतिरिक्त बलवान खोक्कर, किशन खोक्कर, महेंदर यादव, गिरधारी लाल और कैप्टेन भागमल दिल्ली कैंट क्षेत्र में हुयी हत्याओं के सिलसिले में आरोपी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार ३१ अक्टूबर से ६ नवम्बर के बीच एक भी हत्या नहीं हुई। इस प्रकार हत्याओं के रिकॉर्ड मिटाने के बाद भी स्वयं कांग्रेस सरकार द्वारा स्वीकृत आंकड़ा लगभग ३३०० सिखों की हत्या का है। कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार उसी क्षेत्र में उन दिनों में ३४१ सिखों की हत्या की गयी थी और ३८५ घर, ११० दुकानें और ४५ वाहन जलाए गए थे। सीबीआई ने साफ़ कहा है कि पुलिस ने जान बूझ कर आँखें मूंदें रखी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सज्जन कुमार ने भीड़ से कहा था कि "एक भी सिख जिन्दा नहीं बचना चाहिए"।

जब कांग्रेस के नेता कांग्रेस्सियों की भीड़ को उकसा कर घरों में घुस घुस कर सिखों को काट रहे थे और दिल्ली की सड़के खून में नहा रही थी, सिख महिलाओं और बच्चों को हिन्दू अपने घरों में छिपा रहे थे और सिख पुरुष केश, दाढ़ी काट हिन्दू वेश बनाने पर विवश हो रहे थे, उस समय नरेन्द्र मोदी को मौत-का-सौदागर कहने वाली सोनिया गाँधी के पति राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे और उन्होंने कहा था कि "जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन तो हिलती ही है।" बाद में कैसे कैसे कांग्रेस्सियों के विरुद्ध डाले गए अभियोगों को कमज़ोर करने के लिए सीबीआई पर ना-ना प्रकार के दबाव डाले गए इसका उल्लेख सीबीआई के ही पूर्व प्रमुख श्री एस के दत्ता ने अपनी पुस्तक सीबीआई - टॉप कॉप रिकाल्स में किया है।
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इस सबका परिणाम ये हुआ कि इतने साल बाद भी मुश्किल से ही किसी को सजा मिली है। जिन्हें मिली भी है वो छोटे मोटे अपराधी थे और इस सारे नर-संहार के सूत्रधार कांग्रेस के बड़े नेता सज्जन कुमार, जगदीश टाईटलर, एचकेएल भगत आदि बचे रहे और सत्ता का सुख भी भोगते रहे। तमाम प्रमाण और प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्य होने के बाद भी न्याय का नंगा उपहास उड़ाया जाता रहा। इस सन्दर्भ में कुछ वर्ष पहले एक न्यूज़ चैनल द्वारा इसे कवर किया गया था - इसे अवश्य देखें

 यह भी लज्जाजनक है कि बिना किसी प्रमाण के नरेन्द्र मोदी को 'मास मर्डरर' कहने वाले मीडिया के बुद्धिजीवी ८४ पर कभी अपना मुंह नहीं खोलते। शायद मुंह बंद रखने की कीमत दे दी जाती हो या फिर मन ही इतना 'सेकुलर' बन चुका हो कि केवल १४% अल्पसंख्यकों की त्रासदी दिखाई देती हो, २% अल्पसंख्यकों को देखना ही भूल जाते हो। यहाँ तक कि एक वर्ग द्वारा उसे "हिन्दू-सिख दंगे" कह कर प्रचारित करने का भी प्रयास किया जाता रहा है जबकि हिन्दू तो सिखों को अपनी जान पर खेल कर बचा रहे थे।  सोचने योग्य बात है कि इतने बड़े दंगे करवाए गए और पुलिस की गोली से एक भी दंगाई नहीं मारा। पुलिस ने गोलियां चलायी भी न्यूनतम। जबकि इसके विपरीत गुजरात में हुए दंगों में तो पुलिस की गोलियों से ही लगभग १०० दंगाई मारे गए थे जबकि दूसरे ही दिन से भारतीय सेना के जवान भी गुजरात की रक्षा के लिए तैनात थे। गुजरात पुलिस ने लगभग २४००० मुस्लिमों पहले ३ दिनों में ही बचाया था।
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