कुशवाहा कांड के आईने में भाजपा और कांग्रेस : मापदंडों के मायने

Published: Monday, Jan 09,2012, 12:07 IST
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२०१२ चाल-चेहरा-चरित्र में सबसे अलग होने और ‘पार्टी विद् अ डिफ़रेंस’ का दम भरने वाली भाजपा के लिए संकटों से शुरू हुआ है | पार्टी ने उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले मायावती द्वारा निकाले गए लोगों में से बाबु सिंह कुशवाहा को पार्टी में ले लिया | कुशवाहा पर कई आपराधिक आरोप हैं और एनआरएचएम घोटाले का आरोप तो भाजपा की ही ‘घोटाला उजागर समिति’ ने लगाया था | पार्टी में शामिल होते ही उनके घर सीबीआई का छापा भी पड़ गया | और अंततः ४ दिन तक मक्खी मुँह में ले बैठी भाजपा ने उसे उगल दिया – कुशवाहा के प्राथमिक सदस्यता निलंबित कर दी जो कि उन्हें निष्कासित करने का एक शिष्ट तरीका था | पाठकों को याद होगा कि भाजपा ने डी पी यादव को २००४ में पार्टी में शामिल किया था और दो दिन के भीतर ही अटल बिहारी वाजपेयी की नाराजगी के कारण निकाल भी दिया था |

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Party with a difference - BJP through Kushwaha's prism, in contrast with Congress
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भाजपा के इस ‘आत्मघाती गोल’ को लेकर मीडिया में चर्चाएँ हुई, लेख लिखे गए, राजनैतिक दलों, मीडिया एवं आम जनता में भी भाजपा विरोधियों का उल्लास एवं ऊर्जा दर्शनीय थी | भाजपा का ‘असली चेहरा’ सबके सामने आ गया था | कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी (जो पहले मायावती की बसपा में थे, और उससे पहले मुलायम सिंह की सपा में थे) ने तो यहाँ तक कह डाला कि लाल कृष्ण अडवाणी ने जन चेतना यात्रा इसीलिए की थी ताकि ढूँढ ढूँढ कर ऐसे अपराधी भाजपा में भर्ती किए जा सकें - एक ऐसा वक्तव्य जिसकी अपेक्षा केवल कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से ही की जा सकती थी | एक अपराधी का भाजपा या किसी भी राजनैतिक दल में शामिल होना देश के लोकतंत्र एवं राजनीति के लिए दुःख एवं शर्म की बात है परन्तु जिस प्रकार यह भाजपा विरोधियों के उत्सव मनाने का कारण बन गया, उससे इस बात का संकेत तो मिलता ही है कि उन्हें लोकतान्त्रिक मूल्यों की कितनी चिंता है |

अब आते है थोड़ी तुलनात्मक विवेचना पर | कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री का नाम लोकायुक्त रिपोर्ट में आया और उन्हें लाख कोशिशों के बाद भी भाजपा ने हटा कर ही छोड़ा | वही दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित लोकायुक्त रिपोर्ट में नाम आने के बाद भी अपने पड़ पर सुशोभित हैं | भाजपा के एक अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण कैमरे पर रिश्वत लेते पकड़े गए थे, भाजपा ने उनका राजनैतिक करियर ही समाप्त कर दिया | वहीं कांग्रेस ने अपने प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगने पर जब उसकी जाँच चल रही थी, तभी उन्हें भारत रत्न देकर पुरस्कृत किया | ये बात अलग है कि ६४ करोड़ के घोटाले की जाँच में २५० करोड़ खर्च कर भी सीबीआई सोनिया गांधी के करीबी ओट्टावियो क्वात्रोच्ची के विरुद्ध कुछ नहीं कर पाई | जब तीन चौथाई बहुमत से जीत कर मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती के विरुद्ध मामला बना तो उन्होंने त्याग पत्र दे दिया | वही कांग्रेस चिदंबरम के विरुद्ध प्रमाण सर्वोच्च न्यायालय में रखे जाने के बाद भी उन्हें मंत्री बनाये हुए है |

स्वतंत्र भारत के पहले घोटाले जीप घोटाले के आरोपी कृष्णमेनन को जवाहर लाल नेहरु ने ही दोबारा मंत्री बनाया था | भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की परंपरा वहाँ पुरानी है | शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस, मायावती की बसपा और मुलायम सिंह की सपा जैसी पार्टियों की तो चर्चा करना ही व्यर्थ है | २० मंत्रियों को निकाल कर मायावती ने ये तो स्वीकार कर ही लिया कि उनके मंत्रिमंडल में २० मंत्री अपराधी छवि के या भ्रष्ट थे जो ४.५ वर्ष तक अपनी लूट मायावती से बाँटते रहे और अब ईमानदार छवि बनाने के लिए उनसे पीछा छुड़ाना आवश्यक हो गया था |

यह सच है कि बहुत से भ्रष्ट अथवा आपराधिक छवि वाले नेता ऐसे हैं जिनका अपना बंधा बँधाया वोट बैंक है | यही कारण भी है कि राजनैतिक दल उन पर डोरे डालते हैं | परन्तु यह भी सच है कि अपराधी, भ्रष्ट लोग यदि कांग्रेस, सपा, बसपा आदि में आते हैं तो उन्हें संरक्षण मिलता है | लूट बाँट ली जाती है | जनता भी ये जानती है और इनसे किसी राजनैतिक शुचिता की अपेक्षा भी नहीं करती इसलिए ऐसे मामलों पर कोई शोर भी नहीं मचता | परन्तु जब कोई भ्रष्ट व्यक्ति भाजपा में आता है, तो भीतर बाहर सब ओर उथल पुथल मच जाती है | भाजपा ने एक नेता ने कुशवाहा के वोट बैंक को देखते हुए उन्हें पार्टी में शामिल करवाया | नितिन गडकरी ने जोड़ घटाव कर उसे सहमति दे दी परन्तु उससे पार्टी के ही भीतर लोग इतने असहज हो गए कि पार्टी को उन्हें अंततः निलंबित करना ही पड़ा | अडवाणी, जेटली, सुषमा, उमा सभी विचलित थे | गडकरी के विरुद्ध विद्रोह जैसा माहौल बन गया | उमा भारती ने कह दिया कि चुनाव प्रचार नहीं करेंगी | योगी आदित्यनाथ ने कह दिया कि कुशवाहा को निलंबित न किया तो वो भाजपा छोड़ देंगे | इस बीच नकवी एवं यशवंत सिन्हा ने भीतर की बात भीतर ही रहे इस लिए मीडिया में आ कर बात को घुमाने की भी कोशिश की, पर अंततः भाजपा के अंदर व्याप्त ईमानदार शक्तियों की ही चली और नितिन गडकरी को अपना गुणा-भाग भूल कुशवाहा को निलंबित करना पड़ा |

भाजपा के अंदर जितनी असहजता थी, उतनी ही उसके बाहर भी थी | जनता विचलित, हताश एवं अवाक थी क्योंकि एक भाजपा से ही उसे राजनैतिक शुचिता की आशा रहती है | पर क्षुद्र राजनैतिक लाभ को भूल भाजपा ने अंततः सही निर्णय लेकर जनास्था का सम्मान किया | इसके लिए निश्चित रूप से वो बधाई और अनुकरण की पात्र है | जनता को भी “भ्रष्ट है तो क्या, मेरी जाति का तो है” की भावना से ऊपर उठ कर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में मतदान करना होगा ताकि भारतीय लोकतंत्र संसार के सामने श्रेष्ठ उदाहरण बन कर उभरे |

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