खाने की थाली को महंगी करने में सबसे बड़ा हाथ ग्लोबल वार्मिग का है

Published: Wednesday, Sep 28,2011, 12:46 IST
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सरकारी, ग्लोबल वार्मिग, प्रजातियां विलुप्त, फसलों, डॉ. डेविड लॉबेल

सरकारी आंकड़ों में मात्र 25 रुपये में एक दिन के गुजारे की रूपरेखा तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने क्या इस बात का आकलन किया कि हाल के दिनों में एक थाली भोजन की जो कीमत अदा करते हैं, उसमें ग्लोबल वार्मिग का कितना हिस्सा होता है? आमतौर पर तो लोग यही कहते हैं कि बढ़ती गर्मी ग्लोबल वार्मिग है। यह सच भी है, लेकिन इस ग्लोबल वार्मिग ने हमारी दुनिया को किस कदर बदल दिया है, क्या इसका हिसाब लगाया है हमने। हाल के दशक में हमने महसूस किया है कि साल के सिर्फ दो या तीन महीनों में सर्दी सिमटकर रह गई है। पहाड़ों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है, ग्लेशियर के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।

कई कटिबंधीय द्वीप नष्ट हो गए, कई प्रजातियां विलुप्त हो गई और इसके पीछे का कारण वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिग मानते हैं, लेकिन अब ग्लोबल वार्मिग का असर भूगोल और प्रकृति से आगे बढ़कर हमारी रसोई तक पहुंच गया है। शायद आपको यकीन न हो, लेकिन वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हमारी थाली में रखे भोजन के दामों में दिनोंदिन हो रहे इजाफे का कारण भी ग्लोबल वार्मिग ही है। यानी लंच और डिनर के साथ-साथ दुनिया भर के लोग अब ग्लोबल वार्मिग का बिल भी चुका रहे हैं। शायद हमने कभी सोचा ही नहीं था कि ग्लोबल वार्मिग की वजह से अपनी रसोई का बजट भी बढ़ेगा। आज जब हम किसी होटल में खाना खाने के बाद जो बिल चुकाते हैं उसमें ग्लोबल वार्मिग का बिल भी जुड़ा होता है। यही नहीं वैज्ञानिक चेतावनी भरे स्वर में कह रहे हैं यदि ग्लोबल वार्मिग की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो बहुत जल्द रोटी भी आम व्यक्ति की पहुंच से दूर हो जाएगी।

लंबे अध्ययन के बाद जारी एक रिपोर्ट बताती है कि हमारे खाने की थाली को महंगी करने में सबसे बड़ा हाथ ग्लोबल वार्मिग का ही है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने लंबे शोध के बाद पाया है कि तापमान में हो रही लगातार बढ़ोतरी और बारिश के तौर-तरीके में हो रहे परिवर्तन ने 1980 से लेकर अब तक गेहूं, मक्का, धान और सोयाबीन की कीमतों में 5 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. डेविड लॉबेल और उनके साथी 1980 से ही दुनिया भर के फसल उत्पादक क्षेत्रों में होने वाली वर्षा की नियमितता, तापमान और फसलों के उत्पादन पर अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन यह देखकर वह चौंक गए कि पूरी दुनिया में मौसम में परिवर्तन का असर फसलों पर तेजी से पड़ रहा है। उन्होंने देखा कि 30 साल पहले जब मौसम में खास बदलाव नहीं हुआ था तो फसलों का उत्पादन कितना हुआ करता था और अब स्थितियां बदल गई हैं।

गेहूं का उत्पादन 5.5 प्रतिशत कम हुआ है जबकि मक्का में 4 फीसदी की गिरावट आई है। हालांकि ग्लोबल वार्मिग का असर धान और सोयाबीन के उत्पादन पर इतना नहीं दिखाई दिया है। इसका कारण वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि चूंकि अमेरिका सोयाबीन और मक्का का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और इसने अपने खेतों को ग्लोबल वार्मिग के असर से बचाए रखने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं इसलिए इन फसलों के उत्पादन में खास कमी नहीं आई है। कृत्रिम ढंग से खेतों के वातावरण को एक खास तापमान पर नियंत्रित करने को वैज्ञानिकों की भाषा में ए स्लाइट कूलिंग ट्रेंड्स कहा जाता है जिसे अब चीन भी अपनाने लगा है। डॉ. डेविड लॉबेल का अध्ययन बताता है कि 1950 से अब तक प्रत्येक दशक में दुनिया के तापमान में औसतन 0.13 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन यूनाइटेड नेशंस इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने आशंका जताई है कि आने वाले दशकों के तापमान में पिछले दशकों के मुकाबले 50 गुना ज्यादा रफ्तार से वृद्धि दर्ज की जा सकती है।

इस शोध से जुड़े कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री डॉ. वॉलफार्म श्लेनकर ने कहा कि 1980 से लेकर अब तक मौसम परिवर्तन का असर फसलों के उत्पादन पर पड़ा है जिससे वैश्विक बाजार में कीमतों में 20 फीसदी का उछाल आया है। अपने देश भारत में भी ग्लोबल वार्मिग का असर थाली में नजर आया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन की 2009 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक तापमान में प्रति डिग्री सेल्सियस की बढ़त के साथ भारत में गेहूं की उपज दर में प्रति वर्ष 60 लाख टन की कमी आएगी। वर्तमान गति से तापमान बढ़ता रहा तो गेहूं के उत्पादन में 2020 तक 5.2 प्रतिशत, 2050 तक 15.6 प्रतिशत और 2080 तक 31.1 प्रतिशत की कमी आने की आशंका है। इसी तरह की गिरावट अन्य फसलों में भी आ सकती है।

मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप होने वाली ग्लोबल वार्मिग भी कम खतरनाक नहीं है। जैसे टीवी देखना, कंप्यूटर का उपयोग करना, हीटर का प्रयोग करना, एयर कंडीशनर का उपयोग, वीडियो गेम खेलना, कार से यात्रा करना, लाइट जलाना, पंखे चलाना इत्यादि। मनुष्य की इन्हीं पर्यावरण विरोधी गतिविधियों के कारण कार्बन डाइआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड इत्यादि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और साथ ही जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिग के कारणों से होने वाला एक बहुत बड़ा खतरा स्वास्थ्य के लिए भी है, क्योंकि एक ज्यादा गर्म तापमान वाले विश्व में मलेरिया, येलो फीवर जैसी बीमारियां तेजी से फैलेंगी। इसके साथ ही कई संक्रामक बीमारियां भी पैदा होंगी और उस आधी आबादी जो लागोस या केपटाउन जैसे शहर जहां ग्लेशियर के पिघलने से बढ़े समुद्र का जलस्तर ज्यादा है को बहुत खतरा हो सकता है। ऐसी जमीन पर पिछले दस सालों में धरती के औसत तापमान में 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। आशंका यही जताई जा रही है कि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिग में और बढ़ोतरी होगी। ऐसे में जरूरी है हम कुछ ऐसे उपाय करें, जिससे ग्लोबल वार्मिग की रफ्तार कम हो।

अगर यही स्थिति रही तो वह समय भी आ सकता है, जब हमें पीने के लिए साफ पानी, खाने के लिए ताजा भोजन और सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी शायद नसीब न हो सके। इसलिए अभी भी समय है जबकि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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