राष्ट्रीय नीति के बिना आतंक से कैसे लड़ेंगे — ए के डोवाल, पूर्व खुफिया ब्यूरो प्रमुख

Published: Monday, Sep 26,2011, 11:29 IST
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राष्ट्रीय आतंकरोधी सेंटर, दैनिक जागरण, एनसीटीसी, प्रशिक्षित पुलिस

दिल्ली और मुंबई के ताजा आतंकी हमलों ने हमारे सुरक्षा तंत्र की कमजोरी को फिर उजागर कर दिया है। कड़े व प्रभावी कदमों को लेकर सरकार का असमंजस अभी भी बरकरार है। दो साल पहले सरकार ने राष्ट्रीय आतंकरोधी सेंटर बनाने की बात की थी, लेकिन उस पर अभी तक अमल तक नहीं हो सका। खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख एके डोवाल इस स्थिति को बेहद खतरनाक मानते हैं। उनका कहना है कि देश में आतंक से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति का घोर अभाव है। आतंक और असुरक्षा के मौजूदा माहौल, एनसीटीसी की प्रासंगिकता और उसे बनने में आ रही दिक्कतों पर डोवाल ने दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता नीलू रंजन से विस्तृत बात की।

पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश- प्रधानमंत्री देश में सुरक्षा के माहौल को अनिश्चित बता रहे हैं तो गृहमंत्री आतंक के खिलाफ तैयारियों को अधूरा। आतंकवादियों के आगे सरकार इतनी बेबस क्यों हैं? आतंकवाद से लड़ने के लिए एक राष्ट्रीय नीति का अभाव सबसे बड़ा कारण है। इस नीति में विदेशी मामलों से लेकर स्थानीय पुलिसिंग तक सभी कुछ शामिल है। 26/11 के बाद पाकिस्तान से बातचीत के लिए आतंकियों को सजा देने की शर्त रखी, लेकिन बाद में खुद ही इससे पीछे हट गए और बातचीत शुरू कर दी। वहीं दिसंबर 2004 में पोटा हटाकर साफ कर दिया कि आतंकवाद के खिलाफ सरकार का रवैया सख्त नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ एक राष्ट्रीय नीति बनाना जरूरी है।

इस नीति के अभाव का नतीजा है कि हम न तो आतंकियों को रोक पा रहे हैं और न ही हमला होने के बाद उन्हें ढूंढकर सजा दे पा रहे हैं। राष्ट्रीय आतंकरोधी सेंटर (एनसीटीसी) नहीं बनने से चिदंबरम नाराज हैं। क्या इससे आतंकियों के मंसूबे कुचले जा सकेंगे? यह बहुत ही अहम सुझाव है और इसे क्रियान्वित किया जाना चाहिए। जबतक एनसीटीसी नहीं बन जाता, एनआइए बनाने का कोई लाभ नहीं होगा। इसकी घोषणा 2009 में चिदंबरम ने की थी। पिछले दो सालों में सरकार इसकी रूपरेखा तक नहीं बना पाई है, यह बहुत ही खेदजनक है। एनसीटीसी को दो महीने के भीतर शुरू किया जा सकता है। वह कैसे? एनसीटीसी के तीन मुख्य भाग हैं। आतंकियों के बारे में सभी खुफिया जानकारी एकत्रित करना, त्वरित कार्रवाई कर आतंकियों को खत्म करना और आतंकी घटनाओं की जांच कर उन्हें सजा दिलाना।

बहुविभागीय एजेंसी (मैक) पहले से ही खुफिया जानकारी एकत्रित कर रहा है। वहीं आतंकियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई के लिए एनएसजी और आतंकी घटनाओं की जांच के लिए एनआइए भी पहले से मौजूद है। यदि इन तीनों को एक जगह कर दिया जाए तो वह एनसीटीसी का काम करने लगेगा। उससे जुड़ी बाकी चीजें धीरे-धीरे बनती रहेंगी। लेकिन भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकार की अनुमति के बिना एनएसजी को आतंकियों के खिलाफ सीधे कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार नहीं है? इसके लिए राज्यों में पहले से मौजूद एटीएस को एनसीटीसी से जोड़ा जा सकता है। वे राज्य सरकार के हिस्सा रहते हुए भी एनसीटीसी से जुड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई एटीएस करेगा और केंद्रीय बल के रूप में एनएसजी उसकी सहायता के लिए जाएगा। फिर एनसीटीसी बनाने में दिक्कत कहां है? दिक्कत सरकार की स्पष्टता में है। शीर्ष पर सोच स्पष्ट नहीं होने पर हमेशा भ्रम की स्थिति बनती है और ऐसे में सारे संसाधन होने के बावजूद उसका सही उपयोग नहीं हो पाता है। एनसीटीसी मामले में यही हो रहा है।

एनसीटीसी अकेले पूरे देश में फैले आतंकियों के खिलाफ कैसे कार्रवाई कर सकेगा? उसके लिए पूरे देश में नेटवर्क तो बनाना ही होगा? मानता हूं, एनसीटीसी के सामने यह समस्या आएगी। लेकिन इसके लिए खुफिया ब्यूरो के ढांचे को एनसीटीसी से जोड़ा जा सकता है। यह एकमात्र संगठन है जो पूरे देश में हर जगह मौजूद है और इसके जुड़ने से एनसीटीसी को पूरे देश में कहीं भी कोई भी कार्रवाई करने में दिक्कत नहीं आएगी। इससे खुफिया ब्यूरो और एनसीटीसी के बीच टकराव हो सकता। एक ही अधिकारी दो-दो एजेंसियों के लिए काम कर रहा होगा? एनसीटीसी को खुफिया विभाग का एक भाग होना चाहिए। देश में आतंक के खिलाफ नोडल एजेंसी खुफिया ब्यूरो ही है। मैक इसी का भाग है। खुफिया विभाग का भाग होने से एनसीटीसी को कई दूसरे फायदे भी होंगे। इससे वह आइबी की संचार प्रणाली से लेकर पूरे देश में फैले मौजूदा खुफिया तंत्र का उपयोग कर सकेगा। इतना बड़ा तंत्र खड़ा करने में एनसीटीसी को कई साल लग जाएंगे। एनसीटीसी को स्वतंत्र संगठन बनाकर उसके निदेशक को खुफिया विभाग के विशेष निदेशक का पद दिया जा सकता है। एनसीटीसी शुरू करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?

मेरे ख्याल से सरकार को सबसे पहले एनसीटीसी का एक एक्शन प्लान बनाना चाहिए और मौजूदा संसाधनों के आधार पर इसे तत्काल शुरू कर दिया जाना चाहिए। बाद में धीरे-धीरे इसे मजबूत किया जा सकता है। चिदंबरम ने रक्षा बजट से तुलना करते हुए आंतरिक सुरक्षा के बजट को काफी कम बताया है। क्या इसे बढ़ाने की जरूरत है? मैं रक्षा बजट से आंतरिक सुरक्षा के बजट की तुलना नहीं करूंगा, क्योंकि हमारा रक्षा बजट भी सामरिक वातावरण को देखते हुए काफी कम है।

लेकिन आंतरिक सुरक्षा का बजट बहुत ही कम है। जनसंख्या और पुलिस के अनुपात के मामले में भारत दुनिया में निचली पायदान पर है। दूसरी ओर आंतरिक सुरक्षा के मौजूदा बजट का जिस तरह से हम इस्तेमाल कर रहे हैं, उसमें भी काफी त्रुटियां हैं। पहली त्रुटि यह है कि हम सिर्फ पुलिस का संख्याबल बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। प्रशिक्षित पुलिस कम संख्या में भी ज्यादा कारगार साबित होती है। राज्यों में खुफिया जानकारी जुटाने पर बहुत ही कम खर्च किया जा रहा है। सटीक खुफिया सूचना से जो काम 15 आदमी कर सकते हैं वह 15000 आदमी भी नहीं कर सकते हैं। खुफिया ब्यूरो के प्रमुख ने आतंकियों की नई रणनीति के आगे सुरक्षा एजेंसियों को बेबस बताया है।

आप क्या सोचते हैं? हमें आतंकियों की रणनीति के बदलने के पहले ही बदल जाना चाहिए था। खुफिया ब्यूरो का काम यही है। या तो हम आतंकियों की रणनीति को पहले ही भांप कर उन्हें चौंका दें या फिर वे हमें चौंकाते रहेंगे। खुफिया में पुराने आजमाए नुस्खों की कोई जगह नहीं है।

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