राहुल गांधी के भाषण को नेहरू-गांधी परिवार की असफलता छिपाने की कोशिश

Published: Saturday, Sep 17,2011, 16:28 IST
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राहुल गांधी, नेहरू-गांधी परिवार, अन्ना आंदोलन, भ्रष्टाचार

अन्ना आंदोलन के दौरान लोकसभा में राहुल गांधी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ भारी-भरकम भाषण दिया। उन्होंने घोषणा की, हम केवल इच्छा जताने मात्र से भ्रष्टाचार को अपने जीवन से खत्म नहीं कर सकते। इसके लिए समग्र कार्ययोजना और राजनीतिक कार्यक्रम की आवश्यकता है। सबसे जरूरी है राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना। हमें सुशासन लाने और भ्रष्टाचार मिटाने के संबंध में आजादी के बाद से अधिकांश समय देश की राजनीतिक सत्ता पर काबिज रहे नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी के झूठे वायदों के संदर्भ में इस महान घोषणा का विश्लेषण करने की आवश्यकता है।

जवाहर लाल नेहरू के दिनों से ही नेहरू-गांधी परिवार ने इस तरह के प्रवचन देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार माना हुआ है कि हमें क्या करना चाहिए। लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार पर राहुल गांधी का भाषण इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। अगर आप गूढ़ता की चीरफाड़ करें तो आपको महसूस होगा कि उनकी उद्घोषणा कितनी खोखली है? यह बयान 1970 के दशक में उनकी दादी इंदिरा गांधी द्वारा उछाले गए नारे-गरीबी हटाओ के समान लगता है। 1971 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की और एक साल के भीतर ही उनकी कांग्रेस को देश के अधिकांश राज्यों में भी जनादेश मिल गया, किंतु गरीबी घटाने की कार्ययोजना तैयार करने के बजाए उन्होंने जनसभाओं में आने वाली भारी भीड़ को गरीबी हटाओ के नारे से लुभाया, जैसे उनके पास जादू की छड़ी हो जिसे घुमाते ही गरीबी खत्म हो जाएगी। इस बीच, उनकी सरकार ने अपने चापलूस कार्यकर्ताओं को ऋण मेले में पैसे बांटकर अपने सीमित संसाधनों को लुटा दिया।

सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम बैंकों को फर्जी मेलों में इन तथाकथित ऋणों को बांटने के आदेश दिए गए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस नीति से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की वित्तीय सेहत बिगड़ गई, किंतु इंदिरा गांधी ने कभी इसकी परवाह नहीं की। इसके कुछ साल बाद उनका कार्यकाल पूरा होने पर लोगों को अहसास हुआ कि उनके कार्यकाल में गरीबी हटने के बजाए और बढ़ गई है। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी की बारी थी। जब वह प्रधानमंत्री बने तो उन्हें लगा कि उनकी माता तो गरीबी खत्म नहीं नहीं कर पाईं। गरीबी दूर करने की यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अब राजीव गांधी ने अपने कंधों पर ले ली। अब उन्होंने शब्दजाल पिरोना शुरू कर दिया। अपनी माता की तरह ही उन्होंने लोगों से अपील की कि वे सोच कर बताएं कि हम किस प्रकार गरीबी दूर कर सकते हैं। उनके भाषण आम तौर पर हमें देखना है या हमें सोचना है शब्दों से शुरू होते थे- हमें देखना है कि हम गरीबी को कैसे मिटाएं।

दूसरे शब्दों में, उनकी सरकार को कुछ पता नहीं था कि गरीबी से कैसे निपटा जाए। यद्यपि लोकसभा में 412 सांसदों के साथ उन्होंने जोरदार जीत हासिल की थी, फिर भी गरीबी हटाने के बारे में सोचने और काम करने का काम वह लोगों के जिम्मे ही रखना चाहते थे। मुंबई में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में उन्होंने यह कहकर वाहवाही लूटी कि गरीब कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पीठ पर सत्ता के दलाल बैठे हुए हैं। इस भाषण में उन्होंने दर्शाया कि वह पार्टी से भ्रष्टाचार मिटाएंगे, किंतु दलालों का पत्ता काटने के बजाए उनकी सरकार ने बिचौलियों और दलालों को बढ़ावा दिया, जिनमें से ओट्टावियो क्वात्रोची सरीखे कुछ इटलीवासी भी थे। इससे भ्रष्टाचार और गरीबी दूर करने के उनके खोखले दावों की पोल खुल गई। अब भाषण झाड़ने की बारी राहुल गांधी की है। कभी उनकी दादी ने भ्रष्टाचार को वैश्विक अवधारणा बताया था। यानी इसके खात्मे के प्रयास बेमानी हैं। राहुल गांधी ने हमें बताया कि भ्रष्टाचार से निपटना एक कठिन कार्य है। यह समग्र कार्ययोजना की मांग करता है और इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति होना जरूरी है।

चूंकि स्वतंत्रता के पश्चात देश पर कांग्रेस ने 51 सालों तक राज किया है और पिछले सात सालों से सत्ता पर काबिज है, चूंकि राहुल गांधी कांग्रेस के महासचिव हैं और चूंकि आजादी के बाद से उनके परिवार के सदस्य 38 साल तक प्रधानमंत्री रहे हैं तो क्या हमें इस निष्कर्ष पर पहुंच जाना चाहिए कि पचास सालों से भी अधिक समय तक कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए समग्र कार्ययोजना तक तैयार कर पाने में विफल हो गई है। यही नहीं, राहुल के भाषण से यह भी साफ हो जाता है कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भ्रष्टाचार मिटाने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही प्रदर्शित नहीं की है, जबकि लोगों ने उन्हें भारी बहुमत से जिताया था। अब यह मानकर कि देश इन बातों को भूल चुका है, नेहरू-गांधी परिवार का एक सदस्य खोखली बातों में लिप्त हो गया है। इसी भाषण में उन्होंने कहा था कि मेरे ख्याल से हमारे सामने असल सवाल है कि क्या हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए तैयार हैं?

एक बार फिर वह पूछते हैं कि क्या हम भ्रष्टाचार से लड़ने को तैयार हैं। किसी को क्या अधिकार है कि सत्ता में होते हुए भी अन्य पार्टियों और जनता से इस तरह के सवाल पूछे? इसके बजाए उन्हें तो हमें बताना चाहिए था कि क्यों उनका परिवार और पार्टी पचास से अधिक वर्षो के सत्ता काल में इस समस्या को सुलझाने में असमर्थ रही है। दूसरे, प्रभावी लोकपाल लाने के लिए सरकार पर दबाव डालने के बजाए श्रीमान गांधी टरकाऊ हथकंडे अपनाते हुए सुझाव दे रहे हैं कि लोकपाल भी चुनाव आयोग की तरह एक संवैधानिक संस्थान होना चाहिए। उनके भाषण के तुरंत बाद उनके कुछ प्रशंसकों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि उन्होंने कोई अद्भुत बात कहकर लोकपाल पर बहस को नए स्तर पर पहुंचा दिया है।

मीडिया को यह कहकर राहुल गांधी ने अपने मुंह मियामिट्ठू बनने की कोशिश की कि उनके भाषण ने पूरी बाजी पलट दी। इससे पहले राहुल गांधी शाब्दिक आडंबर आगे बढ़ाएं उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि अतीत में कई अन्य विचारक और प्रशासक यह सुझाव दे चुके हैं कि लोकपाल एक संवैधानिक इकाई होनी चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व ही वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने सुझाव दिया था कि तीन सदस्यीय राष्ट्रीय लोकपाल की तैनाती के लिए संविधान में संशोधन होना चाहिए और तमाम केंद्रीय मंत्री, सांसद और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी इसके दायरे में आने चाहिए। इसके अलावा आयोग ने सिटिजन चार्टर लागू करने का सुझाव भी दिया था। अगर इस आयोग का गठन करने वाले मनमोहन सिंह इन्हीं अनुसंशाओं को लागू कर देते तो अन्ना हजारे के आंदोलन को इतना समर्थन न मिलता और अगर राहुल गांधी इस आयोग की रिपोर्ट पढ़ लेते तो वह किसी अन्य के विचार को अपना बताने की हिम्मत न करते। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 

— ए. सूर्यप्रकाश

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