शिंदे के बोल “आ बैल मुझे मार” ...

Published: Sunday, Jan 27,2013, 21:59 IST
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जब कोई 1 करोड़ डॉलर का ईनामी आतंकवादी किसी लोकतांत्रिक देश की व्यवस्था पर सवाल उठाता है तो स्थिति सोचनीय होने से ज्यादा हास्यास्पद हो जाती है। मुंबई हमले का गुनहगार और कई बेगुनाह लोगों की घोषित- अघोषित सामूहिक हत्या का दोषी मोहम्मद हाफिज़ सईद पाकिस्तान से भारत विरोधी बयान जारी करता है और सीधे भारत की संप्रभुता को चुनौती देने की नाकाम कोशिश करता है और भारत पर आतंकवादियों को प्रश्रय देने का आरोप लगाता है तो यकायक एक कहावत ज़हन में कोंध जाती है “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे”। खैर चोर तो चोर होता है, लेकिन चोर की हिम्मत इतनी बढ़ कैसे गई इस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। दरअसल छेद अपनी ही थाली में हो तो दोष खाने को देना ठीक नही। हाल ही में कांग्रेस के चिंतन शिविर में देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने एक गैर जिम्मेदाराना बयान देकर अपनी ही पार्टी के लोगों को असमंजस में डाल दिया है। अब कांग्रेस को गृहमंत्री का ये बयान न उगलते बन रहा है न निगलते। दरअसल चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी पर देश में आतंकवाद को प्रश्रय देने के आरोप लगा दिए। बात यहीं नही रूकी, शिंदे ने तो यहां तक कहा कि उनके पास सबूत है कि संघ और भाजपा के शिविरों में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

शिंदे के इस बयान में कितनी सच्चाई है इस बात को जानने से पहले जरा इस बात पर गौर किया जाए कि शिंदे के इस बयान के पीछे का सच क्या है। शिंदे खुद को देश के गृहमंत्री से ज्यादा कांग्रेस नेता दर्शाने को ज्यादा तवज्जो देते है। इसलिए कांग्रेस के वोट बैंक को और मजबूत करने की कवायद में शिंदे ने मुसलमानों के एक वर्ग को खुश करने के लिए और अपनी कथित धर्मनिरपेक्ष छवि दिखाने के लिए इस तरह का बयान दिया ताकि जिहाद के नाम पर आतंकवाद करने वाले एक विशेष वर्ग के साथ महज संतुलन बिठाते हुए एक नए आतंक की परिभाषा गढ़ी जाए, जिसे भगवा आतंकवाद या हिंदू आतंकवाद का नाम दिया जाए। यानि ये कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्ष छवि की आड़ में कांग्रेसी नेताओं का सांप्रदायिक खेल बयानबाज़ी के रूप में जारी है। दूसरा ये कि राजनीतिक व्यक्ति को “छपास” या “दिखावे” की एक बीमारी सी होती है। वो जो भी करता है उसके पीछे उसका निहितार्थ प्रचार जुटाना होता है वो प्रचार चाहे नकारात्मक संदर्भों के आसरे ही कमाया गया हो। वो कहते हैं ना “बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा”। और तीसरा ये कि मैं शिंदे के इस बयान को आलाकमान को खुश करने की कवायद के तौर पर देखता हूं। कांग्रेसी नेताओं की नियति रही है कि राष्ट्रवादी मान्यताओं को कमजोर किया जाए, तो फिर शिंदे क्यों पीछे रहते?

खैर ये तो था सुशील कुमार शिंदे के बयान देने का निहितार्थ। अब बात करते हैं शिंदे की अदूरदर्शी सोच से उपजे इस बयान के बाद भारत की किरकिरी की। शिंदे के इस बयान के फौरन बाद भाजपा और संघ ने बयान पर घोर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि इससे दुश्मनों के हाथ ही मजबूत होंगे। हुआ भी ऐसा ही। शिंदे के इस गैरजिम्मेदारी भरे बयान को पाकिस्तान की तरफ से हाथों हाथ लिया गया और हाफिज़ सईद ने फौरन ये कह दिया कि भारत साजिश के तहत पाकिस्तान और उसे बदनाम कर रहा है। सईद ने पाक सरकार से भी कहा कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाकर भारत को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की मांग की जाए। हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे भारत का अंदरूनी मसला बताया मगर भारत को समझौता ब्लास्ट से जुड़े सबूतों को साझा करने की नसीहत भी दे डाली। सवाल यहां ये उठता है कि आखिर पाक किस हैसियत से साझेदारी की बात कर रहा है? सुनों पाकिस्तान की सल्तनत भारत के गुनहगार को गोद में बिठाकर साझेदारी की ये बात कम से कम आपको तो सुहाती ही नही है। लेकिन पाकिस्तान की इस हरकत से ज्यादा अचरज इस बात से होता है कि हमारे देश के गृहमंत्री ने अपनी इस अदूरदर्शिता का परिचय दिया ही क्यों? भारत मूलभूत समस्याओं और आतंरिक चुनौतियों के गहरे भंवर में डूब रहा है। नीति निर्धारण में सरकार की अपंगता और अदूरदर्शिता का नतीजा महंगाई और आर्थिक चुनौतियों सहित सामाजिक असुरक्षा की स्थितियों को बढा रहा है और देश के गृहमंत्री स्वयं भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाले बयानों को गढ़ रहे हैं। सुरक्षित समाज की स्थापना की बजाए जब देश का गृहमंत्री कार्रवाई के अलावा महज बयानबाजी करके राष्ट्र की भावनाओं को आहत करता है तो उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक हो जाता है और उसके होने की प्रासंगिकता पर भी सोचना पड़ता है।

अगर गृहमंत्री के पास संघ और भाजपा की आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता को लेकर कोई साक्ष्य है तो आखिर क्या कारण है कि वो सामने नही आए। 127 साल पुरानी कांग्रेस और 63 साल की जनतांत्रिक व्यवस्था में 5 दशक से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के गृहमंत्री देश में एक नए तरह के आतंकवाद की परिभाषा गढ़ रहे हैं तो आखिर नाकामी किसकी हुई? देश में इस्लामिक आतंकवाद की जनक आखिर किसकी सरकार रही? आपातकाल लगाकर संवैधानिक व्यवस्था को अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करना आखिर किसका सत्ता मंत्र है? संघ पर द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का आरोप गढ़ने वाले ये बताओ कि भारत विभाजन का निर्णय किसने लिया था। देश की विकास दर लगातार नीचे जा रही है। विदेशी निवेश की आड़ में देश को बेचने की कवायद में कौन लगा हुआ है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब नही हैं!  सन् 1925 के बाद से संघ और आज़ादी के बाद से भाजपा विभिन्न गतिविधियों के आसरे भारत में अपनी भूमिका  निभा रहा है तो आखिर इतने सालों में आजतक इनके खिलाफ क्यों देश की विभिन्न सरकारों ने कोई सबूत पेश नही किया? महात्मा गांधी की हत्या हो या बाबरी ढांचे का गिराया जाना दोनों मामलों में संघ की भूमिका को लेकर संदेह जताया गया, मगर हर बार संघ की भूमिका राष्ट्रवादी मान्यताओं पर खरी उतरी। शायद तभी गृहमंत्री की इस भूल का अंदाजा कांग्रेस को हो गया और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी को सफाई देनी पड़ी की भगवा आतंक या हिंदू आतंक जैसी कोई चीज नही होती। कांग्रेस गृहमंत्री के बयान से इत्तेफाक नही रखती। अब गृहमंत्री पर सवाल उठने लगे हैं। कुछ सवाल हमारे भी हैं कि आखिर क्या कारण है कि दिग्विजय सिंह मुंबई हमलों के गुनहगार और जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज़ सईद को ‘साहब’ का विशेषण देते हैं? क्यों दिग्विजय सिंह बटला हाऊस कांड में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के जवान मोहनचंद शर्मा के हत्यारों के परिवारों के प्रति सहानुभूति जताने के लिए आज़मगढ़ का चक्कर लगाते हैं? सच्चाई तो हमें मालूम है कि कौन राष्ट्र का कितना शुभचिंतक है।  राष्ट्र की प्रभुसत्ता और गरिमा ही परम सत्ता की प्राप्ति है। सिर्फ सत्ता को ‘जहर’ कहने भर से काम नही चलेगा। जहर है तो निकालना भी पड़ेगा। अगर ये वक्त पर नही हुआ तो परिणाम भयानक होते हैं, और रही बयानों की सच्चाई की बात तो शिंदे जी ये पब्लिक है ये सब जानती है।

लेखक : अमित कुमार

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