वर्तमान समय में छत्रपति शिवाजी के पथ का अनुकरण करना आवश्यक

Published: Wednesday, May 16,2012, 14:00 IST
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राज्यसभा के सांसद अनिल माधव दवे की पुस्तक 'शिवाजी और सुराज' का लोकार्पण नई दिल्ली स्थित एन.डी.एम.सी. सभागार में आयोजित समारोह में सम्पन्न हुआ। हमारी परम्परा में व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि तत्व का महत्व है। इसलिए किसी व्यक्ति का अनुकरण न कर तत्व को अपना आदर्श मानना चाहिए।

डॉ. साहब ने एक मार्ग बनाया आज वो हमारे बीच नहीं हैं। इसी प्रकार लोकमान्य तिलक ने प्रयत्न किया। तो क्या इन महापुरुषों के बाद वह तत्व नष्ट हो गया? या तो हम निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना करें यह उनके लिए संभव है जो अध्यात्मिक जीवन जीते हैं। किन्तु जनमानस की भावना का प्रकटीकरण हो इसके लिए हमें मूर्ति, सगुण, साकार नायक की जरूरत पड़ती है और ऐसे में हमारे सामने दो ही आदर्श हैं हनुमान और शिवाजी।

जब माता जीजाबाई गर्भवती थी, तो सामान्य सी बात है जिन माताओं को गर्भ होता है, उनकी इच्छा होती है कि विभिन्न प्रकार की वस्तुएं खाएं-पिएं और वह इच्छा आने वाले शिशु के स्वाभाव स्वरूप का निर्धारण करती है। इसलिए माता जीजाबाई से उनकी सहेली ने पूछा आपकी क्या खाने की इच्छा होती है। उन्होंने जवाब दिया कुछ खाने की इच्छा नहीं होती मुझे तो १६ हाथों वाली मां भवानी दिखाई देती है, जिनके हर हाथ में शस्त्र है, मुझे सब पर शासन करने की इच्छा होती है। मुझे दुष्टों को दंडित करने की इच्छा होती है। इस पर सहेली ने कहा कि ये तो भिखारियों के लक्षण हैं। पगली राज करने के लिए थोड़ी ही यहां हैं। राजा तो विदेशी होता है और हम उसकी सेवा के लिए होते हैं।

जब एक राष्ट्र में ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाए कि वहां की प्रजा महान विचारों का अनादर करने लगे, नेतृत्व संबंधी विचारों को निम्न माना जाए तो ऐसे में उस समाज की सोच और व्यवस्था में परिवर्तन हों ये सुनिश्‍चित करना चाहिए और सिर्फ इतना ही नहीं समाज की सोच और व्यवस्था परिवर्तित हो तथा यह सकारात्मक व्यवस्था दीर्घ काल तक बनी रहे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए।

चार सौ साल पहले जिस प्रकार की परिस्थितियां थी आज भी वही परिस्थिति है, अन्तर इतना है कि हम अब स्वाधीन हैं। तब केवल अमीरी और गरीबी का इतना अन्तर नहीं थी, महलों के बगल झोपड़ी नहीं थी। अमीर और गरीब लोग एक साथ रहते थे।

एक विद्यालय में बच्चों को गरीबी पर निबंध लिखने के लिए कहा गया। एक बच्ची थी जो बड़े घर की थी उसे कभी गरीबी का अनुभव नहीं किया थ। उसने लिखा कि गरीबी हर जगह है क्योंकि मेरे घर में जो काम करने वाली बाई आती है वो गरीब है, उसके बच्चे गरीब हैं। इसलिए हम सभी गरीब हैं। आज हमारे बीच समाजिक खाई इतनी गहरी है कि बड़े घर के बच्चों को पता ही न लगे कि गरीबी क्या है, क्योंकि उन्होंने कभी गरीबी देखी ही नहीं, उसका अनुभव ही नहीं किया।

यही शिवाजी की विलक्षणता थी वो राजा थे, किन्तु विरक्त भाव के। कभी भी सुख संपदा के प्रति आक्रशित नहीं हुए। वो स्वयं वेश बदलकर अपने राज्य में घूमते थे समाज का दुख-दर्द उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उसका अनुभव किया था, गरीब बच्चों के साथ खेलते थे। धर्म के प्रति उनकी विशेष रुचि थी। विरक्त तो इतने थे कि एक बार दक्षिण शैलम गए तो वहां उन्होंनें अपना मस्तक तक मंदिर में भेंट करने का निश्‍चय कर लिया था। वो तो सौभाग्य से उनके आस-पास जो लोग थे उन्होंने उनको ऐसा करने से रोका था।

छत्रपति शिवाजी का राज्य भले ही छोटा था लेकिन दृष्टि बड़ी थी। मानसरोवर से दक्षिण सागर तक हिन्दू राज्य है, धर्म का राज्य है ऐसा उनका मानना था। उनके राज्य का आधार धर्म था। काशी का मंदिर टूटा तो औरंगजेब को उसके विरोध में पत्र लिखा कि अब मुझे उत्तर की ओर आना पड़ेगा। उनके पास कला थी जो एक आदर्श नायक में होनी चाहिए। अपने आस-पास के लोगों में से योग्य लोगों की एक टीम खड़ी करना। तथा सही व्यक्ति को सही कार्य सौंपना। जो उसकी क्षमता और प्रतिभा के अनुरूप हो तथा अपने अनुचरों अनुभागियों के समक्ष अपना स्वयं का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना। जो शेष समाज के लिए प्रेरणा बने।

शिवाजी के बाद साया जी की मृत्यु हो गई किन्तु मुगलों के विरुद्ध ३० वर्ष तक संघर्ष चला क्योंकि लोग जागृत हुए, उन्होंने शिवाजी से प्रेरणा जी। जब काशी के गागा भट्ट को यह अनुभव हुआ कि एक ऐसे शासक की आवश्यकता है जो स्वदेशी अर्थात भारतीय हो एवं शासन के सब गुणों से युक्त हो। तो उन्होंने शिवाजी के बारे में सोचा, गुप्त रूप से कुछ दिनों तक शिवाजी के राज्य में रहे और उन्होंने निष्कर्ष निकाला की इस समय देश में जितने भी लोग हैं उनमें शिवाजी ही सर्वश्रेष्ठ हैं।

छत्रसाल औरंगजेब के सेना में थे। लेकिन उनका मन व्यथित हुआ। पास में शिवाजी का शिविर था, वो वहां आए और कहा मुझे आप अपनी सेना में नियुक्त कर लीजिए, सरदार बना लीजिए तो शिवाजी ने कहा कि आप हमारे सरदार नहीं मित्र हैं। उनका मानना था कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है और बिना लड़े यदि जीत हो जाए तो युद्ध की आवश्यकता ही नहीं है। उनमें अपयश सहने की भी शक्ति थी। कई बार शत्रुओं को धोखा दिया अपयश से डरे नहीं पर उन्होंने कहा कि एक ऐसा मित्र बता दो जिसे मैंने धोखा दिया हो। उन्होंने पहली बार अपनी नेवी खड़ी कर विदेशों से प्रिटिंग मशीन मंगवाकर उसका अध्ययन किया फिर भारतीय प्रिटिंग मशीन बनवाने की कोशिश की और बीच में ही उनका देहान्त हो गया। उन्होंने हमें सिखाया कि हमें अच्छी वस्तु चाहे कुछ भी हो (विदेशी भले ही हो) ग्रहण करने में परहेज नहीं होना चाहिए पर हमे उसे अपने सांचे में ढालकर ही ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने एक इशारे पर लोग प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाते थे। ऐसा उनका चरित्र था।

पुस्तक लोकापर्ण समारोह में मोहनराव भागवत के अतिरिक्त सहसरकार्यवाह सुरेश सोनी, वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, लोकसभा कि विरोधी नेता सुषमा स्वराज, पूर्व केंद्रीय मंत्रि सुरेश प्रभु समेत संघ और भाजपा के कई पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।

पुस्तक की विषय वस्तु का परिचय करवाते हुए लेखक अनिल माधव दवे ने बताया कि पुस्तक में कहीं भी शिवाजी के युद्धों का वर्णन नहीं किया गया है, अपितु पुस्तक में एक राजा के रूप में शिवाजी द्वारा स्थापित किए गए मूल्यों का सटीक विवेचन किया गया है। प्रत्येक व्यक्ति जो राज्य व्यवस्था में हिस्सेदारी चाहता है, उसको शिवाजी से कुछ न कुछ सीखना चाहिए। क्योंकि व्यवस्था शिवाजी से शुरु होती है और अव्यवस्था औरंगजेब से। शिवाजी राजा हैं, उन्होंने कई किले जीते किन्तु उनको कोई भी रिश्तेदार किलेदार अथवा सामंत नहीं है, जबकि औरंगजेब ने अपने सारे रिश्तेदारों को उच्च पदों पर बिठा रखा है। दुर्भाग्य से आज हमारे देश में वही औरंगजेब वाली व्यवस्था चल रही है।

आज शासन की जो भी व्यवस्था है, उसका पूर्ववर्ती उदाहरण हमें शिवाजी के शासन काल से मिल सकता है। शिवाजी के पास २० हजार घोड़े थे, उनमें से एक घोड़ा जख्मी हो गया, संबन्धित अधिकारी ने शिवाजी से कहा कि महाराज हम ये घोड़ा बेच देते हैं, उन्होंने कहा ठीक है बेच दो। कई दिन बीत गए अचानक एक दिन उस अधिकारी से शिवाजी की भेंट हुई, उन्होंने पूछा वो घोड़ा बेच दिया, अधिकारी ने कहा जी महाराज बेच दिया, अच्छा किया उससे जो पैसे मिले थे उनको राज खजाने में डाल दिया। पालक अधिकारी ने कहा जी महाराज। यह थी शिवाजी की वित्तीय व्यवस्था। जिसके पास २० हजार घोड़े हों वह व्यक्ति एक-एक घोड़े का हिसाब अपने पास रखता है। जबकि वर्तमान में सरकार ने कैग की जो रिर्पोट बनाई है उसमें से हजारों रुपये अन्य खर्चों में डाल दिए हैं। जिसका कोई हिसाब नहीं है।

अपनी शासन व्यवस्था में शिवाजी ने कौन से वृक्ष काटने हैं और कि वृक्ष का संरक्षण करना है, जंगलों की सुरक्षा कैसे सुनिश्‍चित की जाए। इसका विशेष रूप से उल्लेख किया है। महिलाओं का सशक्तिकरण कैसे हो? अल्पसंख्यकों का कल्याण कि प्रकार किया जाए? एवं भ्रष्टाचारियों के लिए उचित दंड का प्रावधान भी उन्होंने किया था। भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक हेर-फेर तक सीमित नहीं है अपितु व्यक्ति वैचारिक एवं चारित्रिक रूप से भी भ्रष्टाचार से मुक्त हो ऐसी एक राजा के रूप में शिवाजी की अवधारणा रही है। पुस्तक का आमुख परम पूज्य श्री मोहन भागवत जी ने लिखा है एवं प्रस्तावना जिन्होंने अपने सुशासन से देश और दुनिया में अपनी विशेष पहचान बनाई है जिनके बारे में कहा जाता है कि वो अच्छे प्रशासक हैं ऐसे नरेन्द्र मोदी ने लिखी है।

पुस्तक में नायक शिवाजी के पूर्ण शासन कौशल का वर्णन है क्योंकि भारतीय होने का अर्थ-पूर्ण होना है।

कार्यक्रम में मंचासीन सुरेश प्रभु ने कहा कि शिवाजी असाधारण रणनीतिकार थे, कम संसाधनों में युद्ध कैसे जीता जाता है, शिवाजी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसलिए विश्‍वभर की सेनाएं उनके युद्ध की स्ट्रेट्‌जी का अध्ययन करती हैं।

शिवाजी का मानना था कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है, उन्होंने अपने जीवन काल में ३०० किले जीते। वो कुशल शासक तो थे ही, राज्य के लोगों से अपने खुद फीड बैक लेते थे। एक बार रात का समय था। वो वेश बदलकर एक वृद्ध महिला के घर जा पहुंचे और भोजन के लिए आग्रह किया। अब कोई आया है, तो भोजन तो देना पड़ेगा, ऐसी हमारी परम्परा है, इसलिए उस महिला ने उनको मना नहीं किया।

हमारे कोंकण में लोग चावल और दाल ही मुख्यत: खाते हैं, सो उसने शिवाजी को एक पात्र में चावल ला कर रख दिया और उस पर दाल डालने लगी। जब दाल डाल रही थी तो सारी दाल बहने लगी, उस वृद्ध महिला ने कहा कि आप की हालत तो बिल्कुल शिवाजी जैसी है युद्ध जीतते जा रहे हैं लेकिन सुरक्षा का सही प्रबन्ध नहीं है। इस पर शिवाजी ने पूछा कि आप बताओ हमें क्या क्या चाहिए। इस पर उस महिला ने कहा कि पहले चावल निकालकर उसे एक किनारे कर लो फिर बीच में दाल डालो। मैं समझता हूँ कि शिवाजी को इतना बड़ा सम्राट बनाने में उस महिला की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

हालांकि शिवाजी का राज्य उतना बड़ा नहीं था किन्तु उन्होंने जिस संघर्ष की शुरुआत की आगे चलकर वह औरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गया। भाषा के संदर्भ पर उनका स्पष्ट मत था कि राज्य का कामकाज देश की भाषा में होना चाहिए इसलिए उन्होंने प्रचलित विदेशी भाषाओं को हटाकर मराठी और संस्कृत में कार्य की शुरुआत की।

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