यह नालंदा और वह नालंदा : डॉ. अब्दुल कलाम अभियान से अलग क्यों हुए?

Published: Wednesday, Jan 25,2012, 21:35 IST
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नालंदा विश्वविद्यालय और उसकी महान परंपरा फिर से जीवित हो जाए तो क्या कहने? 800 साल बाद एक बार फिर भारत को दुनिया का गुरूदेश बनने का मौका मिल सकता है | पिछले सौ-सवा सौ साल से भारत के इस रूतबे का आनन्द ब्रिटेन और अमेरिका ले रहे हैं |

ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और कैंबि्रज तथा अमेरिका के हावर्ड, येल और प्रिंस्टन जैसे विश्वविद्यालयों की तरफ सारी दुनिया दौड़ी चली जाती है | भारत के तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को विदेशी आक्रमणकारियों ने बड़ी बेरहमी से नष्ट किया, क्योंकि उन्हें यह रहस्य मालूम पड़ गया था कि भारत की अद्वितीय समृद्घि और शक्ति के केंद्र वे ही है| सवाल है अब नालंदा पर जो दस अरब रूपए खर्च करने की योजना है, उसका लक्ष्य क्या है?

भारत और बिहार की सरकारों ने 500 एकड़ जमीन पर इस विश्वविद्यालय का शिलान्यास तो कर दिया है, लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं कि दस हजार छात्रों और डेढ़ हजार आचार्यों को जुटाना यदि मुश्किल हुआ तब यह विश्वविद्यालय क्या करेगा? क्या यह भी अन्य सैकड़ों भारतीय विश्वविद्यालय की तरह नकलचियों और रट्टू तोतों की फौज खड़ी नहीं करेगा? इसकी एक मात्र खूबी यह होगी कि बौद्घ देशों के छात्र यहां बड़ी संख्या में पढ़ेंगे जैसे कि हजार साल पहले पढ़ते थे |

वे क्या पढ़ेंगे, किस भाषा में पढ़ेंगे, उन्हें कौन पढ़ाएगा ये सब सवाल हवा में झूल रहे हैं | जिन लोगों को यह काम सौंपा गया है, उनकी प्रमाणिकता क्या है? उन्होंने ज्ञान-विज्ञान में ऐसा कौनसा मौलिक कार्य किया है, जिससे देश या दुनिया को नई दिशा मिली है?

मुझे तो डर यह है कि भारत के मूलज्ञान स्त्रेतों से अनभिज्ञ ये लोग नालंदा को ऑक्सफोर्ड या हावर्ड की कार्बन कॉपी बना देंगे | आखिर डॉ. अब्दुल कलाम जिन्होंने यह अभियान शुरू किया था, वो इससे अलग क्यों हुए? मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की भूमिका कितनी रहेगी कुछ पता नहीं | पश्चिमी शिक्षा पद्घति में पूर्ण रूपेण ढले हुए हमारे आधुनिक विज्ञानविद जो वास्तव में अर्द्घशिक्षित ही है, नालंदा को दुबारा जिंदा कर दे तो यह सुखद आश्चर्य ही होगा |

विदेशी भाषा के माध्यम से पठन-पाठन और शोध करने वाला कोई भी विश्वविद्यालय आज तक दुनिया में महान या उल्लेखनीय नहीं बन पाया तो यह नालंदा उस नालंदा की बराबरी कैसे कर पाएगा? अब तक इस नालंदा की प्रगति देखकर ऐसा लगता है कि यह सरकारी चहेतों की शरण-स्थली बनने वाला है |

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