इतिहास का सच और भविष्य की चुनौती है अखंड भारत - के. एन. गोविन्दाचार्य

Published: Friday, Oct 21,2011, 23:32 IST
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गत कुछ दिनों से अखंड भारत पर देश भर में काफी चर्चाएं हो रही हैं। इन चर्चाओं में अखंड भारत की व्यावहारिकता, वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता, इसके राजनैतिक स्वरूप, दक्षिण एशिया महासंघ बनाम अखंड भारत जैसे अनेक प्रश्न और बिन्दु सामने आए। इन्हीं प्रश्नों को लेकर भारतीय पक्ष के कार्यकारी संपादक रवि शंकर ने विख्यात विचारक श्री गोविन्दाचार्य से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश।

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प्रश्न: गत कुछ दिनों में देश में अखंड भारत का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। श्री आडवाणी और श्री मनमोहन सिंह के पाकिस्तान के अस्तित्व और सीमाओं की परिवर्तनशीलता संबंधी बयानों के संदर्भ में आपने भी कहा था कि भारत एक भूसांस्कृतिक सत्य है। भूसांस्कृतिक सत्य से आपका क्या अभिप्राय है?

उत्तर: भारत एक भूराजनैतिक वस्तु ही नहीं है। यह भूसंस्कृति भी है। भूसमाजविज्ञान भी है, भूमनोविज्ञान है, भूदर्शन है। इस भू का काफी महत्व है। भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में शोध, अधययन करने वाले, पढ़ने-लिखने वालों के लिए यह एक रोचक पहलू है। भूगोल पृथ्वी के सूर्य के साथ संबंधों के आधार पर निश्चित होता है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर के साथ-साथ अपने अक्ष पर भी घूमती है।

सूर्य के चारों ओर घूमने से साल बनता है, मौसम बनते हैं और अपने अक्ष पर घूमने से दिन-रात। पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में सूर्य के प्रकाश की अलग-अलग मात्रा पहुंचती है। इसलिए सूर्य का प्रकाश मिलने की मात्रा, अवधि और तीव्रता अलग-अलग होगी। इससे ही भूगोल की जलवायु संबंधी स्थितियां बदलती हैं। भारत और इंग्लैंड में सूर्य के प्रकाश के पुहंचने का कोण, तीव्रता और समय अलग-अलग है।

भारत में साढ़े दस महीने सूर्य की रोशनी मिलती है, इंग्लैंड में साढ़े दस महीने सूर्य छिपा रहता है। इससे काफी अंतर आ जाएगा। यहां आक्सीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, इंग्लैंड में नहीं। यहां बहता पानी पीने लायक होता है, वहां नहीं होगा। भारत की गाय का दूध पीलापन लिए हुए होगा। भारत में गेंहू तीन महीने में पकेगा, इंग्लैंड में सात महीने लगेंगे। इसलिए वहां का जीवन कृषि पर आधारित नहीं होगा। इन्हीं कारणों से भारत में दुनिया की केवल दो प्रतिशत भूमि है लेकिन जैव विविधता  दुनिया का तेरह प्रतिशत भारत में होता है।

इस विशिष्टता के कारण भाषा, भूषा, भोजन, भवन, भेषज, भजन आदि भारत में अलग प्रकार का होगा, इंग्लैंड का अलग होगा। जीवन मूल्य, जीवन आदर्श, जीवन शैली, जीवन लक्ष्य आदि भी भिन्न होंगे। इसके अलावे, समाज की रचना, समाज संचालन की तकनीक, उसका तंत्र और सही-गलत का विवेक भी अलग होगा। इसलिए परिवार संस्था, प्रकृति के साथ मैत्री भाव और अनेकता में एकता व एकता में अनेकता में विश्वास, भारत में जल्दी होगा।

यहां उपासना के सभी मार्ग ईश्वर तक पहुंचते हैं, का भाव स्वाभाविक रूप से होगा, वहां समझाना होगा। इसलिए उनको भी बेहतर बनाने का काम भारत को करना पड़ेगा। यह इस भूमि की विशेषता है। यह अनायास नहीं है कि दुनिया के भूभागों में से भारत वह भूभाग है जहां एक दैवी त्रिकोण का अस्तित्व है। वह त्रिकोण है धरतीमाता, गौमाता और घर की माता। इसमें हरेक कोण शेष दो को मजबूत करता है। घर की मां गोमाता की भी सेवा करे, धरतीमाता की भी करे। गोमाता घर की मां को दूध दे और धरतीमाता को उसकी खुराक गोबर-गोमूत्र दे। इंग्लैंड में भी गाय गोबर-गोमूत्र देगी, लेकिन वहां नमी और उष्णता का मेल अलग होने के कारण वह धरती का भोजन नहीं बन पाएगा, व्यर्थ जाएगा।

यहां की धरतीमाता घर की माता को पर्याप्त अनाज और गौमाता को पर्याप्त चारा देती है। लेकिन वहां पर्याप्त अनाज व चारा नहीं होगा। यह नमी और उष्णता का विशेष मेल भारत में होने के कारण यहां इतनी जैव विविधता होती है। आदि पराशक्ति का त्रिकोण यहां के सारे जीवनशैली का एक ऐसा हिस्सा बन जाता है जिसमें मातृशक्ति की विशेष उपासना संभव हो पाती है। यह इस भूभाग की विशेषता है। यही इसकी भूसांस्कृतिक सच्चाई है।

प्रश्न : परंतु आज इस भूखंड में जो राजनीतिक और जनसांख्यिक परिवर्तन हो चुके हैं, इनके परिप्रेक्ष्य में अखंड भारत का व्यावहारिक स्वरूप क्या होगा?

उत्तर : ये प्रश्न बहुत छोटे कालक्षितिज में ही तर्कसंगत हैं। आप एक दूसरे दृश्य की कल्पना करें। 1294 में मोहम्मद गोरी का शासन था। सबको लगा कि अब तो सब कुछ समाप्त हो गया। पृथ्वीराज चौहान हार गए थे। विदेशी शासन की यह स्थिति सवा चार सौ साल तक चली। औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हुई। इन चार सौ वर्षों में समाज में जो निराशा, हताशा थी, जो राजनीतिक परिदृश्य था, उसमें औरंगजेब की मृत्यु के बाद क्या हुआ? जजिया कर जैसी चीजें प्रासंगिक रह ही नहीं गईं। उल्टा हो गया।

भारतीय संस्कृति की समाजसता में वे समरस होने लगे। समाजसता यानी अपने अंदर समा लेने की क्षमता। भाषा, भूषा, भोजन, भवन, भेषज, भजन आदि के क्षेत्रों में यह समाहित करने की प्रक्रिया चलने लगी। केवल भजन के क्षेत्र में थोड़ा बदलाव हुआ, अन्यथा जो भूसांस्कृतिक पहलू हैं, वह धीरे-धीरे मनोविज्ञान पर हावी होने लगे। तब वे जगह-जगह पर स्थानीय रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार आदि में सबके साथ सम्मिलित होने लगे।

भाषा भी बदली भूषा भी बदली। केरल का मुसलमान मलयालम का आग्रह रखता था और कर्नाटक का मुसलमान कन्नड़ का। आज जो फिर से मजहबी चेतना जगी है, वह 1890 के बाद की बात है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में ब्रिटिश कलेक्टर ने सुनियोजित दंगे कराए। उसके बाद धीरे-धीरे इसमें उफान आता गया और फिर 1920 में शरीयत पर बहस चली। 1937 में शरीयत को सर्वमान्य करने की जबरदस्ती की गई। इस प्रकार देखें तो 1707 से 1894 तक के कालखंड का प्रकार अलग था।

फिर आप यह क्यों मान लेते हैं कि वह कालखंड फिर नहीं दोहराया जा सकता? मेरा मानना है कि आज अगर मन के स्तर पर विभेद और मजहब का रिश्ता ज्यादा मजबूत दिखाई देता है तो उसके पीछे आज का वह परिदृश्य भी कारण है जिसमें पाकिस्तान की मजहबी जुनून को बढ़ाने वाली हुकूमत और कई इस्लामिक देशों द्वारा पैसा, समाज और रूतबे का अंधाधुंध उपयोग है। इन सबके कारण स्थानीय रिश्तों और संबंधों की बजाय एक विशेष मजहबी भाव मानस पर हावी हो जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि आज के परिदृश्य से यदि इन दो कारक तत्वों को मिटा दें तो फिर ये सारे ही समीकरण एकदम बदल जाएंगे और यह प्रश्न ही असंगत हो जाएगा। इसलिए हम यह क्यों मान रहे हैं कि स्थितियां सदैव ऐसी ही होंगी? आज विश्व के वर्तमान परिदृश्य के संदर्भ में हटिंगटन ने सभ्यताओं की लड़ाई की जो बात कही है, वह भले ही पूरी सही नहीं है लेकिन उसमें कुछ तो सत्यता है।

आज यूरोप और अमेरिका मिलकर इस्लामिक आतंकवाद से जूझने के लिए मजबूर हो गए हैं। वे आज चुन-चुनकर लोगों को मार रहे हैं। उनकी मंशा सभी भूरे लोगों पर कहर ढाने की है। दक्षिणी फ्रांस और स्पेन इस्लाम के साथ चार सौ वर्षों तक जूझते रहे, इस बात का उनके मनोविज्ञान पर इतना ज्यादा प्रभाव है कि वे इस्लाम के धुर विरोध में खड़े हो गए हैं। इसलिए आज की स्थिति को हम यदि स्थायी मान कर चल रहे हों तो यह स्थिति की सरलीकृत समझ होगी, जो ठीक नहीं है।

आगे पढ़ें : इतिहास का सच और भविष्य की चुनौती है अखंड भारत भाग २

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