चीन की चाल को कब समझेगा भारत

Published: Wednesday, Oct 12,2011, 08:09 IST
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पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों की मौजूदगी भारत के लिए गंभीर चिंता का सबब है। इसे नजरअंदाज करना भारत के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है, क्योंकि थल सेना अध्यक्ष वीके सिंह ने पीओके में चार हजार चीनी सैनिकों की उपस्थिति बताई है। इससे पहले वायुसेना अध्यक्ष एनएके ब्राउन भी पीओके में चीनी सेना के बढ़ते दखल पर चिंता जता चुके है। वीके सिंह के मुताबिक ये सैनिक चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि पाकिस्तान के इलाके में आतंकी ढांचा जस का तस है। आतंकी हर वक्त भारत में घुसपैठ की फिराक में रहते हैं। इसके पहले भी जम्मू-कश्मीर के गिलगिद-बाल्टीस्तान में 11 हजार से अधिक चीनी सैनिकों की हलचल जारी थी, जिसे चीन ने यह कहकर नकारने की कोशिश कि थी कि यह अमला किसी गलत काम में संलग्न नहीं है, लेकिन चीन ने यह साफ नहीं किया कि आखिर इतनी बड़ी सशस्त्र फौज की पहलकदमी किस लिए?

भारतीय सीमा पर चीन और पाकिस्तानी सेना का संयुक्त युद्धाभ्यास इस बात का प्रतीक है कि चीन भारत को घेरने के लिए लगातार कदम बड़ा रहा है। इस अभ्यास में कई गुप्त एजेंडों की झलक दिखाई दे रही है। एक, रास्थान के जैसलमेर से गुजरात के कच्छ के रण तक फैली 1100 किलोमीटर की पश्चिमी सीमा रेखा पर अब पाक के साथ चीन से भी भारत को सतर्क रहने की जरूरत है। दो, इस रेतीले क्षेत्र में भारत के तेल और गैस का बीस फीसदी भंडार मौजूद है। साथ ही कई तेल और गैस कंपनियां नए भंडारों की खोज में लगी हैं। तय है कि इस भंडार पर चीन की निगाहें गड़ गई हैं। तीन, अमेरिका से संबंधों में दरार आने के बाद पाकिस्तान से चीन की दोस्ती बढ़ती जा रही है।

चीन जल्दी ही पाक के पहले संचार उपग्रह का प्रक्षेपण करने जा रहा है। इसके साथ ही द्विपक्षीय संबंध और प्रगाढ़ होंगे। भारत को चिढ़ाने के लिए इस उपग्रह का नाम पाकसैट-1 आर रखा गया है। इस उपग्रह के प्रक्षेपण का बहाना तो यह बनाया गया है कि यह मौसम पर निगरानी और उच्च क्षमता वाली संचार सुविधा पाकिस्तान को हासिल कराएगा, लेकिन हकीकत यह है कि इसके जरिये भारत की सामरिक और रक्षा गतिविधियों पर आसमान से नजरें टिकाए रखेगा। अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखाओं पर चीन का लगातार बढ़ता हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि वह इन सीमा रेखाओं को बदलने की पुरजोर कोशिश में है। इस दृष्टि से वह भारत के चारों ओर दखल दे रहा है। कुछ समय पहले चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा को लांघकर भारत की परिधि में न केवल घुसने का दुस्साहस दिखाया, बल्कि लद्दाख क्षेत्र में ठेकेदार को हड़काकर निर्माणाधीन यात्री प्रतीक्षालय का काम भी रुकवा दिया था। यह निर्माण इस जिले में देमचोक क्षेत्र के गोंबीर गांव में ग्रामीण विकास विभाग की इजाजत से चल रहा था। इस बेहूदी हरकत का शर्मनाक नतीजा यह रहा कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर भारतीय सेना ने दखल देकर राज्य सरकार को यथास्थिति बनाए रखने के लिए मजबूर कर दिया। कोई जवाबी कार्रवाई करने की बजाय लाचारी की इस स्थिति ने चीनी सैनिकों की हौसला अफजाई ही की। चीन की इस तरह की हरकतें नई नहीं है। भाईचारे और व्यापारिक समझौतों की ओट में वह भारत की पीठ में छुरा भोंकने से बाज नहीं आता।

नवंबर 2009 में भी चीनी सैनिकों ने भारत के लद्दाख क्षेत्र में निर्माणाधीन सड़क रोकने की चेतावनी दी थी। इस सड़क का निर्माण भी देमचोक इलाके में हो रहा था। इसे रक्षा मंत्रालय द्वारा लेह के तत्कालीन उपायुक्त एके साहू के समक्ष आपत्तियां जताने के बाद रोक दिया गया था। अक्टूबर 2009 में भी दक्षिण-पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के देमचोक क्षेत्र में ही एक पहंुच मार्ग का निर्माण चीनी दखल के बाद रोकना पड़ा था। इसी तरह वास्तविक नियंत्रण रेखा पर देमचोक के आखिरी छोरों पर मौजूद दो गांवों को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण को रोक दिया गया था। 2009 में चीनी सेना ने लेह लद्दाख के शिखरों पर चिह्नित अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर पत्थरों और चट्टानों पर लाल रंग पोत दिया था। 31 जुलाई 2009 को तो चीनी सैनिक मर्यादा की सभी हदें पार कर भारत के गया शिखर क्षेत्र में डेढ़ किलोमीटर भीतर घुसकर कई चट्टानों पर लाल रंग से चाइना और चीन-9 लिख देने की हिमाकत दिखा चुके हैं, जबकि एक समझौते के तहत शिखर गया को दोनों देश अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता देते हैं। चीन लगातार 1962 के गतिरोध को तोड़ने में लगा है।

अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित काराकोरम क्षेत्र में भी चीनी हलचलें बढ़ती जा रही हैं। चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहंुचने के लिए काराकोरम होकर सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस निर्माण के बाद चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) क्षेत्र को पाकिस्तान का हिस्सा मानने के बयान भी देने शुरू कर दिए हैं। चीनी दस्तावेजों में अब इस विवादित क्षेत्र को उत्तरी पाकिस्तान दर्शाया जाने लगा है। भारत विरोधी मंशा के चलते ही चीन ने पीओके क्षेत्र में 80 अरब डॉलर का निवेश किया है। यहां से वह अरब सागर पहंुचने की तजवीज में है। चीन की पीओके में ये गतिविधियां सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। अरुणाचल प्रदेश में भी चीनी हस्तक्षेप लगातार मुखर हो रहा है। हाल ही में गूगल अर्थ से होड़ बरतते हुए चीन ने एक ऑन लाइन मानचित्र सेवा शुरू की है, जिसमें उसने भारतीय भू-भाग अरुणाचल और अक्साई चीन को अपने देश का हिस्सा बताया है। मानचित्र खंड में इसे चीनी भाषा में प्रदर्शित करते हुए अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताया है। जिस पर चीन का दावा पहले से ही बना हुआ है। इस सिलसिले में भारतीय अधिकारियों ने सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि दक्षिणी तिब्बत का तो इसमें विशेष उल्लेख नहीं है, लेकिन इसकी सीमाओं का विस्तार अरुणाचल तक दर्शाया गया है। इसके अलावा अक्साई चीन को जरूर शिनजियांग प्रांत का अंग बताया गया है।

यह दरअसल जम्मू-कश्मीर में लद्दाख का हिस्सा है। चीन ने भारत पर शिकंजा कसने के लिए हाल के दिनों में नेपाल में भी दिलचस्पी लेना शुरू किया है। कम्युनिस्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ये नेता अब नेपाल से भारत और चीन के संबंधों का मूल्यांकन आर्थिक मदद के आधार पर करने लगे हैं। हालांकि भारत ने भी शक्ति संतुलन बनाए रखने के नजरिये से नेपाल के तराई क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण हेतु 750 करोड़ रुपये की इमदाद की है, लेकिन यह मदद चीन की तुलना में नाकाफी है। इन्हीं कुटिल कूटनीतिक वजहों के चलते भारत और नेपाल के पुराने रिश्तों में हिंदुत्व और हिंदी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला होता जा रहा है। नतीजतन नेपाल में चीन का दखल और प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है। चीन की ताजा कोशिशों में भारत की सीमा तक आसान पहंुच बनाने के लिए तिब्बत से नेपाल तक रेल मार्ग बिछाना शामिल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आजाद भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतांत्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा।

चीन ने ताइवान में पहले तो आर्थिक मदद और विकास के बहाने घुसपैठ की और फिर ताइवान का अधिपति बन बैठा। तिब्बत पर तो चीन के अनाधिकृत कब्जे से दुनिया वाकिफ है। साम्यवादी देशों की हड़प नीतियों के चलते ही चेकोस्लोवाकिया बरबादी के चरम पर पहंुचा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों पर चीनी युद्धपोत लहरा रहे हैं। विश्व मंचों से चीन दुनिया के देशों को संदेश भी देने में लगा है कि भारत के पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार समेत किसी भी सीमांत देश से मधुर संबंध नहीं हैं। इन अप्रत्यक्ष व अदृश्य चीनी सामरिक रणनीतियों से आंख मूंदकर भारत अब तक मुंह चुराता रहा है, लेकिन अब भारतीय सीमा से महज 25 किमी दूर संयुक्त युद्धाभ्यास को नजरअंदाज किया तो मंुह की खानी भी पड़ सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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