सोनिया गाँधी और कांग्रेस ने कभी सोचा नहीं होगा कि तेलंगाना आंदोलन ऐसा गम्भीर रुख लेगा

Published: Saturday, Oct 01,2011, 21:42 IST
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9 दिसम्बर 2009 (अर्थात सोनिया गाँधी के जन्मदिन) पर तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेसी सांसदों ने सोनिया गाँधी को शॉल ओढ़ाकर फ़ूलों का जो गुलदस्ता भेंट किया था, वह अब कांग्रेस को बहुत महंगा पड़ने लगा है। दो साल पहले इन सांसदों ने "महारानी" को शॉल ओढ़ाकर तेलंगाना राज्य बनवाने की घोषणा करवा ली (सोनिया ने उस समय "महारानियों की तरह खुश होकर" बिना सोचे-समझे आंध्रप्रदेश के विभाजन की घोषणा ऐसे कर दी थी, मानो उन्हें अपने घर में पड़े हुए केक के दो टुकड़े करने का आग्रह किया गया हो…)। सोनिया गाँधी और कांग्रेस ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि तेलंगाना आंदोलन दो साल में ऐसा गम्भीर रुख ले लेगा कि अब वहाँ से कांग्रेस का पूर्ण सफ़ाया होने की नौबत आ जाएगी…।

इस बुरी स्थिति से बचने के लिए और आंध्रप्रदेश के शक्तिशाली रेड्डियों की नाराज़गी से बचने के लिए अब तक कांग्रेस इस मुद्दे को लटकाए रखी, और "सही मौके" का इन्तज़ार करती रही… उधर स्थिति और बिगड़ती चली गई।

सोनिया की मुहर लगते ही चमचेनुमा कांग्रेसियों ने तेलंगाना का जयघोष कर दिया। गृहमंत्री ने संसद में ऐलान कर दिया कि अलग तेलंगाना राज्य बनाने के लिये आंध्र की राज्य सरकार एक विधेयक पास करके केन्द्र को भेजेगी। इस मूर्खतापूर्ण कवायद ने आग को और भड़का दिया। सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि चिदम्बरम कौन होते हैं नये राज्य के गठन की हामी भरने वाले? क्या तेलंगाना और आंध्र, कांग्रेस के घर की खेती है या सोनिया गाँधी की बपौती हैं? इतना बड़ा निर्णय किस हैसियत और प्रक्तिया के तहत लिया गया? न तो केन्द्रीय कैबिनेट में कोई प्रस्ताव रखा गया, न तो यूपीए के अन्य दलों को इस सम्बन्ध में विश्वास में लिया गया, न ही किसी किस्म की संवैधानिक पहल की गई, राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने के बारे में कोई बात नहीं हुई, आंध्र विधानसभा ने प्रस्ताव पास किया नहीं… फ़िर किस हैसियत से सोनिया और चिदम्बरम ने तेलंगाना राज्य बनाने का निर्णय बाले-बाले ही ले लिया?

वर्तमान स्थिति यह है कि तेलंगाना में पिछले 19 दिनों से आम जनजीवन ठप पड़ा है, राज्य और केन्द्र सरकार के कर्मचारी खुलेआम आदेशों का उल्लंघन करके छुट्टी पर हैं। कोयला खदान कर्मचारियों द्वारा तेलंगाना के समर्थन में खुदाई बन्द करने से महाराष्ट्र और तेलंगाना में बिजली संकट पैदा हो गया है… चारों तरफ़ अव्यवस्था फ़ैली हुई है और इधर कांग्रेस अपने "2G के गंदे कपड़े" धोने में व्यस्त है।

अपने "चरणचुम्बन" से खुश होकर, किसी भी गम्भीर मुद्दे पर इस प्रकार की नौसिखिया बयानबाजी की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, अब आंध्र और तेलंगाना की स्थानीय कांग्रेस को यह समझ में आ रहा है। सोनिया गाँधी ने इस मामले को छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखण्ड जैसा आसान समझा था, जबकि ऐसा है नहीं…। आंध्र और रायलसीमा के दबदबे वाले "रेड्डी" इतनी आसानी से विभाजन स्वीकार नहीं करेंगे, यदि किसी तरह कर भी लिया तो असली पेंच है राजधानी के रूप में "हैदराबाद" की माँग…। हैदराबाद से मिलने वाले राजस्व, भू-माफ़िया पर रेड्डियों के कब्जे, तमाम सुविधाओं तथा ज़मीन की कीमत को देखते हुए इसे कोई भी नहीं छोड़ना चाहता, यहाँ तक कि हैदराबाद को "चंडीगढ़" की तर्ज़ पर दोनों राज्यों की राजधानी बनाए रखने के सुझाव को भी खारिज किया जा चुका है…। रेड्डियों की शक्ति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा में सर्वाधिक सम्पत्ति वाले सांसदों में पहले और दूसरे नम्बर पर आंध्र के ही सांसद हैं, तथा देश में सबसे अधिक प्रायवेट हेलीकॉप्टर रखने वाला इलाका बेल्लारी, जो कहने को तो कर्नाटक में है, लेकिन वहाँ भी रेड्डियों का ही साम्राज्य है।

खैर आगे जो भी हो, लेकिन फ़िलहाल हालत यह है कि तेलंगाना इलाके में जनजीवन पूरी तरह अस्तव्यस्त है, सरकार का अरबों रुपये के राजस्व का नुकसान हो चुका है (फ़िलहाल आंदोलन शांतिपूर्ण है इसलिए… यदि हिंसक आंदोलन होता तो नुकसान और भी अधिक होता), तेलंगाना क्षेत्र के पहले से ही गरीब दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है… लेकिन 19 दिनों से दिल्ली में "नीरो" चैन की बंसी बजा रहा है… लानत है।

लेकिन दिल्ली के "नीरो" को इस प्रकार बांसुरी बजाने की आदत सी हो गई है, पिछले कई दिनों से सशस्त्र नगा उग्रवादियों ने नगा-कुकी संघर्ष के कारण मणिपुर जाने वाले एकमात्र राजमार्ग को बन्द कर रखा है, जिसके कारण मणिपुर में गैस सिलेण्डर 1700 रुपये, एवं डीजल 200 रुपए लीटर मिल रहा है, परन्तु कोई कार्रवाई नहीं हो रही…। चर्च समर्थित नगा उग्रवादी, आए दिन मणिपुर के निवासियों का जीना हराम किये रहते हैं, लेकिन हमारे "नीरो" को GDP तथा विकास दर प्रतिशत के आँकड़ों के अलावा कुछ सूझता ही नहीं…

भगवान जाने "तथाकथित विद्वान" अर्थशास्त्रियों का यह "झुण्ड" हमारा पीछा कब छोड़ेगा, और कब एक "असली जननेता" देश का प्रधानमंत्री बनेगा…

— सुरेश चिपलूनकर (लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

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