चिदम्बरम का अदभुत गणित ज्ञान, देश के अमूल्य संसाधनों को लगाया चूना

Published: Thursday, Sep 29,2011, 12:24 IST
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2007 में जब वोडाफ़ोन ने हच का अधिग्रहण हेतु आवेदन किया तो चिदम्बरम ने उसे उस समय के बाजार भाव के अनुसार 60,000 करोड़ के FDI की अनुमति दी…(यानी कि चिदम्बरम को 2007 का सही-सही मार्केट रेट पता था)। लेकिन जब 2G लाइसेंस बाँटने की बात आई तो 2008 में राजा ने स्पेक्ट्रम का भाव तय किया 1800 करोड़ रुपये… वित्तमंत्री चिदम्बरम ने उसे मंजूरी दी, और प्रधानमंत्री को कह दिया कि अब इन भावों को पुनरीक्षित (Revised) करने की जरुरत नहीं है।

दूसरा खेल जिसमें राजा और मारन की मदद चिदम्बरम ने की, वह ऐसा है कि "स्वान" और "यूनीटेक"' नाम की दूरसंचार क्षेत्र में आई हुई "नई-नवेली अनुभवहीन" कम्पनियों को भी लाइसेंस बाँटे, जिन्होंने लाइसेंस मिलने के छः माह के अन्दर अपने शेयर 8 से 12 गुना भावों पर "एटिसलाट" और "टेलीनोर" कम्पनियों को बेच मारे…। तात्पर्य यह है कि राजा-मारन-चिदम्बरम से लेकर सभी कम्पनियों को "स्पेक्ट्रम की असली कीमत" और उससे होने वाली कमाई का मार्केट रेट पता था, और उसके अनुसार उन्होंने "कमाया" भी, लेकिन देश के अमूल्य संसाधनों को चूना लगाकर…

कहने का मतलब यह है कि देश के करदाताओं की खून-पसीने की कमाई और देश की सम्पदा को चिदम्बरम ने "पंजीरी के प्रसाद की तरह" बाँट दिया, और अब यह कभी पता नहीं चलेगा कि इस पूरे खिलवाड़ में चिदम्बरम-राजा-मारन इत्यादि ने कितने अरब रुपए स्विस बैंक में जमा किये…

(नोट :- एटिसलाट और टेलीनोर कम्पनियों को गृह मंत्रालय ने ब्लैक लिस्ट किया हुआ था, क्योंकि मंत्रालय को शक है कि दोनों ही कम्पनियों में दाऊद इब्राहीम और पाकिस्तान की ISI का भारी पैसा लगा हुआ है…। उस समय शिवराज पाटिल गृहमंत्री थे और अब चिदम्बरम हैं… यानी सैंया भये कोतवाल, तो अब डर काहे का?)

(नोट क्रमांक 2 :- जब पंजीरी बाँटी जा रही थी, उस समय वित्तमंत्री चिदम्बरम थे… इसीलिए बाबू मोशाय प्रणब मुखर्जी उनसे खार खाए बैठे हैं कि "सारा माल तो खुद खा लिया, जूठन समेटने और पत्तल उठाने का काम अब मेरे माथे?" इसलिए प्रणब बाबू पूरी तरह से चिदम्बरम को निपटाने के मूड में हैं…। इस पवित्र कार्य से बाबू मोशाय एक तीर से दो निशाने साध लेंगे, पहला तो यह कि सरकार में नम्बर दो बनने की जुगाड़ में लगे चिदम्बरम को सड़क पर लाएंगे और दूसरा यह कि खुद की छवि उजली बना लेंगे)…

— सुरेश चिपलूनकर

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