‘छत्तीसगढ़ फतह’ के बाद स्वामी अग्निवेश जैसे पेशेवर मध्यस्तों का अगला निशाना बना है ओडिशा

Published: Thursday, Sep 22,2011, 23:22 IST
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स्वामी अग्निवेश, पेशेवर मध्यस्तों, ओडिशा, मलकानगिरी, आर. वी. कृष्णा

बाजारवाद का एक कुत्सित लेकिन कामयाब फार्मूला यह है कि पहले ‘दर्द’ तैयार करो फ़िर उसकी दवा बेचने भी निकल पडो. बात चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हो या कंप्यूटर तकनीक का, पहले वायरस फैलाओ फ़िर एंटी वायरस का पैकेज खरीदने को मजबूर करो. नक्सल परिप्रेक्ष्य में लोगों का अपहरण किये जाने और फ़िर उनकी रिहाई के लिए उनके बिचौलियों द्वारा मोल-तोल किया जाने को भी इसी सन्दर्भ में देखे जाने की ज़रूरत है.

अपने पांच जवानों की रिहाई के बाद छत्तीसगढ़ अभी ज़रूर फौरी तौर पर कुछ राहत महसूस कर रहा हो लेकिन प्रदेश, देश और लोकतंत्र के लिए नक्सल मुक्ति की राहें अभी काफी लंबी है. इस लंबी दूरी को तय करने में, लोकतंत्र के परिंदे को निर्बाध उड़ने में अभी काफी तन्मयता से वक्त लगाने की दरकार कायम है. इस मामले में ‘छत्तीसगढ़ फतह’ के बाद स्वामी अग्निवेश जैसे पेशेवर मध्यस्तों का अगला निशाना बना है ओडिशा. जहां के मलकानगिरी के जिलाधिकारी आर. वी. कृष्णा के अगवा किये जाने के बाद अब वहां भी इनकी पूछ-परख बढ़ गयी है. विगत 25 जनवरी को नक्सलियों ने नारायणपुर से छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) के सदस्य रघुनंदन ध्रुव, रामाधार पटेल, टी.एक्का, रंजन दुबे एवं मणिशंकर को अगवा कर लिया था. काफी जद्दोजहद के बाद अंततः इन जवानों को वापस घर तक पहुचाने में राज्य शासन को सफलता मिली. पूरे अठारह दिन तक चले इस प्रकरण में जवानों के परिवार वाले किस स्थिति से गुजरे होंगे यह कल्पना की जा सकती है. खैर.

तो इस रिहाई के बाद जहां स्वामी अग्निवेश समेत सभी समर्थकों द्वारा नक्सलियों के ‘दरियादिली’ की जम कर तारीफ की गयी वही इस प्रायोजित मौके का लाभ उठाकर ऐसा प्रचारित किया गया कि नक्सली तो सहृदय हैं, शायद शासन ही उनकी कथित सहृदयता का लाभ नहीं उठा पा रहा है. आप कल्पना करें कि कोई व्यक्ति या संगठन अगर किसी का अपहरण कर ले और काफी दिनों के बाद उसे छोड़ भी दे तो क्या इससे वह सहृदय हो जाता है? क्या रिहा करने के बाद उसका अपराध खत्म हो जाता है. कोई सहृदय ज़मात क्या इस तरह लोगों के परिवार को सांसत में रखता है?

निश्चित ही जिनके भी प्रयासों से उन जवानों की रिहाई हुई हो वे सभी साधुवाद के पात्र हैं. लेकिन अगर मध्यस्थों तक पल-पल की खबर पहुच रही थी. काफी दूर रहते हुए भी अगर उनका संपर्क जीवंत था और एक लंबे जद्दोजहद के बाद अगर जवानों को छोड़ा गया और जैसा कि पुराना भी अनुभव रहा है उसके आधार पर अग्निवेश समेत सभी मध्यस्थों को पाक-साफ़ तो नहीं ठहराया जा सकता. रिहाई के बाद के कथित सद्भावनापूर्ण माहौल के अगले ही दिन जहां प्रदेश के दुसरे इलाके अम्बिकापुर में नक्सलियों द्वारा जमकर उत्पात मचा, मारपीट करते हुए दर्ज़नो मशीनों को आग लगा कर राख कर दिया गया वहीं इस इस अपहरण के प्रकरण के दौरान ही ओडिशा-झारखण्ड सीमा पर एक आत्मसमर्पित महिला नक्सली होमगार्ड की उसके तीन साल की बेटे ‘शिव’ समेत बेदर्दी से गला रेत कर क्रूरता पूर्वक ह्त्या कर दी. दोष उनका महज़ इतना कि उन्होंने नक्सली समूहों से आजिज आकार ‘लोकतंत्र’ का दामन थाम्ह लिया था. इन कथित सहृदय तत्वों का दिल कुछ साल पहले दंतेवाडा के एर्राबोर मे डेढ़ साल की बच्ची ‘ज्योति कुटट्टयम्’ को ज़िंदा जलाते हुए भी नहीं पसीजा था. इस तरह के वारदात की लंबी सूची रहते कोई पूर्वाग्रही ही नक्सलियों को सहृदय कह सकता है.

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नक्सलियों से संवाद के पक्षधर और उनके पैरोकार अग्निवेश जैसे लोग जब यह तर्क देते हैं कि जब हर तरह के आतंकी समूहों को बातचीत के टेबल तक लाया जा सकता है तो आखिर नक्सलियों को क्यू नहीं? तो उनसे यह दो टूक पूछे जाने की ज़रूरत है कि वे केवल यह बता दें कि आखिर नक्सलियों की मांग क्या है? आखिर उनका सीधा मकसद क्या है? आप जिस भी आतंकी समूह को देखें उन सभी का कुछ मकसद होता है. लेकिन लाख सर खपा देने के बावजूद आप इस सीधे सवाल का जबाब नहीं पा सकते हैं कि माओवादी क्यू गरीब आदिवासियों के बीच कहर बरपा रहे हैं? कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और नक्सली प्रवक्ता के बीच एक अखबार के माध्यम से लंबा विमर्श चला था. हर तरह की विद्वता के प्रदर्शन के बाद भी इस छोटे से सवालों का जबाब नहीं तलाशा गया कि छत्तीसगढ़ समेत देश के अन्य हिस्सों के नक्सल आंदोलन का आखिर लक्ष्य क्या है?
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जहां तक शासन का सवाल है तो ज़ाहिर है कि किसी भी राज्य के लिए अपने नागरिकों की प्राण रक्षा से बढ़ कोई प्राथमिकता नहीं हो सकता. उसके जीवन की रक्षा के निमित्त तात्कालिक या दीर्घकालिक जो भी निर्णय लेने पड़े वह स्वागतेय होना चाहिए. ज़रूरत पड़ने पर लचीला रुख अपनाना भी उसके लिए उचित है. लेकिन रिहाई होने के बाद इसे बातचीत के लिए उपयुक्त अवसर के रूप में देखना सरासर माओवादियों के बिछाये जाल में फंसना साबित होगा. मध्यस्थों के बातचीत पर जोर देने का मतलब भी यही समझा जाना चाहिए कि दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही अपहरण के कारवाई को अंजाम दिया जाता है. ज़ाहिर है सरकार के चौतरफा दबाव के कारण नक्सली बस्तर के इलाकों में कमज़ोर पड़े हैं. विशेषज्ञ यह बेहतर जानते हैं और खासकर उनके नीतिगत दस्तावेजों मे भी यह दर्ज है कि जब भी वे कमज़ोर पड़ते हैं तो ये बातचीत या युद्धविराम की पेशकश, खुद को ताकतवर बनाने और ‘दुश्मन’ को असावधान करने के लिए करते हैं.

हालांकि एक लोकतान्त्रिक समाज में किसी भी स्तर पर बातचीत से किसी भी सरकार या संस्था को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन रणनीति के तहत इस तरह का पेशकश करने वाले समूहों की गतिविधियों पर पैनी नज़र सतत बनाकर रखने, इनके जाल में किसी भी तरह से नहीं फंसने, सतत सावधान रहने की ज़रूरत तो है ही. क्रूरतम वारदातों को अंजाम देते हुए, गुरिल्ला वार को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाले समूहों ने अगर सीधे तौर पर अपने ह्रदय परिवर्तन का सन्देश देना चाहा है तो आंख मूंद कर इनपर बिलकुल ही भरोसा नहीं किया जा सकता है.

आप कभी इनके दस्तावेजों पर गौर करेंगे तो कुछ अमूर्त सी चीज़ों से आपका साबका पडेगा. जैसे शोषण विरुद्ध समाज, जनताना सरकार की स्थापना, वर्ग संघर्ष, संसदीय प्रणाली के प्रति अनास्था आदि-आदि. तो अगर बात केवल छत्तीसगढ़ या किसी सूबाई सरकार की करें तो क्या यह किसी मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में है कि राज्य में संसदीय प्रणाली रहे या नहीं इसपर बातचीत करे? यूं तो देश में लोकतंत्र के औचित्य पर विमर्श करना किसी के भी अधिकार क्षेत्र में नहीं है फ़िर भी चुकि केन्द्र ने भी माओवादी गतिविधियों को देश की आंतरिक सुरक्षा पर पैदा हुए सबसे बड़े चुनौती के रूप में देखा है तो किसी भी तरह की बातचीत या उसके लिए माहौल तैयार करने की पहल केन्द्र के द्वारा ही किये जाने की ज़रूरत है.

छत्तीसगढ़ के अपहरण प्रकरण के दौरान बातचीत के अलावा हालिया दोषी साबित हुए बिनायक प्रकरण पर भी बिना नाम लिए काफी बातें हुई. ऐसा सन्देश देने की बेजा कोशिश की गयी कि शायद सरकार उस मुकदमें पर भी फ़िर से विचार करेगी. तो इस संबंध में भी तथ्य यही है कि निचली अदालत से दोष सिद्ध होने पर न्यायलय के अलावा किसी भी संस्था खास कर राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रह जाता. सूचीबद्ध एवं दोषसिद्ध हुए आरोपों पर फैसला करने का अधिकार केवल ऊपरी अदालत का ही रह जाता है जिसने इस मामले में देश के बड़े वकीलों द्वारा बचाव मे रखे गए पक्ष के बावजूद भी फिलहाल ज़मानत देना मुनासिब नहीं समझा है. तथ्य तो यह है कि अभियोजन पक्ष द्वारा चाहकर किसी मामले को वापस नहीं लिया जा सकता. यह तथ्य हाल ही में ‘आरुषी मामले’ में पुनः साबित हुआ है जब सीबीआई द्वारा पेश ‘क्लोजर रिपोर्ट’ भी न्यायालय ने मानने से सीधा इनकार करते हुए मुकदमें को चलाये रखने का आदेश दिया है.

तो उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह संदेह पैदा होने के तमाम कारण है कि हाल में कुछ कानूनी और ज़मीनी मात खाने के बाद नक्सली समूह और उनको वैचारिक आधार प्रदान करने वाले तत्वों द्वारा इस तरह की कारवाई हर स्तर पर बेजा दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही की जा रही है. बात चाहे अपहरण कांड का हो या सारी दुनिया में देश की न्याय प्रणाली को ही कठघरे मे खडा करने की. हर स्तर पर छुपे हुए नक्सली जी-जान से आदिवासी क्षेत्रों को शतरंज की बिसात बना शह और मात का खेल जारी रखे हुए हैं. लेकिन दृढ इच्छा शक्ति के साथ हर तरह के दबाव से मुक्त होकर शासन अगर न्यायिक से लेकर ज़मीनी स्तर तक अपने सभी प्रयासों को कायम रखे तब ही निकट भविष्य में इस समस्या से पार पाया जा सकता है.

प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए यह सबसे बड़े फैसले की घड़ी है. नियति ने उनके समक्ष स्थायी शान्ति और सौहार्द कायम रखने की विषद जिम्मेदारी उपस्थित किया है. हर तरह के बेज़ा दबावों से मुक्त होकर, सभी संबंधित एजेंसियों को अपना काम सही तरीके से करने देकर ही देश इस भयंकर समस्या से पार पा कर इतिहास रच सकता है. देश यह समझ रहा है कि यहां ‘लोकतंत्र’ ही सबसे बड़ा मानवाधिकार है और केवल इसी तंत्र में अन्य तमाम मानव अधिकारों के रक्षा की जिम्मेदारी और ताकत भी निहित है.

— पंकज झा

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