कैसे बने भारत फिर सोने की चिड़िया? देश से बाहर है 1400 अरब डॉलर?

Published: Tuesday, Aug 30,2011, 12:25 IST
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आई वॉच, इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड, अरब डॉलर, भारत

कई सौ साल पहले भारत को दुनिया भर में सोने की चिडि़या माना जाता था, लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे लूटा-खसोटा और इसके धन-ऐश्वर्य को छीन-छानकर अपने-अपने देशों में ले गए। आजादी के बाद भी कुछ नागरिक सरकार की नीतियों से दुखी होकर और इनकम टैक्स की ऊंची दरों के कारण अपने धन को विदेशी बैंकों में ले गए।

देश से बाहर है 1400 अरब डॉलर?

' आई वॉच ' का मानना है कि अगर भारत की नीतियों में सुधार आ जाए तो उसका पैसा काफी हद तक दोबारा भारत में आ सकता है। इससे भारत की इकॉनमी को बड़ा संबल मिल सकता है। एक गैर सरकारी अनुमान के अनुसार, 400 से 1,400 अरब अमेरिकी डॉलर की धनराशि भारत से बाहर है, जबकि भारत का कुल विदेशी कर्ज 200 अरब डॉलर के आसपास है।

प्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका

इसके अलावा, विदेशी बाजारों में ब्याज दरें काफी कम हैं और यदि भारत में ब्याज दरें उचित हों और टैक्स दरें आकर्षक हों तो प्रवासी भारतीय और भारतीय मूल के विदेशी नागरिक भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकते हैं। इन लोगों की आत्मा अभी भी भारत में बसती है और भारत से इनका भावनात्मक जुड़ाव है। यदि हम उन्हें आकर्षित कर सकें तो भारत की विकास परियोजनाओं के लिए भारी वित्तीय संसाधन मिल सकते हैं। चीन में प्रवासी चीनियों ने तो चीन, हांगकांग और मकाउ में 70 अरब डॉलर का निवेश करके इन तीनों देशों की तकदीर बदल डाली है, जबकि भारत केवल प्रवासी भारतीयों से केवल 0.2 अरब डॉलर ही हासिल कर पाया है।

सोने का आयात कम हो

इसके अलावा, भारत बड़े पैमाने पर सोने का आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा बहुत ज्यादा इसी मद में चली जाती है। आई वॉच के अनुसार, इस मद को कम किया जाना चाहिए, लेकिन जिस तरह से सोने-चांदी की कीमतें बढ़ रही हैं, लगता नहीं कि सोने-चांदी का आयात कम हो सकता है। जिस तेजी से देश की इकॉनमी बढ़ रही है, उसे देखते हुए चीन की तरह भारत में एफडीआई और एफआईआई निवेश बढ़ सकता है। भारत को अपने यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर को डिवेलप करने के लिए बड़े पैमाने पर धन की जरूरत है जो 10-15-20 वर्षीय इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड जारी करके उगाहा जा सकता है। भारत को शिक्षा, स्वास्थ्य, जलमार्ग और नदियों को जोड़ने, बंदरगाहों, एयरपोर्ट, रेल और सड़क आदि के लिए 500 से 800 अरब डॉलर की आवश्यकता है।

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