वैकल्पिक राजनिति की दिशा क्या हो?

Published: Saturday, Mar 02,2013, 17:30 IST
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देश भीषण परिस्थितियों से घिरता जा रहा है। राजनैतिक दलों, राजनेताओं, नौकरशाहों और थैलीशाहों ने लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया है। भ्रष्टाचार ने सारी सीमायें लांघ दी हैं। देश में कानून का राज सिमटता जा रहा है, और अपराधियों में कानून का डर समाप्त हो गया है। आम जनता पर गरीबी, बेकारी और महंगार्इ की मार बढ़ती जा रही है। भारत में सत्ता के नकारेपन का नतीजा है कि विदेशी ताकतें इस देश की राजनीति और अर्थनीति को बुरी तरह से प्रभावित करने के फिराक में है। ये लोग कारपोरेट सेक्टर की भलार्इ में ही देश की भलार्इ मानकर कार्य कर रहे हैं। ऐसे समय में मूकदर्शक बने रहना अपराध होगा। समय की मांग है कि हम मिलकर वैकलिपक राजनीति की दिशा पर विचार और पहल करें।

गत तीन वर्षों में देश में भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक आर्थिक घोटालों का पर्दाफाश हुआ है। इसमें मुंबर्इ आदर्श घोटाला, कामनवेल्थ खेल घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटला, कोयला घोटाला और हेलीकाप्टर घोटाला प्रमुख हैं। इन सभी घोटालों में राजनेताओं, नौकरशाहों और पूंजीपतियों के गठ़जोड़ का दर्शन हुआ है। वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली संवैधानिक संस्थाओं को भी पंगु करने की कोशिश की जा रही हैं। कैग को कुंद करने एवं सीबीआर्इ का प्रयोग सिर्फ सत्तासीन लोगों को बचाने के लिये ही किया जा रहा हैं। लोकपाल को बिना नखदंत की अग्रसारक एजेंसी बनाया जा रहा है।

बोफर्स तोप घोटाले में 63 करोड़ रुपये की दलाली खार्इ गयी थी, परन्तु अब हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटालें हुये हैं। सरकार उन घोटालों को झूठलाने और दबाने में लगी है और विपक्षी दल सरकार को कठघरे में खड़ा करने में बौने साबित हो रहे हैं। भ्रष्टाचार के साथ-साथ आम जनता की बदहाली भी बढ़ती जा रही है। देश की अधिकांश जनता गरीबी, बेकारी और बढ़ती मंहगार्इ में पिसने के लिए अभिशप्त है। कुछ वर्ष पूर्व सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश की 77% प्रतिशत आबादी रोजाना 20 रुपये या उससे कम पर गुजारा कर रही है। आज भी देश में पांच वर्ष में कम आयु के लगभग 50: प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है। गरीबी को दूर करने के लिए सरकार द्वारा चलायी जा रही रोजगार योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रचण्ड भ्रष्टाचार हो रहा है। सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहता है पर सरकार उसे गरीबों में नहीं बाटती है और खराब होने पर सस्ते में पशुओं को खिलाने के लिए विदेशों में बेच देती है। आम जनता को राहत देने के लिए महंगार्इ रोकने में सरकार असहाय दिखती है। सरकार के कुछ मंत्री तो महंगार्इ बढ़ाने के ठेकेदार नजर आते हैं।

सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन से आम जनता में असंतोष और आक्रोश बढ़ता जा रहा है। गत दो वर्षों में विविध जनसंगठनों के नेतृत्व में हुए आंदोलनों में आम जनता की हिस्सेदारी इसका प्रमाण है। पर राजसत्ता और राजनेता आंदोलनों में व्यä आम जनता की आवाज को सुन नहीं पा रहे हैं या वे उसे सुनना नहीं चाहते हैं। उस आवाज को सुन कर समाधान ढूंढने की बजाय वे इन्हें उनकी कुर्सी और सत्ता के खिलाफ षड़यंत्र मान रहें हैं। लोकतंत्र अब लूटतंत्र, गिरोह तंत्र, काकस तंत्र में तब्दील हो रहा है। इस राजनीति की अंधी और विचारहीन वैश्वीकरण की नीति ने भारत के गरीब, वंचित वर्गों की तकलीफ बढ़ार्इ है। किसान, मजदूर, कारीगर, बुनकर, मछुआरे एवं प्राकृतिक संसाधनों पर आजीविका हेतु निर्भर समुदायों की बदहाली बढ़ी है। राजसत्ता उनके हितों से कटकर कार्पोरेट के स्वार्थों को साध रही है। अत: राजनेता या तो इन आंदोलनों को दबाने के लिए दमन का इस्तेमाल करते नज़र आये या इन आंदोलनों को बिखेरने के लिए साजिश रचते नजर आये।

यधपि राजसत्ता और राजनेताओं के प्रयत्नों से आंदोलन दबते और बिखरते दिख रहे हैं पर आम जनता के मन में सुलगता असंतोष और आक्रोश सही समय और सही दिशा का इंतजार कर रहा है। देश की राजनीति पर जब हम नजर डालते हैं तो मन में निराशा और खिन्नता उत्पन्न होती है। राजनैतिक दलों में नीति और नीयत का भेद समाप्त हो गया है। राजनीति केवल सत्ता हथियाने का साधन बन गयी है। स्थापित राजनैतिक दलों में कोकाकोला, पेप्सी कोला संस्कृति छा गयी है, जैसे अमेरिकी कंपनी कोकाकोला-पेप्सी कोला बाजार को हथियाने के लिए गलाकाट स्पर्धा करती हैं पर अगर कोर्इ तीसरा बाजार में आना चाहे तो वे दोनों मिलकर उसे ठिकाने लगा देते हैं। पूरा विपक्ष बंटा और बिखरा हुआ है। उन्होंने आंतरिक झगड़ों के जाल में खुद को फंसा लिया है। अखिल भारतीय दलों का व्यवस्था पर से प्रभाव कम हो रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि देश की संप्रभुता, अखंडता और एकात्मता खतरे में पड़ गयी है। दलों की चुनावी राजनीति की प्रक्रिया दिनोदिन अधोमुखी होती जा रही है। पहले सत्ताबल, बाहुबल और अब धनबल के शिकंजे में राजव्यवस्था फंस चुकी है। दलों में आंतरिक लोकतंत्र क्षतिग्रस्त हो चुका है। गुटबाजी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, महत्त्वाकांक्षा के टकराव ने इसे पंगु बना दिया है।

दुनिया में उपनिवेशवाद नाम के विद्रूप चेहरा सन 1492 में कोलंबस के अमेरिका की खोज के बाद सामने आया। इसके बाद से हथियारवाद, सरकारवाद के रास्ते गुजरते अब बाजारवाद पांव पसार रहा है। लाभोन्माद, कामोन्माद इसकी प्रेरणा है। भौतिकतावादी जीवन दर्शन से इस उन्माद को शह मिलती है। तदपूर्ति के लिए के लिये राजनैतिक और आर्थिक ढांचा संचालित हो रहा है। इस देश के प्राय: सभी स्थापित राजनैतिक दल अमीर परस्त और विदेश परस्त हो गए हैं। राजनैतिक दलों में हुए इस भेद समापित के कारण देश में ऐसी परिसिथतियां बन गयी हैं जैसे फुटबाल के खेल में दोनों टीमें एक तरफ से खेलने में लगी हों और जनता पर दनादन गोल दाग रहे हो पर जनता की ओर से गोल बचाने वाला कोई बचा ही नहीं हो। जब ऐसी परिसिथति हो, तो जरुरी हो जाता है कि दर्शक दीर्घा में बैठे कुछ लोग मैदान में उतरें और जनता पर हो रहे अत्याचार को रोकें।

यही परिस्थिति हमें वैकलिपक राजनीति पर विचार करने और पहले करने के लिए आवाज दे रही है। पर बिना पूरा विचार किये मैदान में उतरना अपरिपक्वता होगी। यदि हमें अपने लक्ष्य की प्रापित में सफल होना है और स्थापित दलों की तरह राजनैतिक गिरोह बनने से बचना भी है, तो हमें कुछ बातों पर पहले विचार विमर्श कर लेना होगा। और जिन विषयों पर सहमति बनेगी उसे मानने वालों को एकत्र लाकर संगठन बनाना होगा। मोटे तौर पर वैकलिपक राजनीति की दिशा तय करने के लिए हमें तीन बातों पर विचार करना होगा -

1. वैकलिपक राजनीति का एजेण्डा क्या हो ?
2. वैकलिपक राजनीति के संगठन की कार्यपद्धति क्या हो ?
3. वैकलिपक राजनीति के लिए इस संगठन में शामिल लोगों के लिए आचारसंहिता क्या हो ?

इन तीन मुद्दों पर क्रमश: या एक साथ भी विचार किया जा सकता है।

वैकलिपक राजनीति की लक्ष्य प्रापित के लिए उसके अनुरुप एजेण्डा बनाना पहली प्राथमिकता है। हम वैकलिपक राजनीति से क्या प्राप्त करना चाहते हैं इस बारे में निम्न बातें उल्लेखनीय हैं :

1. भारत में विकास का स्वरूप मानवकेंद्रित न होकर प्रकृतिकेंद्रित समेकित विकास हो।
2. भारत अमेरिका या चीन की कापी नहीं, अपनी विषेशता के साथ भारत बना रहे।
3. समृद्धि और संस्कृति का संतुलन बना रहे।
4. भारत के प्रत्येक नागरिक को ईमान की रोटी और इज्जत की जिन्दगी उपलब्ध हो। इसमें वंचितों को प्राथमिकता मिले।
5. समाज में शोषण और विषमता दूर हो। देश में न्याय और एकता स्थापित हो।
6. देश में भ्रष्टाचार समाप्त करना है। भ्रष्टाचार का कारण वर्तमान व्यवस्था के दोष हैं। उन दोषों को दूर किया जाये।
7. देश की राजनीति को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर वापस लाया जाये। इसके लिए दोषपूर्ण चुनाव प्रणाली में सुधार पहली प्राथमिकता हो।
8. भारत विश्व में गौरवशाली पद पर पुर्नप्रतिषिठत हो।
9. शोषण, गरीबी, विषमता, अत्याचार, भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार आदि इस मानव कें विकास की अधकचरी समझ के फलित हैं।

18 अगस्त 2008 से अमेरिका की महामंदी शुरू हुर्इ। उसका असर सर्वत्र है। दुनिया बंद गली के मुहाने पर खड़ी है। आवश्यकता है विकास मानवकेंद्रित न होकर, प्रकृतिकेंद्रित समेकित विकास के अधिष्ठान पर स्थापित हो। इसके लिए जरूरी है कि संस्कृति के आधारशिला पर समृद्धि की साधना हो। विकेंद्रीकरण और देशी सोच इसकी दिशा होगी। विविधीकरण और स्थानिकीकरण इसकी प्रक्रिया का हिस्सा होगी विकास की समझ बदलने से पैमाने भी बदलेंगे।

वैकलिपक राजनीति के इन लक्ष्यों को अभिव्यक्त करने में हमारे बीच में शाब्दिक अंतर हो सकता है, पर भाव में एकरूपता है। ऐसा विश्वास है। वर्तमान राज्यव्यवस्था में क्या-क्या बदलाव और सुधार हों तथा कौन-सी वैकलिपक नीतियों को अपनाया जाए जिससे वैकलिपक राजनीति का एजेण्डा बने। यह सामूहिक विचार-विमर्श का विषय है। आपके भी विचार सभी तक पहुंचे इसका सभी से अनुरोध है। सभी के विचारों को मिलाकर एक प्राथमिक प्रारूप बने यह अपेक्षा है। उस पर गंभीर विचार करके अंतिम रूप दिया जाये। आपके सकारात्मक सहयोग की आशा के साथ।

के. एन. गोविन्दाचार्य

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