‘नामर्दों के शहर में बलात्कार’ या 'डर्टी पिक्चर' को राष्ट्रीय पुरस्कार...

Published: Sunday, Dec 30,2012, 01:02 IST
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देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार की शर्मनाक घटना पर संसद से देश की हर मुख्य सड़क पर आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है। बलात्कारियों को फाँसी की मांग उठ रही है इसीलिए एक आरोपी के पिता को भी कहना पड़ा, ‘यदि मेरा दोषी है तो उसे फाँसी अवश्य दी जाए।’ आरोपियों के साथ-साथ दिल्ली पर आक्षेप लगाने वाले भी सक्रिय हैं। एक सज्जन ने ‘नामर्दों के शहर मेँ बलात्कार’ कहा तो दूसरे ने ‘कायरों की नगरी’ कह देश और दिल्ली की व्यवस्था को आइना दिखाने का प्रयास किया है।

हमारा मत है कि कोई शहर नामर्द या कायर नहीं होता। उसके कुछ लोग अपनी जिम्मेवारी का पालन नहीं करते तो यह केवल उसी एक शहर का नहीं पूरे समाज की चिंता का विषय होना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि दिल्ली की घटना केवल कानून व्यवस्था की असफलता नहीं है बल्कि अपसंस्कृति का संड़ाध का परिणाम भी है। जो समाज अपने जिम्मेवारी को भूल अपनी युवा पीढ़ी को खुला छोड़ देगा उसे ऐसे दिन ही देखने पड़ते हैं। क्या यह सच नहीं कि हम अपनों के लिए किसी भी तरह से ज्यादा से ज्यादा सुविधाए जुटाने से अपने बच्चों से अधिक अंक पाने की चिंता में लगे हैं ताकि वे ‘मोटा पैकेज’ पाने लायक बन सके। ऐसे में दोष केवल दिल्ली की नामर्दी का नहीं, पूरे समाज की नासमझी का है। ऐसा माने बिना किसी जागरण की उम्मीद नहीं की जा सकती। समाज के बाद दोष सरकारों का है जो नैतिक मूल्यों और संस्कार विहीन शिक्षा प्रणाली लागू करती है। जब हमारे सपनों में अमेरिका बसता रहता है तो हमारे बच्चे भी कल अपने बस्ते में बन्दूक लेकर जायें तो किम आश्चर्यम्। यदि हम केवल लक्षणों को रोग मानकर विचार करेंगे तो बात बनने वाली नहीं है। जड़ पर प्रहार नहीं करोगे तो आज एक शहर को नामर्दों का कहो, कल सारे देश को कहने का अवसर भी आ सकता है। जब तक संस्कार नहीं सुधरेंगे, कितने भी उपचार किये जायें, अधूरे ही रहेंगे। शिक्षा, संस्कार व जीवन लक्ष्य तथा उन्हें प्राप्त करने के मार्ग को बदलने की सख्त जरूरत है। जब हम चल ही रहे हैं, कंटकाकीर्ण मार्ग पर तो फिर उपवन और सुमन की पावन सुरभि की कामना कैसे कर सकते हैं।

बलात्कारियों को फाँसी की सज़ा देने पर विचार करने से ज़्यादा ऐसा समाज बनाने पर विचार करने ज़्यादा ज़रूरी है जिसमें बलात्कारी पैदा ही न हो सकें। क्या 'डर्टी पिक्चर' को राष्ट्रीय पुरस्कार देकर हम किसी सभ्य समाज की कामना करने के अधिकारी हैं? क्या कलाकारों, साहित्यकारों, संतों, महापुरुषों से अधिक राजनेताओं को जरूरत से ज्यादा सम्मान देना उचित हैं? क्या राज्यपाल और मुख्यमंत्री रहे एनडी तिवारी, मंत्री रहे गोपाल कांडा, जैसे लोगों के रहते राजनीति से किसी नारी सम्मान की आशा की जा सकती है? पश्चिमी अंधानुकरण बनाम कम से कम कपड़े पहनने को स्टेटस सिंबल का दर्जा देकर हम अपने समाज में सदाचार की उम्मीद रहने वाले मूर्ख हैं? क्या चरित्रहीन सितारों द्वारा अश्लीलता के प्रचार का परिणाम सदाचार हो सकता है? अपसंस्कृति के इस दौर में टेलीविजन जो कुछ हमारे घरों में परोस जा रहा है, वह क्या है? सास-बहू के धारावाहिकों के नाम पर परिवार के भीतर कल्पित षड्यंत्रों को परोसने के बाद ‘रियलिटी शो’ आ गए। जिसमें आम आदमी की संवेदनाओं से खेलने तथा चौंकाने वाला मसाला परोसकर टीआरपी बढ़ाने का खेल बदस्तूर जारी है। इस खेल का नया एपिसोड है बिग बॉस नामक धारावाहिक। इस धारावाहिक में चोर-लुटेरों से जघन्य अपराधों में लिप्त खलनायकों को नायक बनाने का खेल कई सालों से बदस्तूर जारी है। छल-कपट, धोखा, प्यार का प्रपंच, षड्यंत्र, पागलपन की हद तक लड़ाई-झगड़े, कलह, झूठ-फरेब जैसे कृत्यों को दर्शकों के समक्ष पेश करके विज्ञापन बटोरने का कृत्य चल रहा है।

टीवी चैनलों द्वारा फैलायी जा रही अपसंस्कृति पर पद्म विभूषण कवि गोपालदास नीरज कहते हैं...

"टीवी ने हम पर किया यूं छुप-छुप कर वार। संस्कृति सब घायल हुई बिना तीर-तलवार "
इंटरनेट बहुत उपयोगी है लेकिन उसका अनियंत्रित संसर्ग अमृत से अधिक ज़हर बांट रहा है। इसके चलते किशोर पथभ्रष्ट हो रहे हैं और यौन-अपराधों का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। टीवी चैनल प्रेम-प्रसंगों के नाम पर फूहड़ता व विवाहेत्तर संबंधों को महिमामंडित करने में लगे हैं। नारी आज़ादी की दुहाई देकर लिव-इन- रिलेशनशिप, समलैंगिक तथा विवाहेत्तर संबंध औश्र न जाने क्या-क्या विभिन्न धारावाहिकों में दिया जा रहा है, वह बच्चों के दिलो-दिमाग में ज़हर घोल रहा है। लेकिन देश के नीति-नियंता खामोश बैठे हैं। वैश्वीकरण व खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर पश्चिमी देशों ने अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए जो हथकंडे अपनाये, उसके साथ पश्चिमी देशों की गंदगी भी हमारे समाज में घुल रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के साथ उनकी अपसंस्कृति के वायरस हमारे तंत्र में घुल रहे हैं। इंटरनेट पर लाखों अश्लील साइटें देश में खोली जा रही हैं। मोबाइल-कंप्यूटर के जरिये वे लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच रही हैं। सोशल साइट्स के नाम पर इसका विस्तार घर-घर तक पहुंच रहा है। यह सब पश्चिमी संस्कृति में स्वीकार्य है लेकिन भारत में वर्जित है क्योंकि रिश्तों की पवित्रता व यौन-शुचिता को नष्ट करते ये आक्रमण हमें स्वीकार्य नहीं। ईमानदारी की बात तो यह है कि अब तक हुए तमाम आक्रमणों ने भारतीय संस्कृति को उतना नुकसान नहीं पहुंचाया जितना पश्चिम की अपसंस्कृति ने पहुंचाया है। क्या यह सत्य नहीं कि जो कुछ हुआ उसके दोषी सिर्फ वे नहीं जिन्होने ये घिनोना काम किया बल्कि वे भी हैं जिन्होने देख कर अनदेखा किया? यदि हम भी ऐसी घटनाओं से सबक लेकर ईमानदारी से इस बात को नहीं समझेगे कि ऐसा क्यों हो रहा है तो हम सब भी बलात्कारी हैं, समाज के अपराधी है। हमारे बच्चे उद्दंड हो रहे हैं, लेकिन हमारे पास यह समझाने का समय ही कहाँ है कि वे ऐसे क्यों हो रहे है? उन्हें जो बचपन से घर में दिखाई दे रहा है, उसको ही ग्रहण कर रहे हैं। हमारे पास समय कहाँ है उनकी बात सुनाने का? उनको सही दिशा कौन दे? जो उन्होंने अपने परिवेश में देखा उसी पर चलना शुरू कर दिया। हमने ग़लत देखा तो बस फटकार और मार को हल समझ लिया लेकिन अपनी गलती तब भी नहीं देख पाये। जब तक अपनी गलती समझते हैं तब तक पानी सर से गुजर चुका होता है।

नैतिक मूल्यों और संस्कारों से समाज और संस्कृति जीवित रहती है। बच्चों में नैतिक मूल्यों की वृद्धि के लिए फौरन ‘कुछ’ की जरूरत है क्योंकि हमारी नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों की कमी हो रही है ऐसे में अपनी परंपरा और संस्कारों से परिचित कराने के लिए हर विद्यालय को संस्कारशाला बनाने की आवश्यकता है लेकिन हमारे स्कूल भी तो बाजार बन चुके हैं। ऐसे में कैसे होगी नैतिकता की स्थापना? आज हमारे नैतिक मूल्यों पर सबसे अधिक प्रहार हो रहा है पर हमें कानून पर क़ानून बनाने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही कहाँ हँ? कानून बनाने से बड़ा है परम्परा बनाना क्योंकि क़ानून और संविधान की धज्जियाँ उड़ते हुए रोज देखी जा सकती है। क्या नारी उत्पीड़न के विरुद्ध कानून बनाने से नारी उत्पीडन रुक गया? परिवार में वरिष्ठ लोगों के संरक्षण के लिए क़ानून बनाकर हमने मान लिया कि अब कोई भी पुत्र अपने दायित्व से बच नहीं सकता क्योंकि कानून में सजा का भी प्राविधान कर दिया गया है। परंतु क्या इससे समस्या हल हुई? कानून किसी भी सामाजिक, चरित्रिक दोष का निदान कर ही नहीं सकता है। हम क्यों भूलते हैं कि बहुचर्चित बीएमडब्ल्यू मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा था- ‘दुर्घटना में छह लोग मारे गए थे। तीन लोग कार से बाहर आए और उन्होंने देखा कि उनकी कार पर कोई खरोंच तो नहीं है और मृतकों की चिंता करने के बजाय वे वहाँ से चले गए। उनमें कोई भावना नहीं हैं। कुछ लोग हूबहू रोबोट में बदल गए हैं, जिनमें मानवीय जीवन को लेकर कोई चिंता नहीं है।’

आज हमारे घरों में ढ़ेरों कार्टून कोमिक्स, कंप्यूटर गेम्स की सीडी तो मिल जाएँगी लेकिन कोई अच्छी पुस्तक, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद जैसे मनीषियों की जीवनी शायद ही मिले। स्कूली सलेबस में तो ऐसा होना और भी मुश्किल है। हम अपने बच्चे के लिए ऐसी किताबें खरीदते ही कब हैं? इसकी इस कमी को परिवार के बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमे बुजुर्ग अच्छे लगते ही कहा है? हम अपने बच्चों को दादा-दादी से दूर रख कर अपनी आजादी पर फूले नहीं समाते तो इस अंधी आजादी की कीमत कौन चुकायेगा? हमारे झूठे सपनों की धरती अमेरिका के एक स्कूल में गोलीबारी कर 20 बच्चे समेत 27 लोगों की हत्या करने वाले युवक के जीवन की पड़ताल बताती है कि उसका बचपन बहुत बुरा बीता इसी कारण वह संवेदनहीन और आत्मकेन्द्रित बना। हम भी तो आत्मकेन्द्रित हो जा रहे हैं फिर केवल कानून को दोषी ठहराना कहाँ की समझदारी है? जब अमेरिका में ओबामा आंसू पोंछते हुए कहते हैं हम सब आज अपने-अपने बच्चों को गले लगाएंगे और उन्हें बताएंगे कि हम उन्हें बहुत प्यार करते हैं।’ तो क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि वे भी इसे कानून से परे की समस्या मानते हैं। हमें भी समझना होगा कि समाधान केवल और केवल एक ही है और वह है स्वयं को अपसंस्कृति की संड़ांध से बचाना।

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