कभी विदेशी मीडिया के दुलारे रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर विदेश से ही जोरदार प्रहार हो रहे हैं

Published: Thursday, Jul 19,2012, 10:32 IST
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कभी विदेशी मीडिया के दुलारे रहे हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर विदेश से ही जोरदार प्रहार हो रहे हैं तो प्रत्येक भारतीय को शंका है? सभी जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मनमोहन सिंह आसमान से जमीन पर आ गए। कारण की विवेचना करने से पूर्व यह जानना जरूरी है कि पिछले हफ्ते प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका टाइम ने उन पर हमला बोलते हुए उन्हें 'अंडरअचीवर' घोषित किया था जबकि यही पत्रिका उन्हें हीरो भी बता चुकी है। 'टाइम' ने देश की आर्थिक बदहाली के लिए सीधे तौर पर डॉक्टर मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा करते हुए 'फिसड्डी' तक करार दे दिया। टाइम के बाद अब ब्रिटेन के समाचार पत्र 'द इंडिपेंडेंट' ने हमारे प्रधानमंत्री जी अपमानित करने में कोई कसर बाकि न रखते हुए 'मनमोहन सिंह-इंडियाज सेवियर ऑर सोनियाज पूडल' शीर्षक से लेख प्रकाशित किया है। भारत से हुए जबरदस्त प्रतिकार के बाद अख़बार ने अपने वेब संस्करण से पूडल शब्द हटाकर उसकी जगह पपेट लिख दिया जिसे बाद एक बार फिर से पूडल किया। लेकिन फिर दूसरा बदलाव करते हुए उसे अंडरअचीवर कर दिया गया।

उस समाचारपत्र में प्रकाशित लेख में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार के जूनुन को खत्म हो चुका बताया है। यह भी लिखा है कि उन्होंने देश के विकास की रफ्तार भी रोक दी। इसे पूर्व पिछले दिनों भारत की यात्रा पर आए सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सेन लूंग ने भी अपनी टिप्पणी में कहा था, 'निवेश की दृष्टि से भारत एक जोखिम भरा देश है और यहां आर्थिक उदारीकरण जारी रहने पर उन्हें संदेह है।' हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ने भी इसी सुर में सुर मिलाते हुए मनमोहन सरकार को दोषी ठहराया है। ओबामा ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारतीय नीति रिटेल व अन्य कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए बाधक है। भारत में अब भी निवेश करना काफी कठिन है। बेशक ओबामा के बयान के जवाब में सरकार ने उसे ओबामा का अपना अनुभव बताया। प्रवक्ता के अनुसार, ' भारत आज भी विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक जगहों में से एक हैं और भारत अपनी इस जगह को कायम रखेगा। भारत में फैसले विस्तृत सलाह से लिया गया फैसला राष्ट्रहित से जुड़ा होता है।' यह सत्य है कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है।, विभिन्न रेटिंग एजेंसियां ही नहीं हमारे अपने विशेषज्ञ भी निराशाजनक आंकड़ों के बीच नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर चुके है। आर्थिक आंकड़े बताते हैं किमहंगाई बेलगाम है, औद्योगिक उत्पादन, आर्थिक वृद्धि दर, विदेशी निवेश, विदेशी मुद्रा भंडार, डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, राजकोषीय एवं व्यापार घाटा निराशाजनक रहे हैं।

राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5.9 फीसदी के बराबर हो गया है जो बजट अनुमान 4.6 फीसदी से ज्यादा है। बेशक इस स्थिति के लिए सरकार का मुखिया होने के नाते से मनमोहन सिंह को जिम्मेवारी लेनी ही पड़ेगी। लेकिन गठबंधन सरकार के सहयोगी दल अपने-अपने नफे-नुकसान का गणित भी देख रहे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार का जनमानस पर प्रभाव लगातार घटने के कारण इन दलो को अपने भविष्य की चिंता है तो दूसरी ओर स्वयं कांग्रेस भी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। कांग्रेसजन राहुल से नेतृत्व संभालने की गुहार लगा रहे हैं लेकिन अनिश्चय के भंवर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यूपीए-1 तो फिर भी ठीक था लेकिन यूपीए-2 नेतृत्व छवि के संकट से गुजर रहा है। बेशक मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार का यक्तिगत रूप से कोई आरोप नहीं है लेकिन उनके मंत्रियों का संलिप्तता जगजाहिर है। ऐसे में सब कुछ देखते हुए भी खामोश रहने का अपराध तो उनसे हुआ ही है। (स्वयं भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध के होने की जानकारी को छिपाना अपराध है) दूसरी ओर लोकपाल विधेयक और कालेधन के मुद्दे पर कोई ठोस कार्यवाही न होना सिंह की छवि को प्रभावित करता रहा है। भूमि सुधार, ईंधन सब्सिडी, श्रम अधिकार, पेंशन और खुदरा क्षेत्र में सुधारों पर अगले आम चुनाव तक किसी प्रगति की उम्मीद दिखाई नहीं देती है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत को आर्थिक सुधारों की नसीहत देना, हमारे नेताओं को स्वीकार नहीं।

'वयम् पंचाधिक शतम्' की तर्ज पर पक्ष-विपक्ष ने एक स्वर में कहा कि अमेरिका अपनी चिंता करें और भारत को सलाह न दे। वे भारत के अंदरूनी मामलों में दखलअंदाजी न करें, भारत अमेरिका के कहने पर अपनी नीतियां नहीं बनाएगा। वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति अपने चुनाव अभियान के दौरान ग्लोबल मंदी के शिकार अपने लोगों को संकेत देना चाहते हैं कि वे अमेरिकी हितों के लिए भारत पर दबाव बना रहे हैं और जीतने के बाद अमेरिकी उद्योग जगत की चिंताओं को दूर करेंगे, जो शिकायत करते है कि भारत में अब भी खुदरा कारोबार समेत कई क्षेत्रों में निवेश करना मुश्किल है। विदेशी निवेश को रोकने कारण भारत और अमेरिका दोनों देशों में नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही है।' जहाँ तक ब्रिटिश अखबार द्वारा हमारे प्रधानमंत्री के विषय में शिष्टाचार की सीमाएं लांघते हुए 'मनमोहन सिंह -इंडियाज सेवियर ऑर सोनियाज पूडल' लेख प्रकाशित करने का प्रश्न है, वह निश्चित रूप से निंदनीय हैं। व्यक्ति के रूप में मनमोहन सिंह पर हजार टिप्पणी की जाए लेकिन भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कोई टिप्पणी स्वीकार्य नहीं होगी। भारत के प्रधानमंत्री की अस्मिता भारत के करोड़ों लोगों के सम्मान से जुड़ी है। उसे कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह उचित ही है कि भाजपा सहित सम्पूर्ण विपक्ष ने ओबामा की टिप्पणी 'हास्यास्पद' बताते हुए उसे अस्वीकार किया है। भाजपा प्रवक्ता ने ठीक ही कहा, 'वह देश हमें निवेश और अर्थव्यवस्था के बारे में प्रमाणपत्र दे रहा जो स्वयं आर्थिक समस्या का सामना कर रहा है. हमें अपने तरीके से अपने राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करना चाहिए. यह हास्यास्पद है।

भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे मुद्दों पर अपने हितों को लेकर आंखें नहीं मूंद सकता। हमारे पास एफडीआई का विरोध करने का पूरा अधिकार है।' विदेशी हमलों की जद में आये मनमोहन सिंह जी को आत्मचिंतन करते हुए उन कारणों का निवारण करने की दिशा में पहल करनी चाहिए जो देश की जनता की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार के जिन्न को काबू किये बिना भारत की उन्नति संभव नहीं है। इतिहास ने मनमोहन सिंह को इतिहास बनाने का अवसर दिया है। वे अब भी कमर कस लें तो भारत का भविष्य बदल सकता है। यदि वे अपने-पराये की परवाह किये बिना दोषियों पर निर्ममता से पेश आये तो इतिहास उन्हें शानदार सरदार के रूप में स्मरण करेगा वरना आज उनकी छवि क्या है यह दोहराने की जरूरत नहीं है। ..... और यदि वे स्वयं को प्रधानमंत्री बनाने वालों का कर्ज ही चुकाते रहना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि वे राष्ट्र का और अपमान करवाने की बजाय इस गरिमापूर्ण पद को त्याग करते हुए देश के प्रबुद्ध मतदाताओं को तय करने दें कि नेतृत्व कौन करेगा। आज प्रश्न मनमोहन, राहुल, मोदी या नितिश का नहीं, भारत का है। भारत की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक नहीं, हजारों मनमोहन, राहुल, मोदी या नितिश भी न्यौछावर किये जा सकते हैं। विदेशी नेता अथवा मीडिया अपने हितों के लिए उनपर दबाव हुए उन्हें कुछ भी कहते रहें लेकिन भारत के भाग्य विधाता के रूप में उत्तदायित्व उनसे जिस प्रकार की अपेक्षा करता है उस चुनौती पर उन्हें खरे उतरना ही होगा। भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपने शुद्ध अंतकरण से कर्तव्य पालन करते हुए परिस्थितियों द्वारा प्रस्तुत चुनौती का उत्तर देने का पुरुषार्थ उन्हें दिखाना ही होगा। सरदार मनमोहन सिंह को असरदार बनना ही होगा। यदि वे अब भी मौनी बाबा बने रहे तो निर्मम इतिहास उन्हें क्षमा नहीं करेगा।

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