उफ़ ये बुद्धिजीवी !

Published: Thursday, Nov 14,2013, 14:08 IST
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चुनावी मौसम की शुरुआत होते ही 'बुद्धिजीवी' कीटकों को पंख उग आये हैं. सतही छिछले 'विचारों' की फडफडाहटों से राजनैतिक हवाओं के रूख को मोड़ने की चालाक किन्तु निरर्थक कोशिशें तेज़ हो चुकी हैं. यूं तो भारत और भारतीयता, संघ और राष्ट्रवादी विचारधारा, नरेंद्र मोदी और गुजरात पूरे वर्ष, बारहों महीने, आठ पहर-चौंसठ घडी इन 'विचारवान' विभूतियों के निशाने पर रहते हैं, किन्तु इन दिनों  इन्होने आधुनिक भारत के महानतम निर्माता सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्मारक बनाये जाने पर ही अरण्य रोदन शुरू कर दिया है.

इसी कड़ी में एक और कोशिश है... वरिष्ठ पत्रकार (पार्टी विशेष की प्रवक्ता कहना अधिक उचित होता. अस्तु!) मृणाल पाण्डे का अजीबोगरीब लेख: "पुतले लगाने से पुरखे नहीं बनते" (अभिव्यक्ति, पृष्ठ 10 दैनिक भास्कर, 13-11-2013)

शीर्षक पढ़कर यदि आप अनुमान लगा रहे हों कि यह लेख आजाद भारत के एकमात्र 'राजपरिवार' की जहाँ-तहां विराजित प्रतिमाओं के विरुद्ध कोई सार्थक पहल है तो वाकई आप बहुत भोले है! वास्तव में इस लेख का एकमात्र (व तुच्छ) उद्देश्य भारत की अखंडता के भव्यतम स्मारक... गुजरात में स्थापित होने जा रही सरदार वल्लभ भाई पटेल की महान प्रतिमा का येन-केन-प्रकारेण विरोध कर जनता के मन में संदेह पैदा करना ही हैं.

मृणाल जी बड़ी ही आलंकारिक भाषा में व्यक्तिपूजा की खिलाफत के बहाने एक-एक कर भारत के सभी महानायकों के प्रति जनता के प्रेम को ग़लत सिद्ध करने की कवायदें करते हुए अंत में 'Statue of Unity' के खंडन पर उतर आती हैं.

बेवजह विरोध ही विचारों और तथ्यों के संतुलन को भी गड़बड़ा देता है.लेखिका 'विरोध की रौ में इस कदर बह गयीं कि अपने इस 'विद्वत्तापूर्ण' (?) आलेख में वे बाबासाहब, शिवाजी महाराज, महात्मा फुले तथा राममनोहर लोहिया को 'उत्तर भारत के क्षेत्रीय नेता' बताते हुए उनकी तुलना एनटीआर, एमजीआर व जयललिता से कर बैठीं...

धन्य है आपका ऐतिहासिक व सामाजिक ज्ञान !!

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले व डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे क्रन्तिकारी युगपुरुषों.. जिनके विराट कर्मों ने ना केवल तत्कालीन भारत में क्रन्तिकारी वैचारिक व सामाजिक परिवर्तन किये अपितु वर्तमान भारत को भी प्रेरणा दे रहे हैं, उन्हें आप महज़ 'क्षेत्रीय नेता' कहकर ख़ारिज करना चाहती हैं? (सारे छद्म अम्बेडकरवादी/ दलितवादी इसका विरोध करने की बजाय किस खोह में जा छिपे हैं?)  चलिए.. मान लिया कि संभवतः आप  'पवित्र परिवार' के सदस्यों और उनके युवराज को ही एकमात्र 'राष्ट्रीय नेता' मानती हों जो इन दिनों 'राष्ट्रीय विदूषक' के रूप में (कु)ख्यात हो रहे हैं: किन्तु विधर्मी आक्रमणों के  तले दबे-कुचले भारत को पुनः सत्ता के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करने वाले, करोड़ों भारतीय हृदयों के सिंहासनाधीश्वर शिवाजी महाराज का नाम 'क्षेत्रीय नेताओं' की सूची में किस बौद्धिक चमत्कार के तहत शामिल कर लिया आपने? चलिए यह भी मान लिया कि आप मैकाले के भूत से ग्रस्त उस 'सुशिक्षित' जमात का हिस्सा हैं जो शिवाजी महाराज की महत्ता को नकारने में एडी-चोटी का जोर लगा देते हैं किन्तु तब भी... उनकी गिनती इस युग के '''''क्षेत्रीय नेताओं''' में कैसे कर दी जबकि वे कुछ शताब्दियों पूर्व हुए हैं?

लेखिका की 'चमत्कारिक टिप्पणियाँ' यही ख़त्म नहीं होतीं. आगे वे लिखती हैं- "भारत में मूर्तिवादी मानसिकता के बीज हमारे औसत घरों में विद्यमान हैं. उनके स्वामी चोरबाजारी, करचोरी और तमाम काले धंधों की बेशुमार कमाई से बनवाई अपनी कोठियों में भी एक खास कोना देवपूजा के लिए ज़रूर बनवा लेते हैं ताकि मूर्तियों के आगे मत्था टेकने के बाद वे बिना झिझक अनैतिक दुनियावी माया में निमग्न हो सकें." यानि आपके हिसाब से भारत प्रत्येक मूर्तिपूजक भ्रष्ट और चोर है? (तो क्या आपके हिसाब से केवल मूर्तिपूजा ना करने वाली पूरी की पूरी ज़मातें ही ईमानदारी और शुचिता की १००% खरी ठेकेदार हैं?) आदरणीय लेखिका जी, भारत का 'औसत मूर्तिपूजक' बड़ी-बड़ी कोठियां बनवाने की हैसियत नहीं रखता! वह तो इस देश की मिट्टी को अपने पसीने से सींचने वाला, अपने फौलादी हाथों से देश का भाग्य गढ़ने वाला गरीब श्रमजीवी है जो  मूर्तियों में श्रद्धा के दम पर ही आप जैसे भ्रांत बुद्धिवादियों को थोथा साबित कर मानव सभ्यता का सबसे बड़ा चमत्कार यानि कुभ मेला खड़ा लेता है और हार्वर्ड जैसे आपके श्रद्धाकेन्द्र भी इस चमत्कार से सीख लेने भारत आते हैं.

इसके बाद लेखिका तुरत अपने वास्तविक एजेंडे पर आ जाती हैं, जिसके अनुसार उन्हें एक ही दल विशेष और राज्य विशेष को कोसना है. अतः वे १२ साल पुराने दंगों का ज़िक्र करना नहीं भूलतीं और फिर से ना जाने किस बौद्धिक चमत्कार के चलते सरदार वल्लभभाई पटेल के स्मारक और एक सांसद के घर में नौकरों पर हुए दुखद अत्याचार को आपस में गड्डमड्ड कर देती हैं?

इनका विचार है कि कुछ लोग सरदार पटेल का स्मारक बनवाकर स्वयं को उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.  तो अब आप भी भारत की राजनीति में सरदार पटेल के महत्व को मानने लगे हैं? इससे पहले तो आपको परिवार विशेष के अतिरिक्त किसी का महत्व नज़र ही नहीं आता था! आपका यह भी विचार है कि ऐसे स्मारक 'निरर्थक' हैं व आने वाली पीढ़ियों के लिए वे मात्र अजायबघर के पुतले बनकर रह जायेंगे. यह तो गज़ब हो गया! यह बात आपको आज से पहले कभी क्यों नहीं सूझी जब अस्पताल से लेकर खेल के मैदान तक और अभयारण्य से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कारों तक के नामों को नेहरु-गाँधी खानदान के नाम पर रखा जाता रहा है और जहाँ इनकी छोटी-बड़ी मूर्ति ज़रूर रहती है ? जयपुर शहर के सार्वजनिक कलाकेन्द्र में लकड़ी पर उकेरी गयी सोनिया जी की हथेलियों की छाप तक लगी है. हालाँकि कला क्षेत्र में सोनिया जी का क्या योगदान है यह तो उनकी पार्टी ही जाने ! (गनीमत है कि कम से कम हमारे घरों को तो बख्श दिया गया है! यदि कांग्रेस की इच्छा चलती तो शायद हमारे घरों के नाम भी 'इंदिरा कृपा', राजीव छाया', सोनिया जी का आशीर्वाद' आदि रखवाए जाते.)

वैसे ये मोहतरमा अकेली नहीं हैं. कुछ और भी स्वघोषित कथित जनवादी, सुधारक, विचारक और भी ना जाने कौन-कौन से ‘वादों’ के झंडाबरदार हैं जिनका कानफोडू सियारी प्रलाप जारी है. कुछ का मानना है कि स्मारक बनाना, आने वाले चुनावों में वोट बटोरने के लिए खेला गया दांव है. उनकी जानकारी के लिए बता दें कि सरदार पटेल के स्मारक की घोषणा 7 अक्टूबर 2010 को हो चुकी थी. परिवार विशेष के भक्तों ने तभी इस मुद्दे को क्यों नहीं लपक लिया? शायद तब उन्हें यह आभास नहीं था कि भारतीय जनमानस सरदार पटेल जैसे वास्तविक राष्ट्रनायकों से कितना अधिक प्रेम करता है. राजमाता की भक्ति से अवकाश मिले तब तो कुछ सोचें? वैसे एक बात बड़ी अच्छी हुई कि पहली बार कांग्रेस ने सरदार पटेल की जयंती पर उन्हें याद किया व अखबारों में विज्ञापन दिए वर्ना सरदार पटेल व लाल बहादुर शास्त्री जी को स्मरण करने का दायित्व तो उन्होंने ‘भगवा आतंकियों’ को ही सौंप रखा था!

एक महाशय कहते पाए गए कि इस ‘गरीब’ देश में इतना महंगा स्मारक बनवाना, धन की बर्बादी है. ‘गरीब’ देश? महोदय, यह देश विश्व की  सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और यहाँ समस्या धन की नहीं, बल्कि उसके असमान वितरण की है. विश्व के गरीब देशों का जितना कुल बजट है उससे अधिक का तो एक-एक घोटाला होता है. उस वक़्त प्रायोजित रुदालियों का यह समूह कहाँ गायब हो जाता है?

एक ‘झाड़ूवादी’ टोपीधारी का कथन था कि ये धन स्मारक की बजाय विद्यालय, शौचालय आदि बनाने में खर्च होना चाहिए था. अभी कुछ दिनों पहले यही झाडूवादी मंगलयान के खर्च पर भी रोते पाए गए थे. ये अक्सर रक्षा बजट पर भी रोते पाए जाते हैं. यह बात अलग है कि इनका अपने झाड़ू प्रचार हेतु झंडे,टोपी,पोस्टर का खर्चा भी करोड़ों में है.

बुद्धिजीवियों का एक समूह दिमागी दिवालियेपन में इन सभी को पछाड़ते हुए यह कहने लगा है कि मोदी गरीब किसानों का लोहा छीनकर स्मारक खड़ा करने जा रहे हैं. इन्हें मेरी सलाह है कि उल-जुलूल टिप्पणियां करने से पूर्व विषय का कुछ अध्ययन भी कर लिया करें. योजना यह है कि भारत के 7 लाख गांवों के किसानों से उनके खेतों में प्रयुक्त पुराने औज़ार दान में मांगे जायेंगे और यदि आप समझते हैं कि भारत का अन्नदाता आपकी तरह ही कंजूस और बड़ी जेब, छोटे दिल वाला है, तो आपको चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए. यह देश का वही किसान है जिसने राम से लेकर चन्द्रगुप्त और शिवाजी से लेकर शास्त्री जी जैसे नायकों की एक आवाज़ पर राष्ट्र के लिए अपना सबकुछ देकर देश की नींव खड़ी की है. अब हर गाँव से लोहा आयेगा और देश का किसानअपने नायक की मूरत बनाएगा. स्मारक पर इन सभी किसानों के मुखिया यानि ग्राम सरपंचों के छायाचित्र भी लगाये जाएंगे

ओह.! अब आया आपका दर्द समझ में! शायद आपको दिक्कत इस बात से है कि विश्व का सबसे भव्यतम यह स्मारक आपके आकाओं का नहीं बल्कि भारत को सुदृढ़ करने वाले एक साधारण किसान पुत्र व उसके प्रिय भारतवासियों  को समर्पित है.

माना कि जलन में बहुत दर्द होता है.. तो सीधे कह देते! इन व्यर्थ बौद्धिक कसरतों की ज़रुरत ही क्या है?

लेखक : तनया गडकरी | फेसबुक पर जुडें ... facebook.com/tanaya.gadkari

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