विश्व महिला दिवस... उधार के आधे-अधूरे महिलावाद की आवश्यकता कहाँ है?

Published: Friday, Mar 08,2013, 20:49 IST
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विश्व महिला दिवस... आज मैं विशेषतः महिला चिंतन पर नहीं लिखना चाहती थी। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से एक महिला होना हर दिन उत्सव की तरह है। मैं साल के 365 दिन महिला होने पर गर्व कर सकती हूँ, महिलाओं के हक़ मे आवाज़ उठा सकती हूँ। तिसपर भी भारतीय होने की वजह से मेरे स्त्रीत्व के, शक्ति के पवित्र उद्घोष के रूप में मुझे 4 नवरात्रियाँ (कुल 36 दिन) विरासत मे मिले हैं। फिर भी सांझ समय, आधा ‘महिला’ दिवस गुज़र जाने पर यह लिखने बैठी, क्योंकि देखा कि कई कथित बुद्धिजीवियों द्वारा वास्तविक स्त्री अधिकारों की बजाय feminism के नाम पर जहरीला कचरा फैलाया जा रहा है। यह कचरा मुझे मेरी जड़ों के विरुद्ध खड़ा करना चाहता है। चाहता है कि मैं अपने धर्म से, संस्कृति से, यहाँ तक कि स्त्रीत्व से दूर हो जाऊँ। मैं अपने धर्म से घृणा करूँ, अपनी विशेषताओं से, अपने प्राकृतिक स्वभाव तथा अपने स्त्री होने से घृणा करूँ और एक पुरुष की अधकचरी प्रतिकृति मात्र हो जाऊँ। मुझे यह स्वीकार नहीं महिलावाद के नाम पर इन कथित महिलावादियों द्वारा भारत के प्राचीन आख्यानों की विकृत और आधी-अधूरी व्याख्या कर हमे नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है।

एक उदाहरण दूँ- हमे पढ़ाया गया है कि वैदिक काल में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने पर ऋषिका गार्गी को मस्तक काट दिये जाने की धमकी दी गई क्योंकि वह एक नारी थी। किन्तु क्या किसी ने सम्पूर्ण आख्यान उठाकर देखने का कष्ट किया? सम्पूर्ण आख्यान के अनुसार तो गार्गी के अतिप्रश्नों से झुँझलाकर याज्ञवल्क्य ने कहा- “मा अतिप्राक्षी: मा ते मूर्धा व्यपप्तत्” अर्थात “अतिप्रश्न से बचो वरना तुम्हारा मस्तक कटकर गिर जाएगा “ और यही बात वे शाकल्य नामक ऋषि से भी कहते हैं। अपितु अतिप्रश्न से शाकल्य की मृत्यु हो जाती है, जबकि गार्गी को पुनः शास्त्रार्थ का अवसर मिलता है। शाकल्य तो पुरुष थे! तब क्यों इस घटना के आधे भाग को ही हिंदुओं द्वारा ‘स्त्री की बौद्धिकता का विरोध’ के रूप मे प्रचारित किया जा रहा है?

आप सीता, द्रौपदी आदि के उदाहरण तोड़-मरोड़कर गलत रूप में पेश करते रहे परंतु क्या आपने गार्गी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के नाम तक लिए? भारतीय नारी की बात करते समय आप दक्षिण की प्रसिद्ध शैव संत अक्कमहादेवी को कैसे भूल गए जिसने स्त्री को केवल शरीर समझे जाने के विरोध स्वरूप वस्त्र त्याग दिये और जो अपने इसी निर्मोह ज्ञान और भक्ति के कारण कैवल्य ज्ञान को प्राप्त हुईं? प्राचीन भारतीय समाज को महिला विरोधी बताते समय अपनी कुमारी माता जाबालि का उपनाम धारण करने वाले ऋषि सत्यकाम जाबाल का उदाहरण कैसे भूल जाते हैं? भारतीय समाज ने उन्हे केवल स्वीकार ही नहीं किया अपितु ऋषि पद भी दिया।

जब मैंने इन कथित नारीवादियों के धर्मविरोधी विलाप की पड़ताल करने हेतु प्राचीन सनातन ग्रन्थों, वेदों और उपनिषदों को ज़रा सा खंगाला तो दंग रह गयी। नारी के प्रति ऐसा सम्मान, ऐसी स्तुति, नारी के शौर्य को जगाने वाली ऐसी अद्भुत ऋचाएँ कि स्वयं को प्रगतिवादी महिला समर्थक कहने वाले हम आज के लोग कहीं उनके आस पास भी नहीं लगते। 

देखिये ...

ऋग्वेद- 8.67.10- हे नारी, तुम अजेय हो। दरिद्रता तुम्हें स्पर्श तक नहीं कर सकती। हम तुमसे विश्व को सुखी और सम्पन्न बनाने की प्रार्थना करते हैं। हम अनुरोध करते हैं कि तुम स्वयं की क्षमताओं को जानो जिससे हम लक्ष्य को प्राप्त करने सफल हों।

यजुर्वेद 13.18- हे नारी! तुम अतीव योग्यता से युक्त हो। तुम इस पृथ्वी की भांति अडिग हो।  सम्पूर्ण विश्व की जननी हो। विश्व को कुमार्ग से बचाओ।

यजुर्वेद 13.26- हे नारी, तुम बाधाओं से हार जाने के योग्य नहीं, अपितु कठिनतम बाधाओं को हराने मे सक्षम हो। शत्रुओं और उनकी सेनाओं का नाश करो। तुममे सहसत्रों पुरुषों की वीरता है। अपनी क्षमता को पहचानो और अपनी वीरता का प्रदर्शन करो।

इसी प्रकार की कई ऋचाएँ हैं जिसमे स्त्री, माता, पत्नी, पुत्री तथा पुत्रवधू की स्तुति की गई है। इन ऋचाओं में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे नारी श्रेष्ठता की प्रशंसा की गयी है। ऋग्वेद (10.159.2) में एक स्त्री कहती है- मैं राष्ट्र की ध्वजा हूँ। मैं समाज की मुखिया हूँ। मैं श्रेष्ठ हूँ। अपने पति के प्रेम के युक्त हूँ, किन्तु युद्ध क्षेत्र में वीरता दिखाकर शत्रु सेनाओं को परास्त करती हूँ।

अब कोई मुझे बताए कि मानव और विशेषतः एक नारी के रूप मे मुझे श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु किसी उधार के आधे-अधूरे महिलावाद की आवश्यकता कहाँ है? समझ नहीं आता कि इस अजीब से महिलावाद के भुलावे मे आकार हम क्यों स्वयं को खो रही हैं?क्यों अपने अधिकारों की मांग हम पुरुषों से क्यों कर रही हैं? क्या हम गुलाम हैं? मैं सभी लड़कियों से पूछना चाहती हूँ कि आपको हर वक़्त कमजोरी दिखाने की आवश्यकता क्या है? जिस कतार मे लड़के भी पसीने मे नहाये घंटों खड़े हैं वहाँ आपको कतार तोड़कर अपना काम पहले करवाना होता है? क्या आपको कमजोरी आभूषण लगता है? क्यों आप बस-ट्रेन मे लड़-झगड़ कर सीट हासिल कर लेती हैं लेकिन कोई वृद्ध, अपाहिज आ जाए तो उसके लिए सीट नहीं छोडती? अधिकार चाहिए तब कर्तव्यों से क्यों डरा जाए? अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनने, रहने, खाने-पीने का अधिकार आपको चाहिए तो फिर किसी और लड़की के चरित्र की बुराइयाँ करने मे रस क्यों लेती हैं? उस साहसी लड़की ज्योति के लिए मोमबत्ती जला आती हैं किन्तु क्यों ज्योति की तरह संघर्ष का जज़्बा नहीं दिखातीं? हर न्यूज़ चैनल पर बयान देती हैं कि हम असुरक्षित हैं।

क्यों? अब प्रत्येक लड़की के साथ एक गनमैन तो रखा नहीं जा सकता! स्वयं को कमजोर मानेंगी तो फिर कोई क्यों आपकी ताकत को पहचानेगा? कुछ दिन पहले एक नयी-नयी महिलावादी का स्टेटस पढ़ा जिसे शिकायत थी कि कोई महिला भंवरी देवी या फूलन देवी को आदर्श नहीं मानती क्योंकि वे दलित हैं। ओह! तो अब महिलाओं के बीच भी आप इस प्रकार का सवर्ण-दलित भेदभाव करेंगे? कृपया मुझे बताएं कि भंवरी देवी ने समाज के लिए ऐसा कौन सा सराहनीय कार्य किया था कि उन्हे आदर्श माना जाए? फिर भी पूरा समाज उसे इंसाफ दिलाने उठ खड़ा हुआ। क्या आपको यह नहीं दिखता? इसके विपरीत तीजनबाई जैसी विदुषी पंडवानी कलाकार 1000 से अधिक बच्चों की माँ के रूप मे विख्यात सिंधु ताई सपकाल जैसी समाजसेवी दलित महिलाओं को हम अपना आदर्श मानते हैं। किन्तु क्या आप जैसे कथित महिलावादी इन महान महिलाओं के नाम से परिचित भी हैं? मुझे संदेह है। मै तो ईंट-भट्टे से लेकर कॉलेज, सड़कों और सरहदों तक पर नारीत्व की सम्पूर्ण चमक के साथ खड़ी प्रत्येक भारतीय स्त्री की योग्यता, जिजीविषा, उसके संघर्षों और उपलब्धियों को लेकर गौरवान्वित हूँ। ये सभी गुण नारीत्व की देन हैं। भारत की बेटियों, ज़रा उठकर सदियों से पार झांक कर देखो। हमारे धर्मग्रंथ, हमारा इतिहास स्पष्ट शब्दों मे घोषणा कर रहे हैं- “स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं, सम्मान योग्य हैं, सर्वोत्तम हैं।“ आशा है कि विश्व का भविष्य भी नारीत्व की आभा से आलोकित होगा, उन्नत होगा। चलो, अब मंदिर जाऊँ! (मंदिर में अर्पित फल, मिठाई वगैरह विशेष रूप से कन्याओं को दी जाती है। बेचारे लड़के टुकुर टुकुर देखते हैं।) कन्या होने का यह एक और लाभ!

सभी को प्रतिदिन महिला दिवस की शुभकामनायें।

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