सुदर्शन जी : जैसे मैंने देखे ...

Published: Saturday, Sep 15,2012, 22:43 IST
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सुदर्शन जी नहीं रहे... अपनी शाखा से निकल कर एक कार्यकर्ता के घर पर जा कर बैठा ही था, कि ट्विटर पर एक सज्जन ने उनके निधन का दुखद समाचार बताया। स्तब्ध होना, शायद उस भाव को ठीक से अभिव्यक्त न कर पाए, जो मेरे मन में उस समय आया। अभी कुछ दिनों पहले ही तो उनके दर्शन किये थे, और उन्होंने सदा की तरह स्नेह से आशीर्वाद भी दिया था... अभी कुछ दिनों पूर्व ही तो जब उनके मंगलोर में गायब होने का समाचार मिला, तो मन बैठ सा गया था पर कहीं का कहीं विश्वास था, कि सब ठीक होगा, और हो भी गया था। हम सब जितने वहाँ आज सुबह बैठे थे, किसी के पास शब्द नहीं थे, कि वह अपने भाव व्यक्त कर सके.. सब अवाक थे... निश्चेष्ट... स्तब्ध...

शायद यही वह संघ भाव है, जो संसार के किसी और संगठन में दिखाई नहीं देता। हमारे लिए सरसंघचालक जी किसी पार्टी के अध्यक्ष जैसे नहीं होते, वो होते हैं हम सब के पालक-पिता... हमारी प्रेरणा, हमारा उत्साह और जब हम राह भटकने लगे, तो हमारे मार्ग में प्रकाश पुंज... हम उनको आदर्श की तरह नहीं देखते, अपने में से एक मानते हैं और न कभी सरसंघचालक जी ये दिखने का प्रयास करते हैं कि वो कुछ अलग है। खैर, ये बातें तो कोई स्वयंसेवक ही समझ सकता है।

संस्मरण.. सोची तो लिखने कि पर कहाँ से शुरू करूँ.. और कहाँ तक जाऊं.. पहली बार पूज्य सुदर्शन जी को प्रत्यक्ष देखा था तालकटोरा स्टेडियम में.. संघ का कॉलेज विद्यार्थी एकत्रीकरण.. दिल्ली के १५,००० विद्यार्थी आये थे.. शायद २००३ की बात है। आयु कुछ भी नहीं थी मेरी, पर जब उन्हें सुना, तो दीवाना हो गया.. और हाँ, जिसने भी उन्हें सुना है, आप पूछ लीजिएगा, यही कहेगा। फिर तो दर्शन होते ही रहे।

याद है किस्सा वर्ष २००७ का, प्रथम वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग लगा था दिल्ली में... समापन कार्यक्रम में हर वर्ष की तरह हम भी पहुंचे। अचानक देखा, सनसनाती हुई एक गाडी मैदान में घुसी और सीधा ध्वज-मंडल के निकट तक चली गयी। अब ये एक आश्चर्यजनक दृश्य था क्योंकि संघ में तो कभी ऐसा हमने देखा नहीं.. पता चला कि पूजनीय सरसंघचालक जी सीधा स्टेशन से आये हैं, उनका कोई कार्यक्रम नहीं था परन्तु क्योंकि उनकी प्रार्थना नहीं हुई थी उस दिन की, तो प्रार्थना करने वे वर्ग में आ गए। वर्ग में वक्ता और अतिथि जो कार्यक्रम हेतु मंच पर थे, उनके बारम्बार आग्रहों के बावजूद सुदर्शन जी मंच पर नहीं बैठे। बोले, "मैं अपेक्षित नहीं हूँ, योजना से नहीं आया", सबने कहा कि यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति आपको सुनना चाहता है पर वो नहीं माने। आखिर में पूरा कार्यक्रम संपन्न हुआ और वे मंच से नीचे ही बैठे रहे। समाप्ति के पश्चात उन्होंने एक कार्यकर्ता को इशारा किया कि सारे शिक्षार्थियों को मेरे पास बुलाओ, और फिर उनके बीच कुर्सी लगाकर बैठ गए। हम भी कोने में दुबक क देखने लगे। पूरे ३०० शिक्षार्थियों में से प्रत्येक का नाम पूछा, बात की और फिर उन सब को गीत भी दोहरवाया.. जानना चाहेंगे कौन सा??

" हम मस्तों में आन मिले कोई हिम्मत वाला रे, अरे कोई हिम्मत वाला रे।
दल बादल सा निकल पड़ा यह दल मतवाला रे, अरे कोई हिम्मतवाला रे।। "

ऐसी थी उनकी निश्चलता, उनकी सरलता, उनका जीवन दर्शन भी तो यही था ...

दूसरा अनुभव अद्भुत है, उनकी जीजीविषा का प्रमाण ...

नागपुर में तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग लगा था और मैं भी एक शिक्षार्थी के रूप में उपस्थित था, वर्ष था २०१०। सुदर्शन जी सरसंघचालक के दायित्व से निवृत्ति ले चुके थे, बीमार रहते थे पर वर्ग में उपस्थित थे। प्रातः-काल के संघस्थान पर वे जब तैयार हो कर आये, तो कोई कह नहीं सकता था कि वे बीमार थे। संघ से जुड़े लोग जानते होंगे कि पूजनीय सुदर्शन जी एकमात्र ऐसे कार्यकर्ता रहे जो कि बौद्धिक और शारीरिक दोनों विषयों में इतने पारंगत थे, कि अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख भी रहे और अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख भी। यह एक विलक्षण बात थी। उनकी सुविधा के लिए संघस्थान पर एक कुर्सी भी लगायी गई, वे कुछ देर बैठे भी परन्तु शायद उनसे रहा नहीं गया और वे निकल पड़े, संघस्थान का निरीक्षण करने... जब वे संघस्थान पर घूमते-घूमते एक गण के निकट पहुंचे तो वह नियुद्ध का कालांश चल रहा था।

उन्होंने कुछ देर तो देखा, फिर शिक्षक को हटाया और खुद पूरे ४० मिनट तक शिक्षार्थियों को नियुद्ध का अभ्यास करवाया। यहाँ भी बे रुके नहीं, सारे नियुद्ध शिक्षकों को अलग बुलाया और फिर लगातार एक घंटे तक उन सब की कक्षा ली। जितने दिन वे वर्ग में रहे, शिक्षकों से रात के १-२ बजे तक शारीरिक विषयों पर चर्चा करते थे। एक गण में तो शिक्षार्थी के सामने नियुद्ध-सिद्ध की स्थिति में खड़े हो कर कहा, "मेरे ऊपर मुष्टि (मुक्का) प्रहार करो!" अब कल्पना करिए, वो बेचारा स्वयंसेवक एक निवर्तमान सरसंघचालक पर कैसे मुक्का चलाये, पर जब वो नहीं माने और उसने प्रहार किया तो इतनी फुर्ती से उन्होंने अपना बचाव किया और देखते ही देखते कब उस २०-२२ साल के नौजवान को पटखनी दे दी, हमें तो समझ भी नहीं आया। ऐसा तो था ही उनका जीवट...

ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दे। उनको तो शायद न रही हो पर संसार को अभी उनकी बहुत आवश्यकता थी। वो वहां भी संघ कार्य करेंगे, और जैसा संघ में कहते हैं, कि ऊपर पहुँचते ही डॉक्टर जी सबसे पहले हर स्वयंसेवक से हिसाब लेते हैं कि जीवन भर क्या किया, तो शायद उनके पास बताने को इतना कुछ होगा कि भगवान को उनसे बात करने का अवसर भी न लगे। पूजनीय श्री गुरूजी कहते थे कि किसी को सच्ची श्रध्धांजलि होती है कि उनके जैसा बना जाए :

।। शिवो भूत्वा, शिवम् यजेत ।।

काम तो मुश्किल है पर हाँ, जितना बन पाया, करेंगे अवश्य... भावभीनी, अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

राहुल कौशिक, लेखक से जुडें twitter.com/kaushkrahul

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