पेट्रोल की कीमतों में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि: महंगाई डायन खाय जात है

Published: Thursday, May 24,2012, 17:37 IST
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केंद्रीय सरकार ने 23-24 मई 2012 की मध्यरात्रि से पेट्रोल की कीमतों में अप्रत्याशित रूप से 7.50 रुपये की वृद्धि करने की घोषणा कर दी है। दाम बढ़ने से पेट्रोल अब कोलकाता में 77.53 रुपए प्रति लीटर, दिल्ली में 73.14 रुपए प्रति लीटर, बेंगलुरु में 81 रुपए प्रति लीटर और मुंबई में 78.16 रुपए प्रति लीटर हो गया है। देश की जनसँख्या के लगभग ९५% हिस्से के लिए तो यह एक भयंकर दुस्वप्न से कम नहीं है| ऐसा माना जा रहा है कि यह वृद्धि आज तक के इतिहास में एक बार में की गई सबसे बड़ी वृद्धि है। तो वे क्या कारण रहे जिन से सरकार को एक साथ इतनी बड़ी वृद्धि का निर्णय लेना पड़ा?

कुछ स्वनामधन्य अर्थशास्त्रियों (?) का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपए में तेजी से आ रही गिरावट के कारण सरकार ने पेट्रोल की कीमत में भारी बढ़ोतरी की है। कोई इन अक्लमंदों से यह पूछे कि भैया, डॉलर तो आज महंगा हुआ है पर अगर आंकड़े देखें, तो मई 2009 से अब तक पेट्रोल का मूल्य दोगुना महंगा कैसे हो गया, तो इन्हें कोई जवाब नहीं सूझता। उल्लेखनीय है कि जब यूपीए ने मई 2009 में सत्ता संभाली थी, तो दिल्ली में पेट्रोल के दाम 40.62 रुपये प्रति लीटर हुआ करते थे, जो आज बढ़कर (यदि आज कि वृद्धि जोड़ें तो) 73.14 रुपये हो गए हैं। आज से पहले जब भी पेट्रो पदार्थों के मूल्य में वृद्धि हुई, तो उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि को कारण बताया जाता था, आज तो कच्चा तेल मूल्य गिरावट के नित नए तल छू रहा है, तो फिर आज क्यों..तो फिर वही..जवाब नहीं है।
 
यह एक नग्न वास्तविकता है कि पेट्रोल के दामों में यह वृद्धि यदि किसी कारण से है, तो वह एकमात्र कारण है इस सरकार की अदूरदर्शिता, निर्णय लेने में अक्षमता और भयंकर आर्थिक कुप्रबंधन। एयर इंडिया की दयनीय स्थिति और रेलवे के विषय पर आई कैग की नवीनतम रिपोर्ट इस सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन की अनथक कहानियाँ पहले से ही सुना रही हैं कि किस प्रकार सरकारी कंपनियों को मंत्रियों ने अपनी जागीर समझ कर उनका सत्यानाश कर दिया। रेलवे का घाटा अब तक के सबसे बुरे हालात में है। कहने को तो इस सरकार को चला रहे लोग विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में गिने जाते हैं, परन्तु पिछले आठ वर्षों में इन्होने देश कि अर्थव्यवस्था का जो भट्ठा बिठाया है, उसका मुकाबला नहीं है। झोलाछाप डॉक्टर तो सुने थे, परन्तु झोलाछाप अर्थशास्त्री भी होते हैं, यह पता नहीं था।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता को कम करने के लिए भरसक प्रयास किये जाए। इसका एकमात्र तरीका है वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग। सौर ऊर्जा तथा वायु ऊर्जा के क्षेत्र में गुजरात आज एक उदाहरण बन कर उभरा है जहाँ १५ % तक ऊर्जा आवश्यकताओं कि पूर्ती इन दोनों माध्यमो से की जा रही है। पेट्रोलियम उत्पादों की खपत को कम करने तथा ऊर्जा की खुदरा जरूरतों के लिए सौर ऊर्जा तथा वायु ऊर्जा को विकल्प बनाना ही होगा। देश की कुल आवश्यकताओं की पूर्ती में इन माध्यमो की सहभागिता बढ़ानी होगी। गुजरात में बड़े पैमाने पर वहाँ की राज्य सरकार द्वारा नहरों पर लगाया गया सोलर पैनलो का विशाल मोड्यूल बहुत ही प्रभावी है और प्रति मेगा वाट खर्च भी मात्र १५ करोड रुपये आता है, जिसे सब्सिडी और सहायता बढाकर कम किया जा सकता है।

ज्ञात हो भारत के उत्तरी राज्यों में हर जगह नहरो का जाल है, जो इस काम के लिए बहुत ही उपयुक्त है। भारत सरकार यदि स्वयं पीवी सेल (सोलर पैनल ) बनाये तो यह करीब 25 रुपये प्रति वाट, आयात करने पर 55 रुपये प्रति वाट, लोहे के फ्रेम बनाकर नहरों पर पैनल लगाने पर 150 रुपये प्रति वाट का खर्चा आता है। और उस पर भारत सरकार यही पैनल गाव वालो को 200 रुपये प्रति वाट के हिसाब से दे रही है, जो की एक तरह का लूट ही है। यही सोलर पैनल यदि सही मंशा के साथ सब्सिडी पर उपलब्ध कराये जाएँ, और मनरेगा तथा झोले वालो की ऐसी ही खर्चीली योजनाओं का पैसा इस और घुमाया जाए, तो शायद हम वह दिन भी देख सकते हैं जब भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतः आत्मानिर्भर हो जाएगा।
 
इस स्थिति को देखते हुए इसकी भी आवश्यकता है कि देश के गांवों को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जाए। यह तभी संभव है जब भारत में हर संभाग में गोशाला खोली जाये और और गोबर गैस के समूह बनाकर गैस बाटलिंग प्लांट लगवाए जाये। यह भारत के लोगो के लिए एक सस्ता और अनवरत चलने वाला विकल्प होगा। इससे दो फायदे होंगे, एक तो पशुओ का काटना रोका जा सकता है और दूध-दही के साथ ही खेतों को शुद्ध कम्पोस्ट भी मिलेगी। स्वामी रामदेव जी का भारत स्वाभिमान इस व्यवस्था की मांग पिछले तीन सालो से दोहराता रहा है और हर आन्दोलन में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है| 2-4 पशु हर महीने 2 से 3 सिलिंडर गैस अपलब्ध करा सकते है.
 
पर, क्या ऐसा संभव है?? असल में समस्या है मंशा की, क्या अमरीका से पढ़ के आये ये (अन) अर्थ शास्त्री भारत के 6.5 लाख गांवों में बसे कोटि-कोटि जन-गण-मन की समस्या को समझ पाएंगे..?? शायद ऐसी ही परिस्थितियां देख कर किसी शायर ने लिखा है:
 
बर्बाद गुलिस्तां करने को, बस एक ही उल्लू काफी है..
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ऐ-गुलिस्तां क्या होगा..

राहुल कौशिक | लेखक से ट्विट्टर पर जुडें twitter.com/kaushkrahul

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